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Saturday, September 26, 2009

टाइमपास है व्‍हाट़स योर राशि


कल कई महीनों बाद फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो देखी व्‍हाटस योर राशि
फिल्‍म की कहानी कुछ यूं है कि एक गुजराती एनआरआई लडका एमबीए करने के बाद शादी करने भारत आता है।
भाई पर कर्ज है, घर की माली हालत खराब है ठीक सरकारों की तरह। शादी करने पर नाना की संपत्ति में से हीरो को करोडों की जमीन मिलनी है। और घरवालों को आस है कि एनआरआई बेटे को दहेज मिलेगा, इसलिए सभी को शादी की जल्‍दी है।
एक वेबसाइट पर लडके की शादी का एड दिया था। बदले में 1765 रेस्‍पांस मिले। लडका परिवारवालों की मदद करना चाहता है, पर दहेज नहीं लेना चाहता। शादी सिर्फ दस दिनों में करनी है और इतने दिन में इनती सारी लडकियों से मिलना संभव नहीं है।
इसलिए लडके की राय पर यह तय हुआ कि सिर्फ 12 राशियों के हिसाब से सिर्फ 12 ही लडकियां देखी जाएं। और इन्‍हीं 12 लडकियों के जरिए, समाज की कई सारी बुराइयों को दिखाया है और इन्‍हीं लडकियों के देखने के बहाने ही तीन घंटे से ज्‍यादा समय की इस तथाकथित कॉमेडी फिल्‍म का तानाबाना बुना गया है।
इन 12 ल‍डकियों को देखकर भी हीरो शायद कुछ तय नहीं कर पाया कि शादी किससे की जाए, तो एक रिश्‍तेदार ने उसकी बिना राय जाने सीधे फेरे के मंडप पर पहुंचा दिया।
12 लडकियों में सबकी अपनी अपनी कहानी है। अपने अपने गुण अवगुण है। पर पता नहीं आशुतोष गोवारीकर क्‍या चाहते हैं, उन्‍हें लगता है कि बिना पौने चार घंटे के कोई फिल्‍म पूरी हो ही नहीं सकती। फिल्‍म देखते समय बोर नहीं करती पर स्‍टोरी में ऐसा भी नहीं था, जिसे एडिट नहीं किया जा सकता था।
फिल्‍म में करीब 12 गाने हैं, जिनमें से एक दो को छोडकर फिल्‍म के बाहर आने तक आप भूल ही जाएंगे।
फिल्‍म की सबसे बडी बात यह कि प्रियंका चोपडा ने 12 किरदार निभाए हैं। संजना के किरदार में वो सबसे अच्‍छी लगी हैं और शायद वही उनपर सबसे ज्‍यादा सूट करता है, हां हैप्‍पी एंड में शादी भी उसी के साथ होती है।
उन 12 लडकियों के डिटेल पर चर्चा फिर कभी
अभी इतना ही, हां बस फिल्‍म टाइमपास है, आशुतोष गोवारीकर टाइप की नहीं है, जिसके लिए आप लंबे समय तक इंतजार करते थे।

Saturday, April 4, 2009

एक दम पकाऊ तस्‍वीर, गले नहीं उतरती कहानी


थिएटर मालिकों और डिस्‍टीब्‍यूटर्स में विवाद के चलते यूं ही नई फिल्‍में कम रिलीज हो रही हैं। “8 बाई 10 तस्‍वीर” रिलीज हुई तो ऐसी कि यूं समझिए अगर आप देखने पहुंच गए‍ तो लगेगा कि पैसे बेकार गए।
यूं तो फिल्‍म नागेश कुकनूर की है, अपन तो इसका सब्‍जेक्‍ट और नागेश का नाम देखकर पहुंच गए थिएटर। पर, क्‍या करें हॉ‍लीवुड स्‍टाइल कि कल्‍पना करके फिल्‍म बनाई है। पर स्‍टोरी इतनी अजब कि आप विश्‍वास ही नहीं करेंगे।
फर्स्‍ट हाफ तो बेहद कमजोर है, कई बार लगता है कि बस अब तो फिल्‍म खत्‍म होने को है पर उससे पहले ही एक नया पेंच आ फंसता है। फिल्‍म की कहानी कुछ यूं है कि नायक के पिता एक बिजनेसमैन हैं बडी कंपनी के मालिक हैं। पर बेटे जय (अक्षय) को उनके बिजनेस में इंटेरेस्‍ट नहीं है। वह इन्‍वायरमेंट प्रोटेक्‍शन सर्विस नाम से एक संस्‍था चलाता है। हालाकि काम करते हुए उसे फिल्‍म के शुरुआती पांच मिनट में बताया जाता है, उसके बाद तो हीरो काम पर ही नहीं जाता। बचपन में एक हादसे के बाद उसमें एक अजीब सी शक्ति आ जाती है। वह किसी भी फोटो को देखकर उसमें छिपा भूतकाल जान सकता है।
इस बीच उसके पिता की मौत हो जाती है। नौकरी से निकाले गए एक इंस्‍पेक्‍टर (जावेद जाफरी) के आगह करने पर उनका ध्‍यान इस ओर जाता है कि उनके पिता की हत्‍या की गई है। बस वो दोनों यह खोजने में जुट जाते हैं और फिल्‍म के अंत में पता चलता है कि दाल में काला नहीं पूरी दाल ही काली है।
मां के रोल में शर्मिला टैगोर और वकील के रूप में गिरीश कर्नाड को दो चार डायलॉग मिले हैं। अक्षयय की प्रेमिका शीला के रूप में आयशा टाकिया आजमी (शादी के बाद यही नाम है फिल्‍म की क्रेडिट में ) अक्षय के आजू बाजू खूब दिखती हैं। पर डायलॉग नहीं दिखते। (संस्‍पेंस है इसलिए यह नहीं बता रहा कि उन्‍होंने क्‍या गुल खिलाए)
फिल्‍म कनाडा में शूट की गई है। सीनरी बहुत प्‍यारी है। बस एक यही प्‍लस प्‍वाइंट है, दो गाने हैं एक फिल्‍म में और दूसरा फिल्‍म खत्‍म होने के बाद आता है। कुल मिलाकर नागेशजी संस्‍पेंस बनाने चले थे। और एकदम बिकाऊ सितारे अक्षय का साथ लिया उसके बावजूद फिल्‍म में चल पाने जैसे कोई लक्षण नहीं हैं।

हॉल में सिर्फ एक बार ठहाका गूंजता है
सीन कुछ इस तरह है कि एक बिस्‍तर में जय और शीला सो रहे हैं। आधी रात एक सपने के बाद जय की नींद टूटती है। शीला भी जागती है, हीरो को नार्मल करती है। एक बार आईलवयू बोलती है। तब तक लगता है कि शायद यह हीरो की पत्‍नी है, पर जब अगला डायलॉग बोलती है कि जय हम शादी कर लें। तो अचानक थिएटर में ठहाका लगता है, शायद इंडियन कल्‍चर का सत्‍यानाश हो गया है कि आधी रात बिस्‍तर से निकलकर नायिका हीरो को ये बोले। मेरे मुंह से भी यही निकला कि बस यही देखना बाकी रह गया था।

दिखते हैं अक्षय के सफेद बाल
पता नहीं ऐसा कैसे हो गया। अक्षय ने 30-35 साल के युवा की भूमिका निभाई है। फौजीकट छोटे बाल हैं पर पता नहीं किसकी गलती है। गर्दन के पास सफेद बाल साफ दिखाई देते हैं।

Saturday, March 7, 2009

एक अच्‍छी हॉरर फिल्‍म है 13 बी

एक दोस्त का ट्रान्सफर हो गया तो उसकी विदाई पार्टी मनाने के लिए कल रात 9 से 12 के शो में एक हॉरर फिल्‍म देखने चले गए। फिल्‍म का नाम बहुत अजीब था, 13 बी। यूं तो मुझे हॉरर फिल्‍में खास पसंद नहीं है। पर यह फिल्‍म कुछ अलग तरह की है, बेझिझक देखी जा सकती है।
फिल्‍म के मुख्‍य किरदार हैं मनु यानी आर माधवन। कहानी कुछ इस तरह है कि एक आठ लोगों का परिवार एक नए घर में शिफट होता है, घर का एडेस है 13 बी। यानी एक नई बिल्डिंग की 13वीं मंजिल पर। शिफटिंग के बाद, लगातार घर में रोज दूध फट रहा है और मंदिर वाले कमरे में भगवान की तस्‍वीर टांगने के लिए कील नहीं ठोकी जा सकी है।
अचानक ही एक बजे टीवी ऑन होता है और उस पर एक सीरियल शुरू होता है ‘सब खैरियत’। उस पर आने वाली कहानी बि‍ल्‍कुल उस परिवार से मिलती है। वही आठ लोगों का परिवार सेम वो ही घटनाएं। बस इसी सीरियल और घटनाओं की आड में कहानी आगे बढती है।

इतने में ही मनु के साथ कुछ अजीब होने लगता है, जैसे उसकी मोबाइल पर खींची गई तस्‍वीरें डिस्‍टाकट हो जाती हैं, वो लिफट में जाता है तो लिफट नहीं चलती। बाकी सारे लोगों की तस्‍वीरें भी ठीक आ रही हैं और वो लिफट से भी आ जा सकते हैं। दूसरे ही दिन खुद मनु भी वो एपीसोड देखता है तो उसे समझ आता है कि उसकी कहानी और उस टीवी सीरियल की कहानी बिल्‍कुल एक जैसी है।
मनु अपने पुलिस इंस्‍पेक्‍टर दोस्‍त की मदद लेता है उसे कहानी बताता है, पहले तो मानता नहीं पर जब खुद वो सीरियल देखता है तो वो भी कहानी में इनवोल्‍व हो जाता है। कहानी आगे चलती है तो उसे पता चलता है कि एक दिन हथौडा लेकर एक आदमी उसके घर गया है और उसके परिवार के सभी आठ लोगों का कत्‍ल कर देता है।
मनु उस आदमी की तलाश कर ही रहा होता है कि उसे अगले दिन के एपीसोड में खुद अपना ही चेहरा दिखता है हथोडा लिए हुए। वह अपने आप को परिवार से दूर एक जगह बंद करवा लेता है ताकी उसके परिवार को कोई खतरा न हो सके।
फिल्‍म में हत्‍यारा कौन है यह बात मैं आपको बता नहीं रहा क्‍योंकि आपका मजा किरकिरा हो जाएगा।

इसलिए डिफरेंट है मूवी
फिल्‍मांकन मजेदार है और पागल की एक्टिंग जबरदस्‍त है। एक और खास बात है कि यह पहली हॉरर फिल्‍म होगी जिसमें भूत टीवी में है यानी सुपरनेचुरल पावर और टैक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल वर्ना अब तक की हॉरर फिल्‍मों में साया दिखता और तांत्रिक आता। यहां डॉक्‍टर ही सुपरनेचुरल पावर में विश्‍वास करता है। कहानी में इतनी कसावट है कि नींबू मिर्च, अजीबोगरीब अवाजें और साए दिखाए बिना ही स्‍टोरी एस्‍टेबलिश हो जाती है यानी हॉरर फिल्‍म वो भी बिना किसी भूत के।
हां, शुरुआत के 20-25 मिनट की फिल्‍म थोडी ऊबाउ लग सकती है, पर उसके बाद आपको पलक झपकने का भी मौका नहीं मिलेगा। डायरेक्‍टर ने प्रभावी स्‍टोरी पर काम किया है। फिल्‍म में माधवन के बाद उनकी पत्‍नी बनीं नीतू चंद्रा के हिस्‍से भी दो चार सीन आए है, जिनमें वो अच्‍छी जमी। बहुत दिनों बाद पूनम ढिल्‍लो नजर आई हैं।
फिल्‍म में दो गाने हैं जिनमें से एक 'आसमान ओढ़ कर' स्‍लो है और अच्‍छा लगता है।

हां एक और खास बात
फिल्‍म में रेसेपी बुक की आड में एक रोमांटिक सिक्‍वेंस भी है। आप फिल्‍म देखकर आएं और भाभी घर हों तो टंगडी कबाब जरूर बनाएं :)

(मैंने रात नौ बजे के शो में एक हॉरर फिल्‍म देखी, यह तब है ज‍बकि इस फिल्‍म की कहानी का प्‍लॉट और मेरे मकान की कहानी भी काफी मिलती है, यह सब दूसरी किस्‍त में )

Wednesday, February 25, 2009

स्‍लमडॉग से आगे की कहानी है दिल्‍ली-6



दिल्‍ली 6 वहां से शुरू होती है, जहां स्‍लमडॉग मिलेनियर खत्‍म होती है। स्‍लमडॉग में भारत की गंदगी और गरीबी दिखाई है वहीं दिल्‍ली 6 में भारतीयों का प्‍यार दिखाया गया है।
फिल्‍म की कहानी कुछ इस तरह है कि रोशन यानी अभिषेक बच्‍चन अपनी दादी यानी वहीदा रहमान को भारत छोडने आता है। दादी की अंतिम इच्‍छा है कि वह अपने देश में अपने मकान में ही मरे। घरवाले सभी अमेरिका रहते हैं पर वो अपने देश में ही मरना चाहती हैं। रोशन दादी को लेकर भारत आता है और यहां कि संस्‍कृति से रूबरू होता है और पडोसियों और मोहल्‍ले वालों के प्‍यार से रूबरू होता है।
फिल्‍म की कहानी को आगे बढाने के लिए सहारा लिया गया है काले बंदर और रामलीला का। जिसकी कहानी स्‍टोरी के साथ साथ आगे बढती रहती है। इसी दौरान रोशन को अपनी पडोसन बिटटू से प्‍यार हो जाता है। बिटटू सीधी साधी भारतीय लडकी है, जो अपनी खुद की पहचान बनाना चाहती है, वह इंडियन आइडल में सलेक्‍ट होकर सिंगर बनना चाहती है। पर घर शादी के लिए पिता का विरोध भी नहीं कर सकती, इसलिए जहर पीने का डामा करती
है।
उधर रोशन भारत को समझने की कोशिश करता है, अपनी दादी की मदद के लिए इतने पडोसियों को देखकर कहता है कि वो अमेरिका में अपनों के पास थीं या यहां अपनों के पास हैं।
बुराई का प्रतीक काला बंदर फिल्‍म का मेन कान्‍सेप्‍ट है, इसी के जरिए डायरेक्‍टर ने कई संदेश देना का महत्‍वपूर्ण काम किया है।
बस पूरी फिल्‍म में कई गडबडझाले हैं, जैसे काले बंदर वाली मेन ईवेंट अगर 95 के आसपास की थी, तो टीवी में जिन दूसरी खबरों का इस्‍तेमाल किया जाता है, जैसे चंद्रयान 2008 की हैं। कहानी उसी समय की बताकर कुछ चीजे नए जमाने की हैं जैसे दिल्‍ली मेटो। पर कुल मिलाकर राकेश मेहरा ने एक काले बंदर के सहारे समाज को कई बडे संदेश देने का काम किया है। इस फिल्‍म में भी बहुत सारी दूसरी फिल्‍मों की तरह कहानी को स्‍थापित करने के लिए टीवी चैनलों का भरपूर प्रयोग किया गया है। पर मंकीमैन के समय आईबीएन सेवन दिखाते हैं, खटकता है। गाने बहुत ही कर्णप्रिय हैं और बोल बहुत प्‍यारे हैं। मसकली और गेंदाफूल तो बजोड हैं, वैसे सही मायनों में आस्‍कर की एंटी के लिए एक संपूर्ण भारतीय फिल्‍म तो यही है। सही मायने में इस दौर में आई ये दो फिल्‍में स्‍लमडॉग और दिल्‍ली 6 मिलाकर भारत की सही तस्‍वीर बनाती हैं।
फिल्‍म में कई नए प्रयोग हैं, गाने हीरो हिरोइन नहीं गाते शायद बैकग्राउंड में चलते हैं। अपने करियर में अभिषेक इस फिल्‍म में सबसे खूबसूरत नजर आए हैं, फिल्‍म में भी अपनी कंपनी मोटोरोला के हैंडसेट का प्रचार करते रहते हैं। सीधी सादी से कहानी को खूबसूरती से पिरोया है। जैसे कि दिल्‍ली 6 टाइटल का मतलब पिनकोड के हिसाब से दिल्‍ली के चांदनी चौक इलाके से है उसी तरह कई चीजें सामान्‍य सी हैं पर उनके पीछे सामान्‍य सा कान्‍सेप्‍ट है, जैसे चंद्रयान को सेक्‍स का प्रतीक बताया गया है।

Wednesday, February 4, 2009

चवन्नी चैप के ब्लॉग पर मैं

वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रहामत्ज ने इस बार अपने ब्लॉग चवन्नी चैप में हिंदी टाकिज सीरिज लिखने के लिए मुझे मौका दिया है। यह पूरा की पूरा मैटर मैं यहां भी लगा रहा हूं। पूरी सीरिज उनके ब्लॉग पर उपलब्ध है।
अजयजी ने मुझे मौका दिया मैं इसके लिए उनका आभारी हूं।- राजीव जैन


हिंदी टाकीज
कभी सोचा नहीं था कि फिल्‍म देखने और उससे जुडे अनुभव लिखने का मौका मिलेगा। पर एक दिन अजयजी सर का मेल मिला कि आप हिंदी टाकीज के लिए एक कडी लिखिए तो ऑफ के दिन समय निकालकर यादें ताजा करने बैठ गया। कोशिश की है कि फिल्‍मों से जुडे कुछ अच्‍छे बुरे अनुभव आपके साथ बांट सकूं।

राम तेरी गंगा मैली
मुझे अब याद नहीं कि इस फिल्‍म में क्‍या था, मैं शायद तब बमुश्किल छह-सात साल का रहा होगा। पर यह मेरी पहली फिल्‍म होने के साथ साथ ऐसी इकलौती फिल्‍म है जो मैंने अपने पूरे परिवार के साथ देखी हो। पापा, मां, दादी और हम दोनों भाइयों को लेकर शायद इसलिए यह फिल्‍म दिखाने ले गए हों कि फिल्‍म का टाइटल ‘राम तेरी गंगा मैली’ था। अगर फिल्‍म का पोस्‍टर न देखा हो तो फिल्‍म न देखने वाले को धार्मिक फिल्‍म जैसा अहसास देता है। खैर मुझे एक दो सीन याद आ जाते हैं और यह भी याद है कि हम फिल्‍म खत्‍म होने से थोडा पहले ही ही उठकर चले आए, ताकी फिल्‍म खत्‍म होने के बाद बाहर निकलने के लिए धक्‍का-मुक्‍की न करनी पडे।


मेरी पहली फिल्‍म
इसके बाद मैं शायद स्‍कूल से ही पहली बार फिल्‍म देखने गया था। शायद फिल्‍म का नाम छोटा जादूगर था। हमें सातवीं और आठवीं में साल में एक बार टॉकिज ले जाया जाता था। टैक्‍स फ्री फिल्‍म थी सो टिकट भी दो या तीन रुपए से ज्‍यादा नहीं होता था। क्‍यूंकि उस समय हमारे शहर में पांच रुपए के आसपास तो पूरा टिकट ही था।
इन दिनों वैसे मैं फिल्‍में भले ही न देखता रहा हों, लेकिन फिल्‍म के पोस्‍टर जरूर देखता था। क्‍यूंकि हमारी स्‍कूल बिल्डिंग के एक कॉर्नर में ही पोस्‍टर लगाए जाते थे।

प्रचार का अनोखा स्‍टाइल
उस समय फिल्‍म के प्रचार का स्‍टाइल भी अब के स्टाइल से थोडा अलग हुआ करता था। एक उदघोषक महोदय रिक्‍शे में बैठकर निकलते थे और एक फिल्‍मी गाने के साथ साथ बीच बीच में माइक पर चिल्‍लाते हुए जाते थे ‘आपके शहर के नवरंग टाकिज में लगातार दूसरे सप्‍ताह शान से चल रहा है आंखें। आप देखिए अपने परिवार यार दोस्‍तों को दिखाइये। फिल्‍म में हैं गोविंदा::, चंकी पांडेय।‘ इसी का असर था कि हम स्‍कूल से पैदल लौटते हुए भी इसी तरह चिल्‍लाते हुए अपने मौहल्‍ले तक पहुंचते थे।

एग्‍जाम के बाद फिल्‍म का साथ
नवीं क्‍लास के बाद हम लोग बडे बच्‍चों की गिनती में आ गए थे। वैसे टाकिज तक तो मैं रोज जाता था। मेरे शहर कि सार्वजनिक लाइब्रेरी भी उसी बि‍ल्डिंग में ही थी और मैं दसवीं तक रोज लाइब्रेरी रोज जाता था। दसवीं और उसके बाद तो एग्‍जाम के बाद पिक्‍चर देखना जाना बीएससी फाइनल ईयर के लास्‍ट एग्‍जाम तक उत्‍सव की तरह चला। यही वह दिन होता था जब मां को कहकर जाते कि खाना जल्‍दी बना दो पिक्‍चर देखने जाना है और छह से नौ बजे के शो के लिए भी वो कुछ न कहती थीं।

कोटा और हर टेस्‍ट
पीएमटी के लिए एक साल डॉप किया और कोचिंग करने हम कई दोस्‍त कोटा चले गए। कोचिंग में हर सात या चौदह दिन में रविवार को यूनिट के हिसाब से टेस्‍ट होता था। इसकी रैं‍किंग लिस्‍ट भी बनती थी। यानी टैस्‍ट होने तक मारकाट मची रहती थी। संडे को 3से 5 बजे तक टेस्‍ट हुआ करता था। और उसके बाद छह से नौ बजे तक के शो के लिए हम लोग ऑटो करके टॉकिज तक सबसे पहले पहुंचने की कोशिश करते। इस साल जितनी फिल्‍में मैंने टाकिज में देखीं उतनी एक साल में अभी तक कभी नहीं देखीं। घर से बाहर मनोरंजन का इकलौता साधन यही हुआ करता था। फिल्‍म के बाद लौटते और खाना खाकर सो जाते अगले दिन से पिफर वही भागदौड।
इस दौर में जुडवा जैसी हिट फिल्‍म भी देखी, तो जैकी श्राफ की भूला देनी वाली फिल्‍म ‘’ भी देख डाली। जुडवां की टिकट खिडकी पर मैंने पहली बार कोटा के टॉकिज में लोगों को डंडे खाते देखा।(मेरे अपने गांव राजगढ में टिकट जुगाडना मेरे लिए बडी बात नहीं थी। हमारे शहर का लाइब्रेरियन ही पार्ट टाइम टिकट कीपर हुआ करता था) बाद में इंतजार इतना करना पडा कि छह से नौ की टिकट नहीं‍ मिली तो जुडवा का नौ से बारह बजे का शो देखना पडा।

एक फिल्‍म और कई दिन की चुप्‍पी
फायर एक ऐसी फिल्‍म थी जिसने मेरे घर में काफी गफलत कराई। शायद बीएससी सैकंड ईयर की बात थी। मम्‍मी पापा शहर से बाहर थे। मैं और मेरा बडा भाई घर पर थे। भाई ने हम दोनों का खाना बनाया। मां घर पर नहीं होती तो हमेशा ऐसा ही होता था। इतने में मेरा एक दोस्‍त आया और बोला कि तगडी फिल्‍म लगी है फायर, देखने चलें क्‍या। मैंने उसके बारे में सुन रखा था, इसलिए मैंने उसे मना किया। मैंने कहा कि भाई को बोलकर चलेंगे क्‍या? पता नहीं कैसे हुए कि भाई के दोस्‍तों ने भी फिल्‍म का प्‍लान बना रखा था। मेरी तो अपने भाई से ज्‍यादा खुला हुआ नहीं था पर मेरे दोस्‍त ने उनसे कहा कि हम फिल्‍म देखने जा रहे हैं आप भी चलो। उन्‍होंने कहा कि हां मुझे भी जाना है। मेरे हिसाब से उन्‍हें तब तक फायर की स्‍टोरी लाइन का पता नहीं था। हम दोनों चले गए। छोटा शहर था एक ही हॉल था बॉक्‍स में 25 के आसपास ही सीट थी। हम दोनों भाई एक लाइन में ही आगे पीछे ही बैठे थे। फिल्‍म में जब शबाना आजमी और नंदिता दास के अंतरंग दृश्‍य आने लगे तो मैंने दोस्‍त से कहा यार चल यहां से भाई भी यही हैं, अच्‍छा नहीं लगता। दोस्‍त नहीं उठा, हम कुछ करते इससे पहले ही हमारे भाई की मित्र मंडली में से मेरे भाई सहित कुछ लोग बाहर चले गए। और मैं नौ बजे पूरी फिल्‍म देखकर ही घर लौटा। भाई ने लौटने के बाद कुछ नहीं पूछा, घर में शांति रही। और हम दोनों भाइयों ने शरमाशर्मी में कई दिन तक आपस में बात भी नहीं की।
मेरी दिल्‍ली 2002 से 2005 तक दिल्‍ली-नोएडा रहा। तीन साल में टॉकिज पर बमुश्किल आठ-दस फिल्‍में देखी होंगी, लेकिन अगर टीवी पर देखी गई फिल्‍में मिलाकर कहूं तो शायद अपने जीवन की सबसे ज्‍यादा फिल्‍में मैंने इन्‍हीं दिनों में देखीं।
दिल्‍ली में शुरुआती दिन थे, मैं दिल्‍ली के बारे में ज्‍यादा कुछ नहीं जानता था। ऑफ वाले दिन मयूर विहार से सीधी बस में बैठकर कनॉट प्‍लेस के लिए निकलता। रीगल में अगर कोई ठीकठाक फिल्‍म होती तो देख लेता, क्‍यूंकि अकेले या किसी एक और दोस्‍त के साथ कहीं और टॉकिज ढूंढने से अच्‍छा यही होता। अग्निवर्षा जैसी फिल्‍म मैंने इसी टाकिज में देखी। कोंडली से दरियागंज में गोलछा तक पहुंचना आसान हुआ करता था, देवदास इसी हॉल में देखी गई।
इन्‍हीं दिनों की बात है मुगल ए आजम कलर में दोबारा रिलीज हुई। अट़टा पर नोएडा में पहला म‍ल्‍टीप्‍लेक्‍स बनकर तैयार हुआ। बचपन से ही इस फिल्‍म को बडे पर्दे पर देखने की इच्‍छा थी। इसलिए री रिलीज के अगले दिन ही हम देखने पहुंच गए। फिल्‍म में मजा भी आया पर मेरे पीछे बैठे एक प्रेमी युगल की कलाकारी और फिल्‍म में उर्दू के डायलॉग का मजाक उडाना बीच बीच में परेशान करता रहा।

एमजेएमसी की मस्‍ती
सही मायनों में फिल्‍म को मस्‍ती करते हुए एंजाय करना मैंने इन्‍हीं दिनों में सीखा । सत्‍तर अस्‍सी रुपए से ज्‍यादा की टिकट खरीदकर ग्रुप में फिल्‍म देखने का मजा यहीं लिया। धूम और रंग दे बसंती जैसी फिल्‍में देखीं। सही मायनों में यही वही ऐज थी जब मैं नौकरी करते हुए फिर से कॉलेज लाइफ जी रहा था और हम एक साथ लडके, लडकियां यूनिवर्सिटी के बाद आमतौर पर बिना किसी को बताए हुए ही फिल्‍म चले जाते थे।

पीसी और फिल्‍में
2005 और उसके बाद सीडिज इतनी सुलभ हो गई कि कई सालों से जिन जिन फिल्‍मों का नाम सुना था, देख नहीं पाया। वे सभी कम्‍प्‍यूटर पर देखीं। वाटर, मैंने गांधी को नहीं मारा, निशब्‍द जैसे विवादास्‍पद फिल्‍में शामिल है। और अब लैपटॉप लेने के बाद तो फिल्‍म देखना और आसान हो गया है। मैंने जुरासिक पार्क से लेकर पुरानी देवदास तक जो मेरा मन करता है। कहीं से भी पैन डाइव सीडी, नेट या किसी की हार्ड डिस्‍क कॉपी करके देखीं। दो घंटे या उससे थोडे ज्‍यादा में फिल्‍म खत्‍म। यानी कुल मिलाकर अब फिल्‍म देखना आसान हो गया है।

:::और अब
टाकिज में अकेले जाने का मन नहीं करता और फिल्‍म देखना इतना महंगा हो गया है कि अब सावरिया, गजनी, वैलकम टू सज्‍जनपुर जैसे अच्‍छी और बडे बजट वाली फिल्‍में ही टॉकिज में देखता हूं। बाकी लैपटॉप पर देखकर ही काम चला लेता हूं।

Tuesday, January 27, 2009

आइये दो करोड रुपए जीतें

‘स्‍लमडॉग मिलेनियर’ फिल्‍म देखकर मैंने उस फिल्‍म में पूछे गए सारे सवाल इकटठे करने की कोशिश की है। अब आप भी खेलकर देखिए कि अगर स्‍लम के जमाल की जगह हू वान्‍ट़स टु मिलेनियर में अनिल कपूर के सामने आप बैठे होते तो कितने रुपए जीत सकते थे।

एक हजार रुपए के लिए पहला सवाल
1: वर्ष 1973 की हिट फिल्‍म जंजीर का हीरो कौन था?
अ- अमिताभ बच्‍चन
ब- राजेश खन्‍ना
स- देव आनंद द- विनोद खन्‍ना

चार हजार रुपए के लिए दूसरा सवाल
2: हमारे राष्‍टीय चिन्‍ह जिसमें तीन शेर बने होते हैं, उसके नीचे क्‍या लिखा है
अ- सत्‍य की जीत होती है
ब- असत्‍य की जीत होती है
स- फैशन की जीत होती है
द- रुपए की जीत होती है

16 हजार रुपए के लिए तीसरा सवाल
3: भगवान राम के दाएं हाथ में क्‍या होता है
अ- फूल
ब- तलवार
स- बच्‍चा
द- तीर कमान


एक लाख रुपए के लिए चौथा सवाल
4: दर्शन दो घनश्‍याम गाना किस भारतीय कवि ने लिखा ?
अ- सूरदास
ब- तुलसीदास
स- मीराबाई
द- कबीर
(हालांकि फिल्म मे´ इस सवाल का जवाब सूरदास बताया गया है, लेकिन इसके चारों ऑप्शन ही गलत हैं। सही जवाब गोपाल सिंह नेपाली है।)
दस लाख रुपए के लिए पांचवां सवाल
5: अमेरिकन सौ डॉलर पर किस अमेरिकन हस्‍ती का चित्र बना हुआ है
अ- जॉर्ज वाशिंगटन
ब- फ्रेंकलिन रुजवेल्‍ट
स- बेंजमिन फ्रेंकलिन
द- अब्राहिम लिंकन

पच्‍चीस लाख रुपए के लिए छठा सवाल
6: रिवाल्‍वर का अविष्‍कार किसने किया।
अ- सैमुअल कॉल्‍ट
ब- ब्रूस ब्राउनिंग
स’ डान वेसन
द ‘ जेम्‍स रिवाल्‍वर

पचास लाख रुपए के लिए सातवां सवाल
7: कैंब्रिज सर्कस इंग्‍लैंड के किस शहर में है।
अ-आक्‍सफोर्ड
ब-लीडस
स-कैंब्रिज
द-लंदन

एक करोड के लिए आठवां सवाल
8- किस क्रिकेटर से सबसे ज्‍यादा फर्स्‍ट क्‍लास शतक बनाए हैं
अ सचिन तेंदुलकर
ब रिकी पॉटिंग
स ब्रायन लारा
द जेक जेकॉब्‍स


9: दो करोड रुपए के लिए आखिरी सवाल
अलेकजेंडर की किताब द थ्री मस्‍कीटियर में पहले दो मस्‍कीटियर एथोज और पोरथोज थे। तीसरे मस्‍कीटियर का नाम क्‍या है।
अ अरामिस
ब कार्डिनल रिशेलू
स अर्गनन
द पल्‍नचेट

Thursday, January 22, 2009

आओ स्‍लमडॉग मिलेनियर देखें



जयपुर में साहित्‍य सम्‍मेलन शुरू होने वाला था। पहले दिन स्‍लमडॉग मिलेनियर वाली किताब “क्‍यू एंड ए” के विश्‍वास स्‍वरूप को आना था। मैं किताब नहीं पढ पाया इसलिए मैंने सोचा कि स्‍लम डॉम मिलेनियर देखकर ही उसकी कहानी का अंदाजा लगा लिया जाए ताकि उनको सुनने और समझने में कोई दिक्‍कत न आए। इत्‍तेफाक की बात थी‍ कि ऑफिस से लौटते समय किसी ने कहा कि नेट पर स्‍लमडॉग पूरी है, चाहिए क्‍या।
बस मैं ले आया और रात भर जगकर मैंने स्‍लमडॉग देखी।
फिल्‍म अच्‍छी है बस कुछ बात खटकती है जिसे आगे आप पढेंगे, बस एक चीज है कि दुनिया में वो चर्चा में आई जिसमें हमारी गरीबी दिख रही है, मुंबई की गंदगी दिख रही है। पर गालियों को छोड दिया जाए तो फिल्‍म अच्‍छी है।

आइए अब आपको बताऊं फिल्‍म की कहानी
जमाल मलिक एक मुसलिम बच्‍चा है जो मुंबई की एक झुग्‍गी बस्‍ती में है, दंगों में हिंदुओं ने उसकी मां को मार दिया। उसका एक बडा भाई है, जो अब किसी डॉन के लिए काम करता है और वह खुद किसी कॉल सेंटर में चाय सर्व करता है। इत्‍तेफाक से कौन बनेगा करोडपति में पहुंच जाता है। यहां अनिल कपूर (शो के प्रस्‍तोता) उससे सवाल पूछ रहे हैं और एक दिन का एपिसोड खत्‍म होने तक एक करोड रुपए जीत चुका है। अनिल कपूर को जमाल पर शक हो जाता है कि एक चाय वाला “हू वान्‍ट़स टु मिलेनियर” में कैसे जीत सकता है। इसी शक में अनिल उसे पुलिस के हवाले कर देता है और पुलिस से पूछताछ में पता चला है कि उसकी जिंदगी कैसे गुजरी।

हर सवाल का जवाब कहीं न कही उसकी जिंदगी से जुडा होता है और कहानी आगे रफ़तार पकडती है। कहानी फ़लैशबैक में चलती है।
मां की मौत के बाद जमाल और उसके भाई सलीम को बच्‍चों से भीख्‍ा मंगवाने वाले गिरोह के लोग पकड लाते हैं। वो जमाल की आंख निकालकर अंधा कर ही रहे होते हैं कि दोनों भाई वहां से बाहर निकलते हैं और देश भर में घूमते हुए वापस दिल्‍ली पहुंचते हैं। इस बीच में छोटी जिंदगी में अनाथ बच्‍चे जिंदगी के बहुत सारे तजुर्बे प्राप्‍त करते हैं।
बच्‍चों की बाल सुलभ अदाएं फिल्‍म की कहानी के साथ रोचकता बनाए रखती है। फिल्‍म में जमाल के रूप में तीनों ही बच्‍चों ने बहुत ही बेहतरीन अभिनय किया है।
कहानी के साथ साथ बाद में पता चलता है कि जमाल सही था और उसने कोई फर्जीवाडा नहीं किया। अगले दिन शो फिर होता है और जमाल दो करोड रुपए जीत जाता है।
वैसे यह फिल्‍म भारत में आज रिलीज होने को है। मैंने अंग्रेजी वर्जन देखा है।

अब इसकी एक कमजोरी
यह बात इस फिल्‍म को गोल्‍यडन ग्‍लोब मिलने के बाद जयपुर में पत्रकारों से बातचीत में फिल्‍म के ही एक करदार इमरान खान ने भी कही। कि झुग्‍गी का एक बच्‍चा बेधडक अंग्रेजी बोलता है और हू वान्‍टस टु मिलेनियर में पहुंच जाता है। यह बात हिंदी के दर्शक पचा नहीं पाएंगे। यही बात मुझे कई बार क्लिक की। पर फिल्‍म अंग्रेजी में है इसलिए हो सकता है ऐसा करना पडा हो अब हिंदी वर्जन में क्‍या होगा यह देखने की बात है।
फिल्‍म का म्‍यू‍जिक बहुत ही अच्‍छा है, जय हो और रिंगा रिंगा रहमान के खास अंदाज में हैं। पूरी फिल्‍म में काम लिया गया बैकग्राउंड म्‍यूजिक भी अच्‍छा है।

Friday, December 26, 2008

गजब की है गजनी


बहुत दिनों बाद टॉकिज में फिल्‍म देखी, बीच में कई देखी भी तो आप लोगों से शेयर नहीं कर पाया। न समय मिला और न ही मूवी इतनी अच्‍छी थी कि आपसे शेयर करना जरूरी होता।
पर आज गजनी देखी। और मेरी राय है कि अगर आप नई फिल्‍में देखने के जरा भी शौकीन हैं, तो यह जरूर देखें। कुछ लोग इसे एक्‍शन मूवी कहकर भी प्रचारित कर रहे हैं। पर सच्‍चाई यह है कि एक्‍शन के साथ साथ यह एक अच्‍छी प्रेम कहानी भी है। यह एक प्रेम कहानी ही थी, कि इतना बडा बिजनेसमैन बदला लेने के लिए इतना कुछ करता है, वो भी तब जब वह शॉर्ट टर्म मैमोरी का पेशेंट है।
फिल्‍म की कहानी कुछ ऐसी है कि संजय सिंघानिया यानी आमिर खान एक सेल्‍यूलर कंपनी के मालिक हैं। एक दिन अचानक एक खबर सुनते हैं कि उनका किसी से चक्‍कर चल रहा है।
न्‍यूज चैनलों पर जब यह खबर फलैश होती है तो वे भी उससे मिलने की इच्‍छा जताते हैं। वे कल्‍पना यानी असीन ने मिलने पहुंचते हैं और उसके चुल‍बुलेपन पर फिदा हो जाते हैं। बिना अपनी असलियत बताए लौट आते हैं। प्रेम कहानी धीरे धीरे आगे बढती है। इतनी बडी कंपनी के मालिक और एक स्‍टगलिंग मॉडल के प्रेम प्रसंग में कई सारी नई चीजे हैं, जिससे आपका मनोरंजन होता है।
(जैसे कि गोलगप्‍पे के ठेले पर क्रेडिट कार्ड नहीं चलता) चुलबुली हीरोइन के कई ऐसे मजेदार क्रिएटिव आइडिया हैं जैसे विकलांग ल‍डकियों को गेट पार करवाना।

कहानी और फलैशबैक में प्रेम कहानी आसानी से चल रही होती है कि इस बीच काम के सिलसिले में कल्‍पना को गोवा जाना होता है। इस बीच टेन में उसके साथ एक ऐसा हादसा होता है कि उसके पीछे कहानी का विलेन गजनी लग जाता है। किडनी गिरोह का सरगना और अब एक दवा कंपनी का मालिक गजनी धर्मात्मा कल्‍पना को मार देता है।

इसके बाद संजय यानी आमिर पूरी फिल्‍म में उससे बदला लेने में जुटे रहते हैं। एक ऐसा आदमी जो किसी भी बात को सिर्फ 15 मिनट तक ही याद रख सकता है। उसका संघर्ष, इस सबमें नयापन है, जो लोग थोडी बहुत मारपीट सहन नहीं कर सकते वे लोग भी इस तरह के नएपन से परिचित हो सकते हैं। मेडिकल स्‍टूडेंट के रूप में जिया खान ने भी ठीकठाक काम किया है, वो उनके केस में रुचि दिखाकर कहानी को लगातार आगे बढाती हैं। गजिनी के रूप में विलेन प्रदीप सिंह रावत हैं, जिनकी आमिर ने खूब पिटाई की।
प्रसून जोशी ने सुंदर गीत लिखे हैं फिल्‍म में एक कविता भी लिखी हुई आती है, जिसे बाद में आगे गीत के रूप में आगे बढा दिया है। ए.आर. रहमान का संगीत बहुत अच्‍छा है। कुल मिलाकर आमिर ने फिल्‍म में जबरदस्‍त मेहनत की है, खासकर अपनी बॉडी और लुक्‍स के लिए। फिल्‍म के निर्देशक: ए आर मुरूगदोज हैं, ये वही हैं, जिन्‍होंने ऑरिजनल गजिनी बनाई थी। वैसे दक्षिण की अभिनेत्री असीन ने भी इस फिल्‍म में गजब की एक्टिंग की है, वे उत्‍तर भारतीयों की भी पसंद बनकर उभरेंगी।

पर शायद
मुझे फिल्‍म में दो गडबडियां लगीं एक तो आमिर खान प्‍लेन में फाउनटेन पेन से डायरी लिख रहे होते हैं। मैं कभी प्‍लेन में नहीं बैठा पर शायद प्‍लेन में फाउनटेन पैन काम नहीं करता।

और मरते समय हीरोइन कल्‍पना उसे संजय कहकर संबोधित करती है, जबकि तब तक की कहानी के हिसाब से वह आमिर को सचिन नाम से जानती थीं। (हॉल में मुझे ऐसा सुनाई दिया, कन्‍फर्म करना होगा)

Sunday, October 12, 2008

बर्थ डे और वन नाइट एट ए कॉल सेंटर

कल मेरा बर्थ डे था, दिन भर घर पर ही था, शाम को ऑफिस जाना था। निकलने से पहले दो दोस्‍तों को जेकेके कॉफी पीने बुलाया तो अचानक प्‍लान बना कि फि‍ल्‍म देखी जाए और ऑफिस से छुटटी के लिए बॉस को फोन किया और उन्‍होंने छुटटी भी दे दी। दो ऑप्‍शन थे किडनैप देखी जाए या हैलो क्‍योंकि चार लोगो में यही दो फिल्‍में कॉमन थीं, जो हममें से किसी ने नहीं देखी।
यह फ‍िल्‍म चेतन भगत की मशहूर किताब वन नाइट एट ए कॉल सेंटर पर आधारित थी, इसलिए मैंने किडनैप पर इसको तरजीह दी। कुल मिलाकर कहानी है एक कॉल सेंटर और उसमें काम करने वाले छह लोगों की। पिछली कई फिल्‍मों की तरह यह भी फ़लैशबैक में ही थी। सलमान खान को कैटरीना कैफ अजीब लगने वाली यह पूरी कहानी सुनाती है।
कहानी के छह किरदार है
पहला सिद़धार्थ यानी सरमन जोशी – कॉल सेंटर की उस टीम का हैड, अपने साथ काम करने वाली प्रियंका (गुल पनाग, से प्‍यार करता है। लेकिन प्रियंका की मां चाहती है कि उसकी बेटी किसी एनआरआई के साथ घर‍ बसाए। मां की जिद के आगे प्रियंका भी उससे शादी न करने की सोचती रहती है।
तीसरा है वरुण (सोहेल खान (- स्‍टॉरंग बॉडी वाला वरुण गुसैल है, लेकिन जो मन आता है वही करता है। फिल्‍म में हंसी मजाक करने और उसकी स्‍पीड को बनाए रखने का काम यही करता है। यूं तो वह दिलफेंक है पर आफिस में ही काम करने वाली मॉडल
ईशा कोप्पिकर को चाहता है।
पांचवां किरदार है राधिका, अमृता अरोडा के रूप में शादीशुदा भारतीय नारी। सास के तानों से परेशान है फिर भी रात भर कॉल सेंटर में काम करने के बाद दिन भर सास की सेवा करती है, पति बेंगलूर में काम करता है। आधी फिल्‍म बाद पता चलता है कि उसका पति किसी और लडकी को चाहता है।
मिलिटरी अंकल, आर्मी से रिटायर्ड हैं, बेटा नफरत करता है और अमेरिका में रहता है। उन्‍हें गम है कि वे अपने पोते को दादा के हिस्‍से का प्‍यार नहीं दे पा रहे। इस स्‍टोरी के सबसे बुजुर्ग हैं।
एक रात उनकी नौकरी पर तलवार लटकी है। सारे लोग अलग अलग निजी समस्‍याओं को लेकर परेशान हैं। सरमन और गुल पनाग की समस्‍या है कि अगली सुबह गुल को देखने के लिए लडकेवाले आने वाले हैं। उनकी लव स्‍टोरी का आखिरी दिन है।
ईशा का मॉडलिंग असाइनमेंट कैंसिल हो गया। राधिका को आज ही पता चला है कि उसके पति की जिंदगी में कोई और लडकी है। मिलिटरी अंकल को उनके बेटे ने पोते से दूर रहने की हिदायत दी है। ऐसी मनहूस रात में सभी लोग एक टवेरा में जाते हैं, पूरी बोतल गटक चुका वरुण गाडी डाइव कर रहा होता है और कार एक पुल पर लटक जाती है। मदद के लिए मोबाइल निकालते हैं तो पता चलता है कि नेटवर्क नहीं है। इतने में डेशबोर्ड के पास पडा एक टूटा हुआ बिना सिम का मोबाइल बजता है। सामने से भगवान बोल रहे होते हैं। वे चार सूत्री संदेश देते है ::: दिमाग, :::: और आत्‍मविश्‍वास।
बस सभी लोग इस संदेश को आगे फैलाने की कसम खाते हैं और इतनी देर में रेसक्‍यू टीम आ जाती है और सभी लोग बच जाते हैं।
इसके बाद सभी की जिदंगी का अंदाज बदल जाता है। पहले अपने बॉस को बहार निकलवाकर अपनी नौकरी बचाते हैं। उसके बाद सब कुछ फिल्‍म की हैप्‍पी एंडनिंग।

हां अंत में सिदधार्थ और वरुण अपनी कंपनी खोलते हैं। सिदधार्थ प्रियंका से शादी कर लेता है, वो काम छोडकर अब बीएड कर रही है, बच्‍चों की स्‍कूल टीचर बनना चाहती है। राधिका हाउसवाइफ है और उसके पति ने अपनी गलती मान ली। मॉडलिंग छोड ईशा अब एनजीओ में है और मल्‍टीनेशनल्‍स से फंड रेज करती है।

खास बात
पहली ये कि फिल्‍म कामचलाऊ है, लेकिन परिवार के साथ शायद नहीं देखी जा सकती। सीन ऐसे नहीं हैं, पर कॉल सेंटर पर आधरित फिल्‍म है इसलिए कई चीजें खुलेआम दिखाई हैं। जैसे पब के बाहर टेवेरा जैसी बडी गाडी का मिसयूज। यह लाइन आपको फिल्‍म देखने के बाद समझ आएगी।
फिल्‍म में कई चीजों का खूब एड किया है, जैसे एनडीटीवी का टॉक शो, टवेरा। सनफीस्‍ट बिसकुट और कोला की वाट भी लगाई है।
फिल्‍म में एक सॉ‍लिड आइडिया है
रेडियो मिर्ची के नाम से वरुण, राधिका के पति को रात तीन बजे फोन करता है कि हम आपके बताए गए एक एडेस पर बुके भेज सकते हैं। बताइये किसको भेजना चाहते है। माता, पिता, बहन, प्रेमिका या पत्‍नी को। उधर से जवाब आता है कि सोलानी नाम की उसकी प्रेमिका को वह बुके भेजना चाहता है। बस इधर राधिका का दिल टूट जाता है।
फिल्‍म के बीच में बहुत सारे फोन आ गए, इसलिए कई अच्‍छे डायलॉग्‍स और सीन्‍स की वाट लग गई इसलिए आपको भी कुछ दिखे तो बताएं।

Friday, September 26, 2008

गांव की जिंदगी और खूबसूरत कहानी यानी `सज्जनपुर´


बुधवार को ऑफ था और `वेलकम टू सज्जनपुर´ देखकर मनाया। श्याम बेनेगल ने ग्रामीण पृष्ठभूमि पर खूबसूरत फिल्म बनाई है। (अब आप यह मत कह दीजिए कि राजीव आजकल कोई काम-वाम है कि नहीं, फिल्में ही देखते रहते हो। पता नहीं ऐसा कैसे हो गया, इस महीने कई फिल्में देख डालीं और आपकी किस्मत देखिए कि फिल्में थी भी अच्छीं।)
तो अब सुनिए कहानी

`वेलकम टू सज्जनपुर´ कहानी है एक गांव की, जहां इकलौता महादेव यानी श्रेयस तलपड़े ग्रेजुएट है, गांव के बाकी लोग उससे अपनी चि_ी लिखवाने और पढ़वाने आते हैं, अब यही उसका धंधा हो गया है। इसलिए सारे गांव का दुख दर्द और खुशी की खबरें उनके पास रहती है। पिछली कई फिल्मों की तरह (ए वेडनस डे, बचना ए हसीनो) यह फिल्म भी फ्लैशबैक में है। चि_ी लिखवाने आए लोगों से बातचीत के साथ-साथ ही फिल्म पीछे भी चलती रहती है। महादेव के पास एक दिन उनकी दूसरी क्लास की क्लासमेट कमला (अमृता राव)आती है। तब पता चलता है कि महादेव भी कितना रसिक हुआ करता था। फिल्म में एक सीन पर जरा गौर कीजिए।दूसरी क्लास का दृश्य है महादेव क्लास का सबसे होनहार बच्चा है। गुरुजी बाकी बच्चों को उसकी तरह बनने के लिए कहते हैं। उधर, कमला की हैंडराइटिंग सबसे खराब है। क्लास के बाद कमला, महादेव से कहती है कि तू मुझे अपनी तरह सुंदर लिखना सिखा दे तो मैं तुझे लaå दूंगी। शरारती महादेव कहता है `गाल के लaå खिलाएगी क्या´! कमला हां करती है और शरारती महादेव उसे `किस` कर देता है और टीचर के देखने पर बखेड़ा हो जाता है। यूं तो फिल्मों में `किस´ करना आजकल सामान्य सी बात है, पर इस फिल्म के लिहाज से सीन थोड़ा गड़बड़ सा लगता है।


हां तो कहानी आगे बढ़ती

हैकमला का पति (कुणाल कपूर) कमाने के लिए मुंबई गया हुआ है और कमला शादी के बाद चार साल से सास के साथ गांव में ही रह रही है। कमला खत लिखवाने और पढ़वाने के बहाने महादेव के पास आती रहती है और महादेव के मन में बचपन का प्यार जागने लगता है। अब उसके मन का खोट धीरे धीरे उसकी लिखी चि_ी में दिखने लगता है और वह उसके पति को उकसाने वाली चि_ी लिखता है कि उनका रिश्ता टूट जाए। लेकिन जब उसका जवाब आता है तो महादेव को पता चलता है कि कमला का पति बंसी उसे कितना चाहता है। पैसों के लिए वह गुदाü बेचने को तैयार है। बाद में महादेव को गलती का अहसास हो जाता है और वह अपनी जमीन गिरवी रखकर बंसी को पचास हजार रुपए सौंप देता है। बंसी और कमला झुग्गी खरीदकर एक साथ मुंबई रहने लग जाते हैं।
अब सुनिए गांव और कहानी

महादेव और कमला की कहानी के अलावा गांव में कई और कहानी साथ साथ चलती रहती हैं। उनमें से एक है ब्रिगेडियर की बाल विधवा बहू की कहानी। गांव के इकलौते हॉçस्पटल का कम्पाउंडर (रवि किशन) उसकी खूबसूरती पर फिदा है, इलाज कराने आती है तो दिल दे बैठता है। हालांकि ब्रिगेडियर ऐसा होने पर ख्ाुश है पर गांव वाले दोनों को फांसी पर लटका देते हैं।गांव में एक महिला (ईला अरुण) की बेटी को मंगल दोष है। उसको दूर करने के लिए कुत्ते से शादी कराई जाती है। `अपनी भी कोनो जिंदगी है कि नहीं´ का सैट फॉमूüला रखने वाली लड़की समझदार है वह मंडप से भाग आती है। फिल्म के लास्ट सीन में पता चलता है कि अब वह हीरो महादेव की पत्नी हो गई है।इन दो कहानियों से श्याम बेनेगल ने गांव में अंधविश्वास और रुçढ़वादी समाज को दिखाया है। इसके अलावा एक और कहानी है, जो लोकतंत्र में आस्था को और मजबूत करती है। गांव में दबंग के सामने कोई भी चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं रखता, सबसे मजबूत मुçस्लम दावेदार खुद को आईएसआई का एजेंट बताने पर नाम वापस ले लेता है, लेकिन लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए उन दबंगों के सामने एक किन्नर चुनाव लड़ता है। हालांकि उसे डराया धमकाया जाता है, लेकिन महादेव की मदद और गांव वालों के साथ के कारण जीत जाता है। यह एक सीन है जिसे ख्ाूबसूरती से फिल्माया गया है। फिल्म में किन्नर को चुनाव लड़ने पर दबंगों के डराने के बाद उसका आकर महादेव के पास रोना और उसकी मदद की गुहार करने वाला सीन श्याम बेनेगल ने दिल से फिल्माया है। अगर आप थोड़े भी संवेदनशील हैं तो रो सकते हैं।
फिल्म में गाने भी हैं, बोल अच्छे हैं। कुल मिलाकर फिल्म देखने लायक है।


बस एक बात, जो मुझे कई बार फिल्म में लगी कि क्या आज भी सज्जनपुर जैसा कोई गांव है!

Tuesday, September 23, 2008

तो आखिर खिसक गया कॉमनमैन का दिमाग


`ए वैडनेस डे´ फिल्म में नसरुद्दीन शाह का यह डायलॉग तगड़ा हिट करता है कि जिस दिन कॉमनमैन का दिमागा खिसक गया तो आतंकवाद खत्म हो जाएगा। हाल के दिनों में आतंकवाद पर बनी यह सबसे नई फिल्म है। लेखक-निर्देशक नीरज पांडेय की इस फिल्म में नसरुद्दीन शाह और अनुपम खेर (प्रकाश राठौड़, कमिश्नर मुंबई पुलिस) ने दमदार अभिनय किया है। फिल्म का कथानक बहुत ही कसावट भरा हुआ है। फिल्म दिखाती है कि एक कॉमनमैन मोबाइल-लैपटॉप की मदद और अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति से किसी बिçल्डंग की छत पर बैठे बैठे ही मुंबई की पुलिस को बेवकूफ बनाकर तीन घंटे में किस तरह चार खूंखार आंतकवादियों को मरवा देता है। काम खत्म होने के बाद सब्जी का थैला लेकर लौट जाता है।
फिल्म शुरू होती है नसरुद्दीन शाह के पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखाने जाने से और वहीं से फिल्म इतनी तेज गति पकड़ती है कि अंत तक नहीं रुकती। फिल्म को देखकर लगता है कि अगर स्क्रिप्ट सॉलिड हो तो न तो आइटम सॉन्ग की जरूरत है और न ही बदनदिखाऊ दृश्यों की। दीपल शॉ जैसी गरमा-गरम हिरोइन के बावजूद फिल्म में एक भी `सीन´ छोडि़ए, गाना तक नहीं है। इसके बावजूद फिल्म कहीं भी बोर नहीं करती।
हालांकि, फिल्म में थोड़ा मनोरंजन दिखाने के लिए तीन डायलॉग है।

पहला : रिपोर्टर दीपल शॉ का बिजलीबाबा से इंटरव्यू

दूसरा : पुलिस मुख्यालय में हैकिंग के लिए बुलाए गए एक युवा का अपनी प्रेमिका को थोड़ी देर में आने के लिए  आश्वस्त करना। 

तीसरा : फिल्म में डॉन (तब तक पता नहीं चलता कि नसरुद्दीन शाह कौन हैं) को ऑफिस से लौटते वक्त पत्नी का सब्जी लाने का आग्रह। 

फिल्म वास्तविकता के आसपास है, फिल्म दिखाती है कि आम आदमी में आतंकवाद के खिलाफ गुस्सा इतना ज्यादा हो गया है कि वह अब उससे अपने तरह से निपटना चाहता है। मुंबई में धमाकों के बाद गुस्साए नसरुद्दीन शाह इस बात का खुलासा भी करते हैं। कमिश्नर जब उनसे पूछते हैं कि वे बदला लेना क्यों चाहते हैं, क्या उनका कोई धमाकों में खोया है। वो कहते हैं हां, एक था नाम नहीं पता। बस रोज ट्रेन में मिलता था, मुस्करा देता था, कल ही उसने अपनी रिंग दिखाई कि उसकी शादी होने वाली है। शुक्र था कि धमाकों के दिन मेरी ट्रेन मिस हो गई और वे बच गए।
क म ही फिल्मों में दिखने वाले जिम्मी श्ोरगिल ने भी एटीएस में इंस्पेक्टर के रॉल को बखूबी निभाया है। डायरेक्टर ने फिल्म में छोटी छोटी बातों का बड़ा ख्याल रखा गया है मसलन मुçस्लम आतंकवादियों से बात करते वक्त पुलिस अधिकारी का ताबीज छुपाना  ताकि कहीं उसे भी यह न लगे वह भी मुसलमान है।
(मेरी सलाह है कि आप फिल्म जरूर देखें, इसलिए कहानी जानबूझकर नहीं लिख रहा हूं ताकी आपका मजा रहे बरकरार)
अपनी राय जरूर बताएं

Saturday, September 20, 2008

इससे, बचना ए हसीनो!



यशराज की नई फिल्म बचना ए हसीनो ( रिलीज हुए काफी समय हो गए, पर इसे मेरे लिए नई कह सकते हैं) कल ही डीवीडी पर देखी। फिल्म में कहानी है एक दिलफेंक युवा `राज´ यानी रणवीर कपूर के तीन अफेयर्स की।
पहली कहानी


18 साल का युवा `राज´ दोस्तों के साथ स्विट्जरलैंड टूर पर जाता है, वहां वह अपनी दिलफेंक अदा से ट्रेन छूट रही लड़की का साथ पाने के लिए अपनी ट्रेन भी मिस करता है। एक रात स्कूटी पर सफर करके अपने आखिरी स्टॉपेज तक पहुंचता है। इस बीच हिरोइन माही यानी मिनीषा लांबा से टाइमपास करता है। एयरपोर्ट पहुंचने पर 24 घंटे में जो कुछ होता है, वह अपने अंदाज में बीफ्र कर ही रहा होता है कि हिरोइन सुन लेती है। और उसे पता चलता है कि वह फ्रॉड है और सिर्फ टाइमपास कर रहा था। पहली कहानी उसके मन में प्यार के प्रति नफरत जन्म लेकर यहीं दम तोड़ देती है।
दूसरी कहानी


शुरू होती है मुंबई में बिपासा बसु के साथ। एक मल्टीनेशनल में सीनियर पॉजिशन वाला युवा राज इससे पहले तक किसी के साथ `लिव इन रिलेशनशिप´ में रहता है। काफी पैसे बचाने के बाद वह एक फ्लैट लेता है और वहां पड़ोसी राधिका यानी बिपाशा बशु से मिलता है। धीरे धीरे बातचीत होती है और वो बिना शादी ही एक साथ रहने लगता है(हमनें दोनो फ्लैट के बीच की दीवार गिरा दी, फिल्म का डायलॉग्), करीब साल भर बाद राज का ट्रांसफर हो जाता है और वह राधिका को सिडनी जाने की बात बताता है। राज की राजगिरी को राधिका इतने दिनों से प्यार समझ रही होती है और वह उसे शादी के लिए कहती है। राज सीधे मना नहीं कर पाता और अपने दोस्त से फामूüला पूछता है। फाइनली जिस दिन चर्च में शादी करनी होती है उस दिन सुबह ही राधिका को बिना बताए सिडनी चला जाता है। राधिका उसका चर्च में रात तक इंतजार करके चली जाती है और उधर हीरो नई सैटिंग की तैयारी में !
कहानी नंबर तीन


हीरो अंडरवीयर-बनियान में रोड पर बैंच पर बैठा होता है कि टैक्सी ड्राइवर तीसरी हीरोइन गायत्री यानी दीपिका पादुकोण आती है। वह सीधे पूछती है आप ऐसी ड्रेस पहनकर ही सड़क पर बैठे रहते हैं या कोई और बात है। इतने में ही ऊपर से एक लड़की कपड़े फेंकती है तो समझ में आ जाता है कि माजरा क्या था। थोड़ी गपशप के बाद पता चलता है कि वह बिजनेस स्कूल की स्टूडेंट है और जरूरत पूरा करने के लिए दिन में शॉप पर नौकरी और रात में टैक्सी चलाती है। पहली ही मुलाकात में वह बता देती है कि वह शादी में विश्वास नहीं करती और उसकी जिंदगी साथी के बिना ही ठीक है। हीरो भी अपनी जैसी मानकर उससे सैटिंग में लग जाता है।
एडिटर्स कट


अब तक मैं यही समझ रहा था कि इतनी शानदार फिल्में बनाने वाले बैनर यशराज की अक्ल पर क्या पत्थर पड़ गए हैं, जो युवाओं को प्रभावित करने वाली स्टोरी की बात कहकर ऐसी घटिया फिल्म बनाई है, जिससे हम निजी जिंदगी में कोई प्रेरणा नहीं ले सकते। प्रेरणा तो दूर कई जगह तो लड़कियां इतनी जल्दी सैट होने लगती हैं कि आपको कहानी ही फर्जी लगने लगती है।


हीरो चला गंगा नाहने


गायत्री से कुछ मुलाकातें होती हैं कि अब राज का हीरो वाला स्वरूप जागने लगता है कि उसने पहले वाली दो लड़कियों क ो उसने धोखा दिया है। शायद यह पहली हिंदी फिल्म हो जिसमें हीरो खुद को कमीना और धोखेबाज कहते हुए स्वीकार करता हो। अब हीरो निकल पड़ता है प्रायश्चित करने और पहली हिरोइन माही के घर जाता है। वहां वह जैसे-तैसे उसे मनाने की कोशिश करता है पता चलता है कि धोखा खाई माही को अब प्यार में विश्वास नहीं है, यहां तक कि उसके दो बच्चे जरूर है, लेकिन उसने अपने पति से 15 साल में कभी रोमांस नहीं किया। बाद में राज के प्रवचन काम आ जाते हैं और वह माही को पति से प्यार करने की सलाह देकर आ जाता है। राज अपना दूसरा प्रायश्चित पूरा करने के लिए इटली जाता है, जहां उसकी पहली रूममेट राधिका (जो अब एक बड़ी मॉडल हो चुकी है) से क्षमा मांगता है। वह कई शर्तें रखती है और बाद में सुलह हो जाती है। इसके बाद हीरो सिडनी लौटता है। गायत्री प्यार का इजहार करती है और फिल्म की हैप्पी एंडिंग हो जाती है।


मेरी सलाह


इतनी अनैतिक और अजीब कहानी के बाद भी यह समझ से परे है कि फिल्म हिट कैसे हो गई। गाने बेशक अच्छे हैं, फिल्मांकन उससे भी सुंदर। तीन सुंदर हीरोइन है और एक लड़कियों का चहेता हीरो। मिनिषा कि ही एçक्टंग ही थोड़ी कमजोर है, बिपाशा और दीपिका हॉट लग रही हैं। साथ में यशराज का बैनर, शायद इन्हीं सब ने फिल्म को हिट बनाया। यशराज की फिल्म समझकर अब उसे पारिवारिक मानना खतरे से खाली नहीं है। फिल्म में कई लिपलॉक हैं। बिपाशा ने तो मॉडल होने के नाते जितना अपना बदन çछपाया, उससे ज्यादा दिखाया है। फिल्म न देखें सिर्फ कहानी पढ़कर काम चलाएं!




अगर आप भी कुछ राय रखते हों तो जरूर दें