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Thursday, May 29, 2008

वरिष्ठ पत्रकार राजेश माथुर का निधन



वरिष्ठ पत्रकार राजेश माथुर का गुरुवार को निधन हो गया। 68 वषीय माथुर को पिछले कुछ समय से फेफड़ों में तकलीफ थी। उनके परिवार में दो पुत्र व एक पुत्री है। माथुर का आदर्शनगर श्मशान पहुंची जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया।
20 जनवरी 1940 को उज्जैन में जन्मे राजेश माथुर ने दैनिक नवयुग से पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। 1962 से 1992 तक वे राजस्थान पत्रिका में रहे। इस दौरान उन्होंने मिडलची के नाम से `मझधार में´ कॉलम लिखा। मध्यमवर्ग की समस्याओं पर माथुर का यह कॉलम व्यंग्य पर आधारित था। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में माथुर की कई व्यंग्य रचनाएं प्रकाशित हुई। माथुर को पत्रकारिता के लिए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार भी मिला।

Wednesday, May 7, 2008

पत्रकारिता और भागमभाग

पत्रकारिता में आजकल भागमभाग का दौर है। मेरा मानना है कि हर दो साल में करीब साठ फीसदी से ज्‍यादा लोग नौकरी बदल रहे हैं। यानी हर आदमी तेजी में है। यह तेजी शायद खबर को जल्‍दी से जल्‍दी पाठक तक पहुंचाने वाले आजतक की तेजी से भी ज्‍यादा है। बीते एक साल में इतने समाचार पत्र और टीवी चैनल्‍स शुरू हुए कि यह रफतार और बढ गई।
रात की ही बात थी, आफिस से घर लौटकर बस यूं ही आरकुट पर मैसेज चैक कर रहा था। इसी बीच एक मित्र के फोटो एलबम पर नजर पडी। बात पर्सनल है और उससे भी ज्‍यादा वो फोटो जो अब दुबारा इस तरह किसी भी कीमत पर खींचा भी नहीं जा सकता। इस एक फोटो से आप मीडिया की भागदौड को साफ अनुभव कर सकते हैं।

अब सुनिए कहानी, फोटो में कुर्सियों पर बैठे लोगों को छोड ( फोटो में एक जयपुर की राजकुमारी हैं) बाकी सारे लोग आज उस संस्‍थान में नहीं है, जहां का यह फोटो है। यूं तो इस फोटो वाले दिन मैं खुद भी उसी टीम का हिस्‍सा था, इत्‍तेफाक से फोटो खिंचते समय मौके पर नहीं था। मैं खुद भी एक बार नौकरी बदल चुका हूं।
अब उस फोटो में राजकुमारी दीया को छोड 12 पत्रकारों में से समूह संपादक और तीन दूसरे वरिष्‍ठ साथी ही उसी संस्‍थान में हैं। बाकी अब दूसरी जगह नौकरी कर रहे हैं ( दाएं से चौथे, मेरे मित्र प्रवीण गौतम का सडक दुर्घटना में निधन हो गया।) वैसे उसी संस्‍थान में बचे हुए सभी लोगों का भी अपनी अपनी जगह से तबादला हो चुका है। यानी बदलाव तो सौ फीसदी है।
और तो और इधर उधर हुए लोगों में से आधे लोग तो इस दौरान दो बार नौकरी बदल चुके हैं। यानी कारण कुछ भी हो आदमी बदलाव चाहता है।
शायद सभी को पता है कि बहता पानी, ठहरे हुए से ज्‍यादा पवित्र माना जाता है!

Sunday, April 27, 2008

वाह भाई शाहरुख


अपन के शाहरुख खान, सारे एडिटर्स से अच्‍छे हैं! 25 अप्रेल को शाहरुख खान ने वो 'चमत्‍कार' कर दिखाया जो अच्‍छे अच्‍छे एडिटर्स भी न कर सके। शाहरुख एक ही दिन में दो समाचार पत्र समूहों के बतौर अतिथि संपादक थे।
उन्‍होंने 25 अप्रेल को दैनिक भास्‍कर समूह के दो अखबारों दिव्‍य भास्‍कर और दैनिक भास्‍कर का संपादन किया और वे समाचार पत्र के आफिस में मौजूद थे। वहीं वे उसी दिन दिल्‍ली के एचटी में मौजूद थे। उन्‍होंने बतौर संपादक एचटी, नई दिल्‍ली के सप्‍लीमेंट एचटी सिटी का संपादन किया।
अपन को दो के चिंतन के बाद भी यह समझ नहीं आया कि एक आदमी एक ही दिन में दो जगह कैसे। वैसे अपन ने गौर से देखा तो शाहरुखजी दैनिक भास्‍कर की प्रति पढ रहे हैं वो इस साल के आमबजट वाले दिन की है।

ईश्‍वर सबको शाहरुख जैसा संपादकीय हुनर दे, वैसे अपन ने दोनों अखबार देखे, खूबसूरत भी थे और कुछ नए स्‍टोरी आइडिया भी।

Saturday, April 5, 2008

हिमांशु व्‍यास को न्‍यूज फोटोग्राफी में गोल्‍ड अवार्ड


जयपुर के हिमांशु व्‍यास को न्‍यूज फोटोग्राफी के लिए इफ्रा का गोल्‍ड अवार्ड मिला है। उन्‍होंने हिंदुस्‍तान टाइम्‍स, जयपुर के लिए जोधपुर जिले के एक गांव में हिरण को दूध पिलाती विश्‍नोई महिला के चित्र का चित्र खींचा था। विश्‍नोई जाति के लोग अपने प्रकृति और वन्‍यजीवों से प्रेम के लिए विख्‍यात हैं। सलमान खान को चिंकारा के शिकार मामले में जेल तक पहुंचाने में विश्‍नोई लोगों ने अहम भूमिका निभाई थी।
इसके साथ साथ राजस्‍थान पत्रिका, जयपुर को सर्वश्रेष्‍ठ प्रथम पृष्‍ठ के लिए इफ्रा की ओर से कांस्‍य पुरस्‍कार मिला है। पत्रिका को छपाई के लिए भी इफ्रा का पुरस्‍कार मिल चुका है।
हिमांशु व्‍यास और राजस्‍थान पत्रिका को बधाई।

Monday, February 4, 2008

जयपुर में प्रभाषजी और प्रभु चावला में टकराव

जयपुर में दो दिवसीय नेशनल ज्‍यूडिशियल कॉनक्‍लेव शनिवार को संपन्‍न हुई। इसका उद़घाटन शुक्रवार शाम को हुआ और शनिवार को पहले सत्र में विधि, न्‍याय एवं जनमत तथा मीडिया की भूमिका एवं दायित्‍व विषय पर विचार रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट जज गणपत सिंह सिंघवी के साथ साथ वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभाष जोशी और प्रभु चावला भी थे।
पहले प्रभाषजी का नंबर था बाद में प्रभुजी का। पर प्रभाषजी के कुछ मुददों को प्रभुजी ने दिल पर ले लिया और इसके जवाब में उनका नाम लेकर खूब गरजे। उनके भाषण के बाद प्रभाषजी दो मिनट बोलने आए और अपनी बात कही, प्रभुजी भी फिर से मंच पर आए लेकिन वकीलों ने विरोध करते हुए उन्‍हें बैठा दिया और बहस बंद करने को कहा। पूरे शहर ने देखी दो दिग्‍गज पत्रकारों की यह गरमा गर्मी। बस बाद में प्रभुजी ने किसी तरह मीडिया मैनेज किया और यह गरमागरमी का मामला छपने से बचवा लिया। पर कॉनक्‍लेव के सभी सत्रों में वक्‍ताओं ने इसकी चर्चा की। मतलब इस कार्यक्रम की आयोजक बार एसोसिएशन भी यही कहती रही कि सारी चर्चा को इन दो पत्रकारों की टसल हाइजेक कर गई।
हुआ ये कि प्रभाष जोशी ने अपने भाषण में वर्तमान में मीडिया की दुर्दशा पर कहा कि आज के दौर में जबकि सजायाफता संजय दत्‍त को गांधीगिरी का सच्‍चा वारिस बताया जाता है, शाहरुख खान को इंडियन ऑफ द ईयर घोषित किया जाता है। जहां शाहरुख की हैसियत मनमोहन सिंह से और अनिल अंबानी की चिदंबरम से ज्‍यादा हो ऐसे मीडिया की हालत का अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है।
मीडिया को मुनाफा कमाना का जरिया बताते हुए प्रभाषजी ने कहा कि पहले मीडिया मुनाफा कमाने के लिए काम नहीं करता था। आपातकाल के दौरान इंडियन एक्‍सप्रेस और स्‍टेट़समैन अखबारों का हवाला देते हुए उन्‍होंने रामनाथ गोयनका को याद किया। उन्‍होंने कहा कि यदि वो अखबार को मुनाफा कमाने का जरिया बनाते तो इंदिरा गांधी को चुनौती नहीं दे सकते थे।
करीब 35 मिनट में से 27 मिनट तो प्रभुजी खूब अच्‍छा अच्‍छा बोले वर्तमान पत्रकारिता, उसकी जल्‍दबाजी, आपाधापी पर प्रकाश डाला लेकिन लास्‍ट के आठ मिनट ने सारा मामला गरमा दिया।
बाद में प्रभु चावला ने प्रभाष जोशी के जवाब में कहा कि गोयनका का उददेश्‍य भी मुनाफा कमाना ही था। प्रभुजी ने कहा कि संपादक और वरिष्‍ठ पत्रकार, नौकरशाह रिटायरमेंट के बाद आदर्शों की बडी बडी बात करते हैं। चावला ने वर्तमान दौर की मीडिया का समर्थन करते हुए कहा कि यह समय के साथ चलने की मजबूरी है। चावला ने प्रभाषजी का नाम लेकर कहा कि गोयनका ने भी मुनाफा कमाने के लिए काम किया था। समय के साथ नहीं चलने पर इंडियन एक्‍सप्रेस समूह की आज क्‍या हालत है, किसी से छिपी नहीं है। उन्‍होंने कहा कि प्रभाषजी, गोयनकाजी ने कैसा जनसत्‍ता सौंपा, जिसकी आपने क्‍या हालत कर दी। आपने समाचार पत्र को विचार पत्र बनाकर रख दिया और विचार रखने से कौन रोक रहा था, लेकिन खबरों में न्‍यूज की जगह व्‍यूज लिखने के लिए किसने कहा। उन्‍होंने कहा कि संपादकों को राजनीति नहीं करनी चाहिए। अगर आपको राजनीति करनी है तो राजनीतिक दलों में जाना चाहिए।
इसके बाद प्रभाष जोशी फिर मंच पर आए और कहा कि मैं राज्‍यसभा का सदस्‍य या पदम भूषण के लिए काम नहीं करता, ( डायस ठोंककर बोले) पहले भी ऐसे ही बोलता था और आज भी।
इसके बाद प्रभु चावला ने बोलना चाहा, सीट से उठे भी लेकिन वे इस बात को प्रभाषजी से व्‍यक्तिगत रूप से लेने की बात ही कह पाए कि लोगों ने उन्‍हें इस चर्चा को बंद करने के लिए बैठ जाने को कहा।
पर इस मामले ने पत्रकारिता जगत के अंदर की दो विधाओं के इन दिग्‍गजों के मतभेद सार्वजनिक कर दिए। बाद के सत्रों में खूब चर्चा हुई और जज यह कहते रहे कि हमने पत्रकारिता की अंदर की कहानी अभी देखी। हमें खबरों में और गंभीरता दिखानी चाहिए वगैरह वगैरह।

Sunday, February 3, 2008

सिर्फ कॉमनसेंस का जॉब है पत्रकारिता

एक छोटे से एक्सिडेंट में अपन की टांग टूट गई है। साथ देने के लिए अपन के दोस्‍त और कुछ वरिष्‍ठ साथी घर आ गए। संडे था इसलिए कुछ लोग फ्री थे और दिनभर अपन के घर मजमा लगा रहा।
कुछ ज्ञान की बातें हुईं अचानक याद आया कि आज 3 फरवरी है। इसी से जुडा एक किस्‍सा फरमाया गया। इसका कुल जमा मतलब यह कि पत्रकारिता सिर्फ कॉमनसेंस का जॉब है।
पिछले साल इसी दिन जयपुर में एक समाचार पत्र में पेज एक पर खबर छपी “विमान से भेजा राजमाता का शव”। और इसी समाचार पत्र के पेज सात पर राजमाता के शव को एंबुलेंस से ले जाते हुए फोटो छपा। इस खबर में एक जज को सरकारी विमान नहीं देने के पुराने समाचार का जिक्र करते हुए सरकार की सामंती कार्यप्रणाली पर शहर के वकीलों की प्रतिक्रिया ली गई और पैकेजिंग करके छापा गया। यानी उस मामले पर प्रतिक्रिया जो हुआ ही नहीं।
सुबह जब मामले का खुलासा हुआ तो एक सलाहकार संपादक, एक वरिष्‍ठ उपसंपादक और एक रिपोर्टर के इस्‍तीफे मंजूर कर लिए गए वहीं तीन लोग बडी मुश्किल से नौकरी बचा पाए।
मतलब साफ कि किसी ने फोटोजनर्लिस्‍ट की बात नहीं सुनी। एक ही अखबार में, पेज वन की प्रमुख खबर को झुठलाता फोटो पेज सात पर छपा। ये हालात तब थे जब खबर में पूरी प्रिंटर (पेज वन) डेस्‍क, चार रिपोर्टर, एक चीफ रिपोर्टर एक कार्यकारी संपादक और एक संपादक जुटे हुए थे।
संदेश साफ की पत्रकारिता में कॉमनसेंस सबसे अहम है और छोटों की बात भी सुनी जानी चाहिए।

Sunday, January 6, 2008

रूबरू तहलका के तरुण तेजपाल से


रविवार को जयपुर में पं: झाबरमल्‍ल स्‍मृति व्‍याखानमाला आयोजित की गई। इसमें तहलका के एडिटर इन चीफ तरुण तेजपाल मुख्‍य वक्‍ता थे। यह व्‍याख्‍यानमाला राजस्‍थान पत्रिका और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय की ओर से हर साल जयपुर में आयोजित की जाती है।
अपन भी उनको सुनने गए, भई दिल जीत लिया अपन के पोनी टेल वाले तेजपाल जी ने। उनका पूरा व्‍याखान सुनकर अपन को लगा कि वे न सिर्फ राजनीति और खबर की समझ रखते बल्कि धर्म और इतिहास में भी उनका हाथ तगडा वाला मजबूत है। अपन को लगा कि पत्रकारिता से जुडे लोगों को तो यह भाषण पूरा सुनना चाहिए था पेश है उनके व्‍याख्‍यान के कुछ अंश...

25 साल के पत्रकारिता अनुभव वाले तेजपाल भी बोले कि छोटे शहरों के युवा बडे शहरों के लडकों से कहीं ज्‍यादा होनहार होते हैं। इसलिए मैं हमेशा हिंदी बोलने वाले इन यूपी, बिहार, राजस्‍थान के लडकों को तरजीह देता हूं (हो सकता है राजस्‍थान तो इसलिए बोल दिया कि वे जयपुर में बोल रहे थे।)
उन्‍होंने कहा कि उन पर इमरजेंसी का इम्‍पैक्‍ट था, और वे देश की उस पहली पढी लिखी पत्रकार पीढी में से थे, जिन्‍होंने पत्रकारिता को ही बतौर करियर चुना। अपने अनुभव सुनाते हुए उन्‍होंने कहा कि उनके पिता चाहते थे कि वे ऑक्‍सफोर्ड में आगे की पढाई करें, लेकिन उन्‍होंने साफ कर दिया कि वो भारत में ही रहना चाहते है। वे जो करना चाहते हैं वो यही संभव था।
उन्‍होंने कहा कि सत्‍ता और पैसे के दुरुपयोग पर निगरानी रखना ही पत्रकारों का काम है। पत्रकारों का काम यह नहीं है कि अमिताभ क्‍या पहनते हैं, करीना का किससे चक्‍कर चल रहा है। यह मानव की सहज जिझासा हो सकती है, लेकिन पत्रकारीय धर्म नहीं है।
इसके अलावा उन्‍होंने एक मजेदार बात कही जिस पर युवा तो युवा बुर्जुगों ने भी हां में हां मिलाई कि बच्‍चों को बडों की बात सुननी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे आंख मूंद कर उस पर विश्‍वास कर नहीं करना चाहिए।


पं: झाबरमल्‍ल, जिनकी स्‍मृति में यह व्‍याखानमाला आयोजित की गई।

भारत के सामने बढती चुनौतियों की बात करते हुए तरुण तेजपाल ने कहा कि सेनसेक्‍स के बढने को ही हमें समृदिध का प्रतीक नहीं मान लेना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि मैंने खुद भी न्‍यूज वीक में भारतीय विशेषांक में लिखा कि भारत में इकोनोमिक रिर्सजेंट हो रहा है, भारतीय खुलकर भी लोगों के सामने आ रहे हैं लेकिन अभी एक अरब 15 करोड के देश में सिर्फ 20 मिलियन लोगों के पास ही बताने के लिए नई कहानी है। देश के अस्‍सी करोड लोग आज भी 40 रुपए से कम रोजना में जिंदगी जी रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि उडीसा, मध्‍यप्रदेश, महाराष्‍ट और बिहार समेत पांच बडे राज्‍यों में गरीबों की संख्‍या हर साल बढती जा रही है। उन्‍होंने कहा कि देश में अनइक्‍वल सोसाइ‍टी है, इसलिए देश के करीब 32 फीसदी जिले नक्‍सलवाद के शिकार होते जा रहे हैं। सांप्रदायिकता बढती जा रही है।
उन्‍होंने कहा कि अंग्रेजी अखबारों में पहले रुरल ब्‍यूरो होता था, जो गांवों खेती से जुडे की इश्‍यूज को कवर करता था, लेकिन आज यह नहीं हो रहा। यह भयानक गलती है और इसमें सुधार की तुरंत आवश्‍यकता है।
उन्‍होंने कहा कि गरीब के लिए न्‍याय अलग तरह से होता है और अमीर के लिए न्‍याय अलग।
मीडिया को गरीब का साथ देना चाहिए क्‍योंकि अमीर के पास तो जुबान है, पैसा है वह अपनी बात आगे तक रख सकता है, लेकिन गरीब की बात को ही मीडिया को आगे रखना चाहिए। यानी सत्‍ता और पैसा नहीं है उसकी आवाज बननी चाहिए।


तहलका की कहानी तेजपाल की जुबानी
इस मौके पर तरुण तेजपाल ने कहा कि 2000 में डॉट काम के जमाने में वे तहलका डॉट कॉम लेकर आए, तो सिर्फ इसलिए कि वे नए जमाने में 1980 की तेज धार वाली पत्रकारिता का पैनापन लाना चाहते थे। उन्‍होंने कहा कि 13 मार्च 2001 को तहलका की ओर से ऑपरेशन वेस्‍ट ऐंड में हथियारों की खरीद में घूस के खुलासे के बाद तात्‍कालीन भाजपा सरकार हाथ धोकर अलोकतांत्रिक तरीके से उनके पीछे पड गई। उस समय तहलका की 120 की टीम सिर्फ चार लोगों में सिमट गई। साथी तीन लोगों को यातनाएं दी गईं, जेल में डाल दिया गया। इन 19 महीनों में उन्‍होंने वकीलों के चक्‍कर काटे और सरकार ने घूस लेने वालों के खिलाफ जांच बैठाने की जगह उनके खिलाफ ही वैंकटस्‍वामी कमीशन बिठा दिया। राम जेठमलानी समेत करीब 30 लोगों ने अलग अलग समय उनकी पैरवी की। उन्‍होंने कहा कि राम जेठमलानी की पैरवी के दौरान दो दिन में ही उन्‍होंने कमीशन को पूरी तरह उलझा दिया और आखिर सरकार को कमीशन रदद करना पडा।
उन्‍होंने कहा कि इसके बाद 2003 में आठ महीने तक पैसे उधार लेकर देशभर में घूमें और जनसभाओं में लोगों से समर्थन मांगा। इस दौरान उन्‍हें पता चला कि लोगों के दिल में तहलका के लिए इज्‍जत है और वे अन्‍याय के खिलाफ अवाज उठाते हुए किसी को देखना चाहते हैं।
इसके बाद उन्‍होंने 2004 में तहलका अखबार की शक्‍ल में शुरु किया। उन्‍होंने कहा कि शायद तहलका ऐसी पहली मीडिया एजेंसी थी, जो बिना लागत के शुरु हुई और 15 हजार लोगों ने एडवांस पैसे देकर तहलका की कॉपी सस्‍क्राइब कराई।
उन्‍होंने कहा कि उसके बाद जहीरा शेख के 18 लाख रुपए लेकर बेस्‍ट बेकरी मामले से पलटने वाली बात को ब्रेक किया।
संजय दत्‍त के मामले को जब तहलका ने खोला तो संजय के समर्थक कांग्रेसी और दूसरे सांसदों ने उनसे कहा कि संजय दत्‍त शरीफ आदमी है। पुरानी गलती के लिए उन्‍हें नहीं फंसाना चाहिए।, लेकिन न्‍याय दिलाने के लिए ही पत्रकारिता की आवश्‍यकता है इसलिए ही उन्‍होंने निजी जिंदगी में संजय को पसंद करने के बावजूद संजय के खिलाफ खबर की।

Wednesday, December 12, 2007

क्‍यूं बदनाम करते हो गुजरात को


खबर देना मीडिया का काम है और गुजरात चुनाव भी उसी जिम्‍मेदारी का हिस्‍सा है। लेकिन इस बार गुजरात चुनाव के दौरान मोदी और भाजपा विरोधी पत्रकार लॉबी इस तरह मोदी के पीछे लग गई है कि पूरा गुजरात बदनाम हो रहा है।
दिल्‍ली में बैठकर तथाकथित नेशनल मीडिया अपनी विचारधारा के हिसाब से मोदी पर पिल पडा है और इसी चक्‍कर में रोज और हर रोग गुजरात के जख्‍म हरे हो जाते हैं। लोग शायद भूल गए हों पर मीडिया को याद रखना चाहिए कि गोधरा के बाद यह दूसरे विधानसभा चुनाव हैं। जिस तरह पॉलिटिकल पार्टी के नेता गुजरात या भाजपा का जिक्र आते ही गोधरा का नाम लेने लगते हैं, वैसा ही काम आजकल भाजपा विरोधी लॉबी वाले पत्रकारों ने संभाल रखा है। अरे भाई कम से कम जनादेश का तो सम्‍मान करो जनता ने चुनकर मोदी को मुख्‍यमंत्री बनाया है, वो कोई तानाशाह तो नहीं है, जो पिल पडे उसके पीछे। जनता है जब उसे ही तय करना है तो वोट पड रहे हैं फैसला हो जाएगा कि जनता किसको चाहती है, आप जबरन अपनी फिलोसोफी क्‍यूं छोंक रहे हैं।

कुछ पत्रकार, चैनल और मीडिया ग्रुप तो मोदी के पीछे इस तरह पडे हैं, जैसे गोधरा और उसके बाद हुए नरसंहार के लिए अकेले मोदी ही दोषी थे। (अगर आप उनकी दिल की तसल्‍ली के लिए मान भी लें तो) जनाब हर आदमी के पास दिमाग होता है उसे पता है कि क्‍या अच्‍छा है क्‍या बुरा है, हर आदमी के अपने सिदधांत हैं उसकी नैतिकता है। अगर आम आदमी चाहता तो सौहार्दता पूर्ण रह सकता था, दंगे भडके ही क्‍यूं।
अब जो भी हो गोधरा के बाद गुजरात में मोदी की दूसरी टर्म में मुझे याद नहीं कोई बडा दंगा या ऐसी घटना हुई हो जिससे साम्‍प्रदायिक सौहार्द बिगडा हो। बिलकिस या एक आध मामले छोड दें तो गुजरात से बलात्‍कार की घटनाएं यूं रोजमर्रा की तरह तो सामने नहीं आतीं।
गुजरात में जिस तरह लडकियां देर रात तक शहर में अकेले घूम सकती हैं ऐसा प्रदेश दूसरा कौनसा है, जरा बता दीजिए।

विकास और इंडस्‍टरी के मामले में गुजरात से टक्‍कर लेने वाला राज्‍य कौनसा है।
रविशजी ने भी अपने अनुभवों में लिखा था कि गुजरात का आम आदमी मानता है विकास हुआ है। मेरे दो चार परिचित हैं वे भी यही मानते हैं कि चाहे जो हुआ हो लेकिन अब गुजरात में विकास दिखता है। मैं भी पिछले साल फरवरी में दमन द्वीव घूमने गया और एक तरफ के सफर का काफी हिस्‍सा तो एसटीए की बस में तय किया। उस दौरान लोगों से बात की, सडके देखी, माहौल देखा। बिंदास खर्चीले मस्‍तमौला लोग देखे उन्‍हें देखकर नहीं लगता कि यहां कभी उस तरह का माहौल रहा होगा।
भुज का भूकंप, सुनामी के दिन या सूरत का प्‍लेग हर मामले में विपदा झेलने के बाद गुजरात हर बार पहले से सुंदर और शक्तिशाली होकर उभरा है।
अपने पॉलिटिकल प्रॉफिट या पॉलिटिकल फ़यूचर के लिए राजनेताओं ने और उसके समर्थक मीडिया वालों ने गुजरात को इतना बदमान कर दिया, कि बापू के पैदा होने से गुजरात जितना सम्‍मानित हुआ था उससे भी यह पाप अब बैलेंस नहीं होता।

Saturday, December 8, 2007

अपन को उल्‍लू समझा क्‍या


समझदारों को ज्‍यादा समझाने की जरूरत नहीं है।

बस इतना समझ लीजिए की यह चित्र मुंबई के लोगों के लिए डीएनए के फोटो जर्नलिस्‍ट मुकेश त्रिवेदी ने मुंबई में खींचा और जयपुर के सिटी भास्‍कर के लिए यही फोटो जेएलएनमार्ग जयपुर का हो गया। अब खींचा किसने ये अपन को पता नहीं। डीएनएन के मुंबई संस्‍करण में यह चित्र 4 दिसंबर को पेज एक की लीड न्‍यूज में लगा वहीं सिटी भास्‍कर जयपुर में 5 दिसंबर को अंतिम पेज पर जेएलएन मार्ग का बताया गया।
लगता है ये मंगलवार 3 दिसंबर 2007 की सुबह मुंबई में थे और बुधवार 4 दिसंबर 2007 को जेएलएन मार्ग जयपुर में ।
तभी तो कह रहे हैं चिल्‍स इल्‍स और पिल्‍स
( सभी पत्रकार मित्रों से क्षमा सहित, भई क्‍या करुं कमबख्‍त इधर उधर झांकने की आदत है सहन नहीं होता। एक सलाह - कम से कम किसी अखबार की पेज एक की लीड फोटो तो मत उडाया करो, ध्‍यान पड ही जाता है)

Monday, October 22, 2007

ब्रेकिंग न्‍यूज : मुंबई से पुणे की दूरी 170 किमी


हैडिंग पढकर परेशान होने का कष्‍ट न करें, यह दूरी कल भी इतनी ही थी और आज भी इतनी ही है। बस मैं तो जिक्र कर रहा हूं, भारत के सबसे तेज न्‍यूज चैनल आजतक पर सोमवार रात एक बजे की ब्रेक्रिंग न्‍यूज का।
संजय दत्‍त को मुंबई धमाकों पर स्‍पेशल टाडा कोर्ट ने दोपहर में ही फैसले की कॉपी दे दी। इसके तुरंत बाद उन्‍होंने सरेंडर कर दिया और रात करीब 11:30 बजे तो वे पुणे की यरवदा जेल भी पहुंच गए। इसके बाद रात एक बजे आजतक पर ब्रेकिंग न्‍यूज के तीन फ़लैश से आपको जबरन रूबरू करा रहा हूं।
1. संजय दत्‍त को पुणे की यरवदा जेल ले जाया गया
2. मुंबई से पुणे की दूरी 170 किमी
3. चार घंटे का सफर तीन घंटे में ही किया तय
अब अपने मुन्‍ना भाई कोई महात्‍मा गांधी तो हैं नहीं कि वे कितनी दूर पहुंचे जनता को इस बात की पल पल की खबर दी जाए। सेलिब्रिटी हैं इसलिए खबर इतने बडे पैमाने पर दिखाई जानी चाहिए थी, यह तर्क भी यहां कोई खास फिट नहीं बैठता। उनका पिछली बार जेल जाना वाकई बडी खबर हो सकती थी, लेकिन इस बार तो उनको जेल तय थी। खुद मीडिया रोज गिन गिनकर दिन बता रहा था। जनता जनार्दन को भी पता था कि दशहरे के बाद तो संजू बाबा को एक बार जेल जाना पडेगा। अब चलिए मान भी लिया जाए कि खबर बडी थी तो यह बता देते कि यरवदा जेल तीन घंटे में पहुंच गए। और ज्‍यादा था तो टाइम बता देते पर ब्रेकिंग न्‍यूज में मुंबई से पुणे की दूरी 170 किमी चलाना तो एकदम चिरकुटाई है।
अब अपने अटल बाबा किसी दिन स्‍वर्ग सिधार जाएंगे तो भी इसी फोन्‍ट साइज में फलैश चलेगा अटलजी नहीं रहे। अब इलेक्‍टॉनिक वालों कम से कम ब्रेकिंग न्‍यूज का कही तो सम्‍मान करो।
और अपने सबसे तेज चैनल को एक फोकट की सलाह कि मेरी न मानों तो अपने प्रतिस्‍पर्धी एनडीटीवी इंडिया से ही कुछ सीख लो यार, जो कम से कम ताजा खबर तो चलाता है, यूं ही कुछ भी ब्रेक तो नहीं करता।

आजतक और मीडिया के ठेकेदारों से क्षमा सहित।


(आदर्श परिस्थिति के अनुसार मुझे मीडिया में होने के कारण इस विषय पर टिप्‍पणी से बचना चाहिए था, पर मैं इस तरह की ब्रेकिंग न्‍यूज देखकर खुद को रोक न सका)