आज ही घर से लौटा हूं। घर(राजगढ़) से सीधे जयपुर की बस में बैठा, बांदीकुई पहुंचने तक बस खचाखच हो गई। बाद में मुझे पता चला कि बस दौसा में भी अंदर होकर जाएगी। इसलिए सिंकदरा से मैंने बस चेंज करने की सोची। सिंकदरा में यूपी रोडवेज की बस में सवार हो गया। राजस्थान रोडवेज का सिकंदरा से जयपुर तक का किराया 42 रुपए है। यूपी रोडवेज में बैठा इसलिए किराए का अंदाजा नहीं था। मैंने कंडेक्टर को भ्0 का नोट थमा दिया। कंडेक्टर ने ठीक है कहा और चला गया। मुझे लगा कि टिकट दे रहा होगा। और मैं एसएमएस करने में व्यस्त हो गया। थोड़ी देर बाद जब मुझे एससास हुआ कि कंडेक्टर ने टिकट नहीं दिया है तो मैंने उसकी सीट तक जाकर पूछताछ शुरू की। कंडेक्टर साहब ने फरमाया कि किराया भ्2 रुपए है और आपने भ्0 रुपए दिए थे। यानी कंडेक्टर साहब पूरे पैसे ही गोल करना चाहते थे। मैंने पांच रुपए और दिए कि साहब टिकट तो दे दो। बेमन से घूर कर साहब ने मुझे टिकट दिया और फिर खुल्ले न होने का बहाना कर दो का सिक्का दे दिया, यानी साहब एक रुपए तो खा ही गए। उसके बाद मैं अगले स्टैंड से चढ़ी सवारियों से उसके लेनदेन पर गौर करता रहा। कुल मिलाकर मैंने पाया कि हर स्टैंड पर उसने एक बेटिकट सवारी तो बिठा ही रखी थी। मैंने मगजमारी से बचने के लिए मामले को तूल नहीं दिया पर सोचता रहा कि भाई लोगों को भले ही एक दो रुपए का फायदा कर रहा हो पर सरकार को कितने का चूना लगा रहा है। फिर मुझे अहसास हुआ कि यूपी रोडवेज की बसें राजस्थान की तुलना में इतनी खस्ताहाल कैसे हैं।
इसमें मैं यह भी जोड़ना चाहूंगा कि मेरी राजस्थान रोडवेज वाली बस का कंडेक्टर इतना शरीफ था कि बांदीकुई और सिकंदरा में एक जगह उतरी सवारी का उतरने से पहले टिकट चैक किया और उसने पाया कि उन तीन सवारियों ने एक स्टॉप पहले का टिकट ले रखा था। भाई ने उनसे और पैसे लेकर ही दम लिया। यानी एक बेहद ईमानदार और दूसरा खूंखार बेइमान।
Showing posts with label जिंदगी लाइव. Show all posts
Showing posts with label जिंदगी लाइव. Show all posts
Sunday, August 30, 2009
Wednesday, June 3, 2009
आखिर बेच डाली छह सौ किलो रद्दी

कई शौक भारी पड़ जाते है। ऐसा ही है मेरा और अखबार का रिश्ता। खाना मिले न मिले अखबार जरूर हो। मेरे इस प्रेम के चक्कर में मेरे बिस्तर के चारों और हमेशा अखबारों का ढेर होता है।


मेरे सारे परिचित और दोस्त इससे वाकिफ है। हाल तक मैं जिस मकान में रहता था वहां करीब आठ बाई आठ का स्टोर रूम तो खचाखच भर गया। आते जाते परिवार वालों की टोकाटाकी के बावजूद मैंने अखबार नहीं बेचे। पर अब रूम चेंज करना था तो करीब सात çक्वंटल रद्दी एक जगह से दूसरी जगह शिट करना माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने से कहीं ज्यादा कठिन था। वो भी तब जब आप पहले से ही व्यस्तता के चरम पर हों। इसी चक्कर में इन दिनों कई दिन तक ब्लॉगिंग की दुनिया से दूर था।


पर शिçटंग की मजबूरी और किराए के मकान में इतनी रद्दी मेनटेन रख पाना बड़ा मुश्किल है। 28 मई को मैंने रूम चेंज कर लिया और तीन मई तक मैं उस रद्दी को बेचने का मानस न बना सका। पर फाइनली डेडलाइन आ गई और पुराने मकान में नया किराएदार आ गया तो मुझे अपनी 610 किलो रद्दी बेचनी ही पड़ी।
Monday, April 27, 2009
काश! ऑनलाइन मिलता खाना

ये साला ऑनलाइन रहने का चस्का भी अजीब है। बाहर निकलना हो और पारा 42 डिग्री पार हो तो घर से निकलने का मन ही नहीं करता। कम से कम जब नेट अच्छी स्पीड में चल रहा हो।
यूं रोज रात देर से खाने की आदत है। पर कल एक दोस्त की सगाई थी, इसलिए शाम का खाना जल्दी खा लिया। सुबह सुबह राजगढ (मेरा पैतृक घर) से मैं जयपुर आ गया। घर पहुंचा तो बाई नदारद। बस अब खाना बनने का कोई चांस नहीं था।
यूं तो खाना बनना भी आता है, पर अब इतने दिन हो गए कि खाना बनाने का मन नहीं करता। भूख लगी थी, इसलिए “काश ऐसा होता कि खाना भी ऑनलाइन मिलता का स्टेटस मैसेज” जीमेल पर लगाकर कुछ जुगाड करने लगा।
जब तक किचन से लौटकर आया, चार पांच भारी भरकम सुझाव मिल चुके थे। उनमें से एक लगभग ऐसा ही था, जैसा मैं खुद चाहता था कि काश खाने का ऑर्डर भी ऑनलाइन चलता। यूं तो पिज्जा हट और मैकडी वाले आर्डर लेते ही हैं। पर बात यूं मजाक मजाक में ही चल रही थी खाना भी ऑनलाइन मिलता तो मजा आ जाता। न तो किचन में मेहनत करनी पडती न कुछ और!
Thursday, April 23, 2009
असमंजस, क्या हम सही हैं?
आफिस के बाद आजकल रोज चाय पीने का चस्का लग गया है। हम लोगों की एक मंडली भी तैयार हो गई है, जो अमूमन रोज चाय पीने जाती हैं। दो बजे के बाद सुबह लगभग चार बजे तक यहां बैठना हमारी आदत में शुमार हो गया है।
रोज वहां चाय के बहाने अड्डा जमाने से हम लोगों की चायवाले (जो दुकान पर चाय बनाता है) से भी जान पहचान हो गई है। पीने को पानी मांगते हैं तो ज्यादातर एक प्लास्टिक की बोतल थमा देता है। चार चाय बोलेंगे मन हुआ तो छह बनाकर ले आता है।
अभी कल परसों ही पता चला उसके ठंडे और पानी के अच्छे टेस्ट का राज। भाई ने बताया कि बस फ्रीजर से बोतल निकाली ढक्कन हटाया और रैपर फाडकर फेंकने से बिसलरी की बोतल पानी की आम बोतल में बदल जाती है।
मुझे एकाएक झटका लगा कि क्या हम रोज बिसलरी पी रहे हैं।
कल चाय पीने सिर्फ हमारी बेचलर्स यूनियन (मैं, तरुण और ऋचीक)
ही गई थी। हमने सोचा कि इस भाई को समझाया जाए कि क्यूं मालिक को चूना लगा रह। है। बातचीत की तो बोला, इतना काम करता हूं पता नहीं सेठ का कितना फायदा कर देता हूं। दिन भर लोगों को लूटते हैं अब आप लोगों को ठंडा पानी और अच्छी चाय पिला देते हैं तो इस सेठ का क्या बिगड जाएगा।
(कल ऋचीक ने खासतौर पर यह पोज खिंचवाया )
बातचीत और समझाइश का दौर चला तो पता चला कि वो तो अपने तरुण भाई के गांव के पास का ही रहने वाला है।
कहने लगा आप लोग इस चाय वाले को याद तो रखोगे। फिर अपने सेठ के कारनामे बताने लगा कि कैसे तीन रुपए की चाय पांच रुपए और दस रुपए कि ठंडी बिसलरी बीस रुपए में बेची जाती है। सेठ कहां ले जाएगा इतने पैसे थोडे आप लोगों पर खर्च हो जाएंगे तो सही रहेगा।
कल यह सब पता नहीं था, कल ही आधा ब्लॉग लिख चुका था पर आधी बात आज जानीं। अब तय नहीं कर पा रहा कि वो अकेले ही गलती कर रहा है या हम भी उसके काम में शामिल होकर और बुरा कर रहे हैं। वैसे तो मुझे लगता है कि शायद हमारे प्यार से बोलने और हमारी गपशप चायवाले को सुकून देते हों। रातभर की उसकी माथाफोडी में हम उसे अच्छे लगने लगे हों। पर मैं खुद तय नहीं कर पा रहा कि हम गलत हैं या सही।
रोज वहां चाय के बहाने अड्डा जमाने से हम लोगों की चायवाले (जो दुकान पर चाय बनाता है) से भी जान पहचान हो गई है। पीने को पानी मांगते हैं तो ज्यादातर एक प्लास्टिक की बोतल थमा देता है। चार चाय बोलेंगे मन हुआ तो छह बनाकर ले आता है।
अभी कल परसों ही पता चला उसके ठंडे और पानी के अच्छे टेस्ट का राज। भाई ने बताया कि बस फ्रीजर से बोतल निकाली ढक्कन हटाया और रैपर फाडकर फेंकने से बिसलरी की बोतल पानी की आम बोतल में बदल जाती है।
मुझे एकाएक झटका लगा कि क्या हम रोज बिसलरी पी रहे हैं।
कल चाय पीने सिर्फ हमारी बेचलर्स यूनियन (मैं, तरुण और ऋचीक)
ही गई थी। हमने सोचा कि इस भाई को समझाया जाए कि क्यूं मालिक को चूना लगा रह। है। बातचीत की तो बोला, इतना काम करता हूं पता नहीं सेठ का कितना फायदा कर देता हूं। दिन भर लोगों को लूटते हैं अब आप लोगों को ठंडा पानी और अच्छी चाय पिला देते हैं तो इस सेठ का क्या बिगड जाएगा।
(कल ऋचीक ने खासतौर पर यह पोज खिंचवाया )
बातचीत और समझाइश का दौर चला तो पता चला कि वो तो अपने तरुण भाई के गांव के पास का ही रहने वाला है।
कहने लगा आप लोग इस चाय वाले को याद तो रखोगे। फिर अपने सेठ के कारनामे बताने लगा कि कैसे तीन रुपए की चाय पांच रुपए और दस रुपए कि ठंडी बिसलरी बीस रुपए में बेची जाती है। सेठ कहां ले जाएगा इतने पैसे थोडे आप लोगों पर खर्च हो जाएंगे तो सही रहेगा।
कल यह सब पता नहीं था, कल ही आधा ब्लॉग लिख चुका था पर आधी बात आज जानीं। अब तय नहीं कर पा रहा कि वो अकेले ही गलती कर रहा है या हम भी उसके काम में शामिल होकर और बुरा कर रहे हैं। वैसे तो मुझे लगता है कि शायद हमारे प्यार से बोलने और हमारी गपशप चायवाले को सुकून देते हों। रातभर की उसकी माथाफोडी में हम उसे अच्छे लगने लगे हों। पर मैं खुद तय नहीं कर पा रहा कि हम गलत हैं या सही।
Wednesday, April 1, 2009
आज तो सही में गार्ड ने भगा दिया!

अखबार की नौकरी है। दिनभर सोना और देर रात तक आफिस में रुकना अपनी आदत में शुमार है। शायद इसी बात को ध्यान में रखकर अपने मित्र सुधाकर ने मेरे जन्मदिन पर आफिस के नोटिस बोर्ड पर ऐसा ही एक कार्टून लगाया जिसमें मैं ढाई बजे तक आफिस में हूं और गार्ड मुझे जाने के लिए संकेत दे रहा है।
पर कल रात तो सचमुच यही हो गया। मेरा छोटा भाई भी आजकल आफिस के किसी प्रोजेक्ट में फंसा हुआ है। इसलिए देर से घर जाता है। कल रात मैं निकलने की तैयारी में ही था कि उसने ऑनलाइन देखकर पूछ लिया कि घर चल रहे हो क्या। मैंने कहा हां। तो उसने कहा कि आप कितनी देर में बाहर निकल रहे हो। मैंने कहा कि दस मिनट में, और मैं अपने काम में लग गया।
इतना होते होते करीब पंद्रह मिनट लग गए और ढाई बज गए।
और सचमुच गार्ड आ गया। शायद उसे नींद आ रही थी। बोला कितनी देर में जाओगे ढाई बज गए।
मुझे लगा कि शायद आज वो कार्टून वाली बात हकीकत बन गई है। और मैं घर पहुंचते ही इसे लिखने में जुट गया। क्योंकि आज ही तो पूजाजी की लिखी बात पढी कि सच्चा ब्लॉगर वही है, जो जिंदगी में घटी हर बात में कुछ ऐसा ढूंढे कि एक ब्लॉग लिख सके।
Monday, March 16, 2009
क्या किसी ने देखे हैं भूत

आफिस से काम खत्म होने के बाद अक्सर हम चाय पीने चले जाते हैं। कल रात भी हम निकल पडे चाय पीने। जब तक चाय बनती हमारे एक मित्र सुधाकरजी ने भूतों के अस्तित्व का सवाल छेड दिया। हुआ यूं कि कल ही उनके एक सालेजी ने उन्हें अपना साथ कई साल पहले घटा एक वाकया सुनाया था। सुधाकरजी का कहना है कि वे पुलिस में हैं और उनकी बात पर उन्हें पूरा यकीन है, क्यूंकि न तो वो झूठ बोलते हैं न ही कभी मजाक करते हैं।
किस्सा कुछ यूं था कि उन समेत तीन पुलिसवाले एक जीप से काम खत्म करके घर जा रहे थे कि गाडी गवर्नमेंट हॉस्टल (जयपुर का एक चौराहा) से गुजरी वहां एक सुंदर महिला ने रात करीब दो बजे लिफट मांगी। पुलिस वालों ने मदद के वास्ते गाडी रोकी तो महिला ने गोपालपुरा चौराहे तक छोडने को कहा, उन लोगों को सांगानेर तक जाना था इसलिए लिफट दे दी गई।
महिला को छोडते समय उन्होंने महिला के पैरों की तरफ देखा तो पंजे उल्टे थे। सभी के होश उड गए और डाइवर ने गोली की स्पीड से गाडी दौडा दी।
इसके बाद तो बस किस्सों की बाढ आ गई। हमारे एक और साथी तरुण और दिनेशजी ने भी एक के बाद एक किस्से सुना दिए। दिनेशजी ने भी इस तर्क का समर्थन किया कि उन्होंने भी एक बार इस तरह के एक साए को महसूस किया है। 1979 की बात कर रहे थे वो कि उन्होंने अपने पीछे एक साए का पीछा करते हुए देखा और अचानक वो गायब हो गया।
खैर ये किस्से तो करीब दो घंटे में खत्म हो गए पर मैं यह सोचता रहा कि क्या किसी ने भूत देखे हैं।
खैर
पता नहीं लेकिन मैंने आजतक जितने किस्से सुने उनमें बताया गया कि भूत या चुडैल के पंजे उल्टे होते हैं
मिठाई या सफेद चीज का पीछा करते हैं
हनुमानजी का नाम लेने पर गायब हो जाते हैं
अपन भी जय हनुमानजी की करते हुए घर पहुंच गए
और सुबह होने तक सोचते रहे कि क्या है कहीं भूत का अस्तित्व ?
इस बीच नींद लग गई और यह चिंतन अधूरा ही रह गया।
Saturday, February 28, 2009
यार, किसी कॉलगर्ल का नंबर दे !

एक पुराना दोस्त घर आया। पहले एक कोचिंग सेंटर खोल रखा था, कुछ नया करने की सूझी तो इंश्योरेंस कंपनी ज्वाइन कर ली। मेरा फेवर चाहता था तो कुछ रेंफरेंस मांगने लगा। मैंने कहा यार ये इंश्योरेंस एजेंट इतने हो गए हैं कि आजकल हर घर में कोई न कोई मिल ही जाता है। तो बोला यार ऐसा कर किसी कॉलगर्ल का नंबर दे।
मैंने कहा यार मुझे क्या पता
बोला यार पत्रकार हो, तुम्हारे तो लिंक होते हैं, कहीं कोई पकडी गई होगी, किसी से जान पहचान होगी। मैंने कहा तुझे क्या करना है।
बोला, इंश्योरेंस करना है!
मैंने कहा कॉलगर्ल के इंश्योरेंस का क्या फंडा है
बोला यार काम के साथ साथ समाजसेवा भी करो, मैंने कहा इसका मतलब बोला कि इंश्योरेंस उस आदमी को बेचो जिसको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत हो। मैंने कहा कि कॉलगर्ल ही क्यूं
बोला यार चालीस पार कौनसी कॉलगर्ल काम की रहती है, न जॉब सिक्योरिटी न कोई सामाजिक प्रतिष्ठा इसलिए इंश्योरेंस की जरूरत तो सबसे ज्यादा उन्हें ही है। और कंपनी को क्या फर्क पडता है कि इंश्योरेंस का खरीदार कौन है। मैंने कहा बात तो सही है।
वो कहने लगा कि काम करो पर नए स्टाइल से, शायद ये यूनिक आइडिया है और इसके हिसाब से ही मेरा काम आगे बढ जाए। मैंने कहा सही है पर यार अपन के पास ऐसा कोई रेफरेंस नहीं है।
फिर उसने सुनाया कॉलगर्ल को इंश्योरेंस पॉलिसी समझाने का पहला किस्सा
आप भी गौर फरफाइये
बोला किसी से रेफरेंस लेकर नंदपुरी में एक ब्यूटी पार्लर की आड में चल रहे अडडे में कॉलगर्ल से मिलने गया। वहां जाकर फोन किया। वो नीचे आने को तैयार नहीं हुई तो ऊपर चला गया। दिल में धुकधुकी थी कि किसी ने देख लिया या रेड पडी तो क्या होगा। मुलाकाता नहीं थी तो उसने अंदर पहुंचने पर मिसकॉल करके देखा। मिलने के लिए आई समझाने की कोशिश की तो बोली हम पढे लिखे नहीं है, ये सब नहीं समझते आपको सॉरी बोलते हैं इसके लिए।
दोस्त कहता है कि इससे पहले कोई एक बॉडी बिल्डर कमरे से निकलकर बाहर आ गया था, वह डर के मारे कांप रहा था। कहीं बाहर निकलते ही पीट न दे। खैर वो थैंक्स बोलकर बाहर निकल आया। बाइक स्टार्ट की और चौराहे पर पहुंचकर बंद कर ली। पांच मिनट रुका एक पुडिया खाई और फिर जाकर दम लिया। यह कॉलगर्ल से मिलने के बाद की हालत थी , फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी है।
उसी क्रम में मुझ से ही पूछ लिया कि कॉलगर्ल का नंबर है क्या, उसे उम्मीद है कि एक बार वह कॉलगर्ल को कन्वेंस करने में कामयाब हो गया तो बस उसकी निकल पडेगी।
Friday, February 27, 2009
जरा सा बदलाव

नाचना मेरे बस की बात नहीं है। पर आजकल मैं अपनी कमियां दूर करने में लग रहा हूं। दोस्तों की शादियों में उनके घरवालों की यही शिकायत रहती थी कि तुम लोग काम बहुत करते हो, समझदार हो पर डांस वैगरह नहीं करते। थोडा एंजाय भी किया करो, इस बार एक दोस्त की शादी में मैं भी कूद पडा डांस करने
सारी शर्म हया छोडकर इतना डांस किया कि अगले दिन शाम तक पैरों में दर्द होता रहा, पर एक बात जो मुझे समझ में आई कि जिंदगी में जरा सा बदलाव भी ताजगी ला देता है।
जिंदगी में छोटी छोटी बाते नयापन लाती हैं। मुझे हमेशा यही झिझक रहती थी कि डांस की प्रोपर टेनिंग नहीं ली तो लोग यूं ही उछलते कूदते देखकर हसेंगे। यूं भी शादी में मैं पूरे समय रहता था पर एक कोने में खडे होकर लोगों को डांस करते देखता था, पर इस बार मैं डांस करने वालों के बीच था। इतना नाचा कि पसीने में तरबतर और सूट से शर्ट में आ गया। बस फिर क्या था, मेरे डांस की फोटो एक दोस्त न ऑरकुट पर लगाई है और कैप्शन दिया है कि सब पियेले हैं।
चलिए इस बहाने ही सही
सभी मस्त होकर नाचते तो नजर आए ।
Wednesday, February 4, 2009
चवन्नी चैप के ब्लॉग पर मैं
वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रहामत्ज ने इस बार अपने ब्लॉग चवन्नी चैप में हिंदी टाकिज सीरिज लिखने के लिए मुझे मौका दिया है। यह पूरा की पूरा मैटर मैं यहां भी लगा रहा हूं। पूरी सीरिज उनके ब्लॉग पर उपलब्ध है।
अजयजी ने मुझे मौका दिया मैं इसके लिए उनका आभारी हूं।- राजीव जैन
हिंदी टाकीज
कभी सोचा नहीं था कि फिल्म देखने और उससे जुडे अनुभव लिखने का मौका मिलेगा। पर एक दिन अजयजी सर का मेल मिला कि आप हिंदी टाकीज के लिए एक कडी लिखिए तो ऑफ के दिन समय निकालकर यादें ताजा करने बैठ गया। कोशिश की है कि फिल्मों से जुडे कुछ अच्छे बुरे अनुभव आपके साथ बांट सकूं।
राम तेरी गंगा मैली
मुझे अब याद नहीं कि इस फिल्म में क्या था, मैं शायद तब बमुश्किल छह-सात साल का रहा होगा। पर यह मेरी पहली फिल्म होने के साथ साथ ऐसी इकलौती फिल्म है जो मैंने अपने पूरे परिवार के साथ देखी हो। पापा, मां, दादी और हम दोनों भाइयों को लेकर शायद इसलिए यह फिल्म दिखाने ले गए हों कि फिल्म का टाइटल ‘राम तेरी गंगा मैली’ था। अगर फिल्म का पोस्टर न देखा हो तो फिल्म न देखने वाले को धार्मिक फिल्म जैसा अहसास देता है। खैर मुझे एक दो सीन याद आ जाते हैं और यह भी याद है कि हम फिल्म खत्म होने से थोडा पहले ही ही उठकर चले आए, ताकी फिल्म खत्म होने के बाद बाहर निकलने के लिए धक्का-मुक्की न करनी पडे।

मेरी पहली फिल्म
इसके बाद मैं शायद स्कूल से ही पहली बार फिल्म देखने गया था। शायद फिल्म का नाम छोटा जादूगर था। हमें सातवीं और आठवीं में साल में एक बार टॉकिज ले जाया जाता था। टैक्स फ्री फिल्म थी सो टिकट भी दो या तीन रुपए से ज्यादा नहीं होता था। क्यूंकि उस समय हमारे शहर में पांच रुपए के आसपास तो पूरा टिकट ही था।
इन दिनों वैसे मैं फिल्में भले ही न देखता रहा हों, लेकिन फिल्म के पोस्टर जरूर देखता था। क्यूंकि हमारी स्कूल बिल्डिंग के एक कॉर्नर में ही पोस्टर लगाए जाते थे।
प्रचार का अनोखा स्टाइल
उस समय फिल्म के प्रचार का स्टाइल भी अब के स्टाइल से थोडा अलग हुआ करता था। एक उदघोषक महोदय रिक्शे में बैठकर निकलते थे और एक फिल्मी गाने के साथ साथ बीच बीच में माइक पर चिल्लाते हुए जाते थे ‘आपके शहर के नवरंग टाकिज में लगातार दूसरे सप्ताह शान से चल रहा है आंखें। आप देखिए अपने परिवार यार दोस्तों को दिखाइये। फिल्म में हैं गोविंदा::, चंकी पांडेय।‘ इसी का असर था कि हम स्कूल से पैदल लौटते हुए भी इसी तरह चिल्लाते हुए अपने मौहल्ले तक पहुंचते थे।
एग्जाम के बाद फिल्म का साथ
नवीं क्लास के बाद हम लोग बडे बच्चों की गिनती में आ गए थे। वैसे टाकिज तक तो मैं रोज जाता था। मेरे शहर कि सार्वजनिक लाइब्रेरी भी उसी बिल्डिंग में ही थी और मैं दसवीं तक रोज लाइब्रेरी रोज जाता था। दसवीं और उसके बाद तो एग्जाम के बाद पिक्चर देखना जाना बीएससी फाइनल ईयर के लास्ट एग्जाम तक उत्सव की तरह चला। यही वह दिन होता था जब मां को कहकर जाते कि खाना जल्दी बना दो पिक्चर देखने जाना है और छह से नौ बजे के शो के लिए भी वो कुछ न कहती थीं।
कोटा और हर टेस्ट
पीएमटी के लिए एक साल डॉप किया और कोचिंग करने हम कई दोस्त कोटा चले गए। कोचिंग में हर सात या चौदह दिन में रविवार को यूनिट के हिसाब से टेस्ट होता था। इसकी रैंकिंग लिस्ट भी बनती थी। यानी टैस्ट होने तक मारकाट मची रहती थी। संडे को 3से 5 बजे तक टेस्ट हुआ करता था। और उसके बाद छह से नौ बजे तक के शो के लिए हम लोग ऑटो करके टॉकिज तक सबसे पहले पहुंचने की कोशिश करते। इस साल जितनी फिल्में मैंने टाकिज में देखीं उतनी एक साल में अभी तक कभी नहीं देखीं। घर से बाहर मनोरंजन का इकलौता साधन यही हुआ करता था। फिल्म के बाद लौटते और खाना खाकर सो जाते अगले दिन से पिफर वही भागदौड।
इस दौर में जुडवा जैसी हिट फिल्म भी देखी, तो जैकी श्राफ की भूला देनी वाली फिल्म ‘’ भी देख डाली। जुडवां की टिकट खिडकी पर मैंने पहली बार कोटा के टॉकिज में लोगों को डंडे खाते देखा।(मेरे अपने गांव राजगढ में टिकट जुगाडना मेरे लिए बडी बात नहीं थी। हमारे शहर का लाइब्रेरियन ही पार्ट टाइम टिकट कीपर हुआ करता था) बाद में इंतजार इतना करना पडा कि छह से नौ की टिकट नहीं मिली तो जुडवा का नौ से बारह बजे का शो देखना पडा।
एक फिल्म और कई दिन की चुप्पी
फायर एक ऐसी फिल्म थी जिसने मेरे घर में काफी गफलत कराई। शायद बीएससी सैकंड ईयर की बात थी। मम्मी पापा शहर से बाहर थे। मैं और मेरा बडा भाई घर पर थे। भाई ने हम दोनों का खाना बनाया। मां घर पर नहीं होती तो हमेशा ऐसा ही होता था। इतने में मेरा एक दोस्त आया और बोला कि तगडी फिल्म लगी है फायर, देखने चलें क्या। मैंने उसके बारे में सुन रखा था, इसलिए मैंने उसे मना किया। मैंने कहा कि भाई को बोलकर चलेंगे क्या? पता नहीं कैसे हुए कि भाई के दोस्तों ने भी फिल्म का प्लान बना रखा था। मेरी तो अपने भाई से ज्यादा खुला हुआ नहीं था पर मेरे दोस्त ने उनसे कहा कि हम फिल्म देखने जा रहे हैं आप भी चलो। उन्होंने कहा कि हां मुझे भी जाना है। मेरे हिसाब से उन्हें तब तक फायर की स्टोरी लाइन का पता नहीं था। हम दोनों चले गए। छोटा शहर था एक ही हॉल था बॉक्स में 25 के आसपास ही सीट थी। हम दोनों भाई एक लाइन में ही आगे पीछे ही बैठे थे। फिल्म में जब शबाना आजमी और नंदिता दास के अंतरंग दृश्य आने लगे तो मैंने दोस्त से कहा यार चल यहां से भाई भी यही हैं, अच्छा नहीं लगता। दोस्त नहीं उठा, हम कुछ करते इससे पहले ही हमारे भाई की मित्र मंडली में से मेरे भाई सहित कुछ लोग बाहर चले गए। और मैं नौ बजे पूरी फिल्म देखकर ही घर लौटा। भाई ने लौटने के बाद कुछ नहीं पूछा, घर में शांति रही। और हम दोनों भाइयों ने शरमाशर्मी में कई दिन तक आपस में बात भी नहीं की।
मेरी दिल्ली 2002 से 2005 तक दिल्ली-नोएडा रहा। तीन साल में टॉकिज पर बमुश्किल आठ-दस फिल्में देखी होंगी, लेकिन अगर टीवी पर देखी गई फिल्में मिलाकर कहूं तो शायद अपने जीवन की सबसे ज्यादा फिल्में मैंने इन्हीं दिनों में देखीं।
दिल्ली में शुरुआती दिन थे, मैं दिल्ली के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता था। ऑफ वाले दिन मयूर विहार से सीधी बस में बैठकर कनॉट प्लेस के लिए निकलता। रीगल में अगर कोई ठीकठाक फिल्म होती तो देख लेता, क्यूंकि अकेले या किसी एक और दोस्त के साथ कहीं और टॉकिज ढूंढने से अच्छा यही होता। अग्निवर्षा जैसी फिल्म मैंने इसी टाकिज में देखी। कोंडली से दरियागंज में गोलछा तक पहुंचना आसान हुआ करता था, देवदास इसी हॉल में देखी गई।
इन्हीं दिनों की बात है मुगल ए आजम कलर में दोबारा रिलीज हुई। अट़टा पर नोएडा में पहला मल्टीप्लेक्स बनकर तैयार हुआ। बचपन से ही इस फिल्म को बडे पर्दे पर देखने की इच्छा थी। इसलिए री रिलीज के अगले दिन ही हम देखने पहुंच गए। फिल्म में मजा भी आया पर मेरे पीछे बैठे एक प्रेमी युगल की कलाकारी और फिल्म में उर्दू के डायलॉग का मजाक उडाना बीच बीच में परेशान करता रहा।
एमजेएमसी की मस्ती
सही मायनों में फिल्म को मस्ती करते हुए एंजाय करना मैंने इन्हीं दिनों में सीखा । सत्तर अस्सी रुपए से ज्यादा की टिकट खरीदकर ग्रुप में फिल्म देखने का मजा यहीं लिया। धूम और रंग दे बसंती जैसी फिल्में देखीं। सही मायनों में यही वही ऐज थी जब मैं नौकरी करते हुए फिर से कॉलेज लाइफ जी रहा था और हम एक साथ लडके, लडकियां यूनिवर्सिटी के बाद आमतौर पर बिना किसी को बताए हुए ही फिल्म चले जाते थे।
पीसी और फिल्में
2005 और उसके बाद सीडिज इतनी सुलभ हो गई कि कई सालों से जिन जिन फिल्मों का नाम सुना था, देख नहीं पाया। वे सभी कम्प्यूटर पर देखीं। वाटर, मैंने गांधी को नहीं मारा, निशब्द जैसे विवादास्पद फिल्में शामिल है। और अब लैपटॉप लेने के बाद तो फिल्म देखना और आसान हो गया है। मैंने जुरासिक पार्क से लेकर पुरानी देवदास तक जो मेरा मन करता है। कहीं से भी पैन डाइव सीडी, नेट या किसी की हार्ड डिस्क कॉपी करके देखीं। दो घंटे या उससे थोडे ज्यादा में फिल्म खत्म। यानी कुल मिलाकर अब फिल्म देखना आसान हो गया है।
:::और अब
टाकिज में अकेले जाने का मन नहीं करता और फिल्म देखना इतना महंगा हो गया है कि अब सावरिया, गजनी, वैलकम टू सज्जनपुर जैसे अच्छी और बडे बजट वाली फिल्में ही टॉकिज में देखता हूं। बाकी लैपटॉप पर देखकर ही काम चला लेता हूं।
अजयजी ने मुझे मौका दिया मैं इसके लिए उनका आभारी हूं।- राजीव जैन
हिंदी टाकीज
कभी सोचा नहीं था कि फिल्म देखने और उससे जुडे अनुभव लिखने का मौका मिलेगा। पर एक दिन अजयजी सर का मेल मिला कि आप हिंदी टाकीज के लिए एक कडी लिखिए तो ऑफ के दिन समय निकालकर यादें ताजा करने बैठ गया। कोशिश की है कि फिल्मों से जुडे कुछ अच्छे बुरे अनुभव आपके साथ बांट सकूं।
राम तेरी गंगा मैली
मुझे अब याद नहीं कि इस फिल्म में क्या था, मैं शायद तब बमुश्किल छह-सात साल का रहा होगा। पर यह मेरी पहली फिल्म होने के साथ साथ ऐसी इकलौती फिल्म है जो मैंने अपने पूरे परिवार के साथ देखी हो। पापा, मां, दादी और हम दोनों भाइयों को लेकर शायद इसलिए यह फिल्म दिखाने ले गए हों कि फिल्म का टाइटल ‘राम तेरी गंगा मैली’ था। अगर फिल्म का पोस्टर न देखा हो तो फिल्म न देखने वाले को धार्मिक फिल्म जैसा अहसास देता है। खैर मुझे एक दो सीन याद आ जाते हैं और यह भी याद है कि हम फिल्म खत्म होने से थोडा पहले ही ही उठकर चले आए, ताकी फिल्म खत्म होने के बाद बाहर निकलने के लिए धक्का-मुक्की न करनी पडे।

मेरी पहली फिल्म
इसके बाद मैं शायद स्कूल से ही पहली बार फिल्म देखने गया था। शायद फिल्म का नाम छोटा जादूगर था। हमें सातवीं और आठवीं में साल में एक बार टॉकिज ले जाया जाता था। टैक्स फ्री फिल्म थी सो टिकट भी दो या तीन रुपए से ज्यादा नहीं होता था। क्यूंकि उस समय हमारे शहर में पांच रुपए के आसपास तो पूरा टिकट ही था।
इन दिनों वैसे मैं फिल्में भले ही न देखता रहा हों, लेकिन फिल्म के पोस्टर जरूर देखता था। क्यूंकि हमारी स्कूल बिल्डिंग के एक कॉर्नर में ही पोस्टर लगाए जाते थे।
प्रचार का अनोखा स्टाइल
उस समय फिल्म के प्रचार का स्टाइल भी अब के स्टाइल से थोडा अलग हुआ करता था। एक उदघोषक महोदय रिक्शे में बैठकर निकलते थे और एक फिल्मी गाने के साथ साथ बीच बीच में माइक पर चिल्लाते हुए जाते थे ‘आपके शहर के नवरंग टाकिज में लगातार दूसरे सप्ताह शान से चल रहा है आंखें। आप देखिए अपने परिवार यार दोस्तों को दिखाइये। फिल्म में हैं गोविंदा::, चंकी पांडेय।‘ इसी का असर था कि हम स्कूल से पैदल लौटते हुए भी इसी तरह चिल्लाते हुए अपने मौहल्ले तक पहुंचते थे।
एग्जाम के बाद फिल्म का साथ
नवीं क्लास के बाद हम लोग बडे बच्चों की गिनती में आ गए थे। वैसे टाकिज तक तो मैं रोज जाता था। मेरे शहर कि सार्वजनिक लाइब्रेरी भी उसी बिल्डिंग में ही थी और मैं दसवीं तक रोज लाइब्रेरी रोज जाता था। दसवीं और उसके बाद तो एग्जाम के बाद पिक्चर देखना जाना बीएससी फाइनल ईयर के लास्ट एग्जाम तक उत्सव की तरह चला। यही वह दिन होता था जब मां को कहकर जाते कि खाना जल्दी बना दो पिक्चर देखने जाना है और छह से नौ बजे के शो के लिए भी वो कुछ न कहती थीं।
कोटा और हर टेस्ट
पीएमटी के लिए एक साल डॉप किया और कोचिंग करने हम कई दोस्त कोटा चले गए। कोचिंग में हर सात या चौदह दिन में रविवार को यूनिट के हिसाब से टेस्ट होता था। इसकी रैंकिंग लिस्ट भी बनती थी। यानी टैस्ट होने तक मारकाट मची रहती थी। संडे को 3से 5 बजे तक टेस्ट हुआ करता था। और उसके बाद छह से नौ बजे तक के शो के लिए हम लोग ऑटो करके टॉकिज तक सबसे पहले पहुंचने की कोशिश करते। इस साल जितनी फिल्में मैंने टाकिज में देखीं उतनी एक साल में अभी तक कभी नहीं देखीं। घर से बाहर मनोरंजन का इकलौता साधन यही हुआ करता था। फिल्म के बाद लौटते और खाना खाकर सो जाते अगले दिन से पिफर वही भागदौड।
इस दौर में जुडवा जैसी हिट फिल्म भी देखी, तो जैकी श्राफ की भूला देनी वाली फिल्म ‘’ भी देख डाली। जुडवां की टिकट खिडकी पर मैंने पहली बार कोटा के टॉकिज में लोगों को डंडे खाते देखा।(मेरे अपने गांव राजगढ में टिकट जुगाडना मेरे लिए बडी बात नहीं थी। हमारे शहर का लाइब्रेरियन ही पार्ट टाइम टिकट कीपर हुआ करता था) बाद में इंतजार इतना करना पडा कि छह से नौ की टिकट नहीं मिली तो जुडवा का नौ से बारह बजे का शो देखना पडा।
एक फिल्म और कई दिन की चुप्पी
फायर एक ऐसी फिल्म थी जिसने मेरे घर में काफी गफलत कराई। शायद बीएससी सैकंड ईयर की बात थी। मम्मी पापा शहर से बाहर थे। मैं और मेरा बडा भाई घर पर थे। भाई ने हम दोनों का खाना बनाया। मां घर पर नहीं होती तो हमेशा ऐसा ही होता था। इतने में मेरा एक दोस्त आया और बोला कि तगडी फिल्म लगी है फायर, देखने चलें क्या। मैंने उसके बारे में सुन रखा था, इसलिए मैंने उसे मना किया। मैंने कहा कि भाई को बोलकर चलेंगे क्या? पता नहीं कैसे हुए कि भाई के दोस्तों ने भी फिल्म का प्लान बना रखा था। मेरी तो अपने भाई से ज्यादा खुला हुआ नहीं था पर मेरे दोस्त ने उनसे कहा कि हम फिल्म देखने जा रहे हैं आप भी चलो। उन्होंने कहा कि हां मुझे भी जाना है। मेरे हिसाब से उन्हें तब तक फायर की स्टोरी लाइन का पता नहीं था। हम दोनों चले गए। छोटा शहर था एक ही हॉल था बॉक्स में 25 के आसपास ही सीट थी। हम दोनों भाई एक लाइन में ही आगे पीछे ही बैठे थे। फिल्म में जब शबाना आजमी और नंदिता दास के अंतरंग दृश्य आने लगे तो मैंने दोस्त से कहा यार चल यहां से भाई भी यही हैं, अच्छा नहीं लगता। दोस्त नहीं उठा, हम कुछ करते इससे पहले ही हमारे भाई की मित्र मंडली में से मेरे भाई सहित कुछ लोग बाहर चले गए। और मैं नौ बजे पूरी फिल्म देखकर ही घर लौटा। भाई ने लौटने के बाद कुछ नहीं पूछा, घर में शांति रही। और हम दोनों भाइयों ने शरमाशर्मी में कई दिन तक आपस में बात भी नहीं की।
मेरी दिल्ली 2002 से 2005 तक दिल्ली-नोएडा रहा। तीन साल में टॉकिज पर बमुश्किल आठ-दस फिल्में देखी होंगी, लेकिन अगर टीवी पर देखी गई फिल्में मिलाकर कहूं तो शायद अपने जीवन की सबसे ज्यादा फिल्में मैंने इन्हीं दिनों में देखीं।
दिल्ली में शुरुआती दिन थे, मैं दिल्ली के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता था। ऑफ वाले दिन मयूर विहार से सीधी बस में बैठकर कनॉट प्लेस के लिए निकलता। रीगल में अगर कोई ठीकठाक फिल्म होती तो देख लेता, क्यूंकि अकेले या किसी एक और दोस्त के साथ कहीं और टॉकिज ढूंढने से अच्छा यही होता। अग्निवर्षा जैसी फिल्म मैंने इसी टाकिज में देखी। कोंडली से दरियागंज में गोलछा तक पहुंचना आसान हुआ करता था, देवदास इसी हॉल में देखी गई।
इन्हीं दिनों की बात है मुगल ए आजम कलर में दोबारा रिलीज हुई। अट़टा पर नोएडा में पहला मल्टीप्लेक्स बनकर तैयार हुआ। बचपन से ही इस फिल्म को बडे पर्दे पर देखने की इच्छा थी। इसलिए री रिलीज के अगले दिन ही हम देखने पहुंच गए। फिल्म में मजा भी आया पर मेरे पीछे बैठे एक प्रेमी युगल की कलाकारी और फिल्म में उर्दू के डायलॉग का मजाक उडाना बीच बीच में परेशान करता रहा।
एमजेएमसी की मस्ती
सही मायनों में फिल्म को मस्ती करते हुए एंजाय करना मैंने इन्हीं दिनों में सीखा । सत्तर अस्सी रुपए से ज्यादा की टिकट खरीदकर ग्रुप में फिल्म देखने का मजा यहीं लिया। धूम और रंग दे बसंती जैसी फिल्में देखीं। सही मायनों में यही वही ऐज थी जब मैं नौकरी करते हुए फिर से कॉलेज लाइफ जी रहा था और हम एक साथ लडके, लडकियां यूनिवर्सिटी के बाद आमतौर पर बिना किसी को बताए हुए ही फिल्म चले जाते थे।
पीसी और फिल्में
2005 और उसके बाद सीडिज इतनी सुलभ हो गई कि कई सालों से जिन जिन फिल्मों का नाम सुना था, देख नहीं पाया। वे सभी कम्प्यूटर पर देखीं। वाटर, मैंने गांधी को नहीं मारा, निशब्द जैसे विवादास्पद फिल्में शामिल है। और अब लैपटॉप लेने के बाद तो फिल्म देखना और आसान हो गया है। मैंने जुरासिक पार्क से लेकर पुरानी देवदास तक जो मेरा मन करता है। कहीं से भी पैन डाइव सीडी, नेट या किसी की हार्ड डिस्क कॉपी करके देखीं। दो घंटे या उससे थोडे ज्यादा में फिल्म खत्म। यानी कुल मिलाकर अब फिल्म देखना आसान हो गया है।
:::और अब
टाकिज में अकेले जाने का मन नहीं करता और फिल्म देखना इतना महंगा हो गया है कि अब सावरिया, गजनी, वैलकम टू सज्जनपुर जैसे अच्छी और बडे बजट वाली फिल्में ही टॉकिज में देखता हूं। बाकी लैपटॉप पर देखकर ही काम चला लेता हूं।
Thursday, January 22, 2009
आओ स्लमडॉग मिलेनियर देखें

जयपुर में साहित्य सम्मेलन शुरू होने वाला था। पहले दिन स्लमडॉग मिलेनियर वाली किताब “क्यू एंड ए” के विश्वास स्वरूप को आना था। मैं किताब नहीं पढ पाया इसलिए मैंने सोचा कि स्लम डॉम मिलेनियर देखकर ही उसकी कहानी का अंदाजा लगा लिया जाए ताकि उनको सुनने और समझने में कोई दिक्कत न आए। इत्तेफाक की बात थी कि ऑफिस से लौटते समय किसी ने कहा कि नेट पर स्लमडॉग पूरी है, चाहिए क्या।
बस मैं ले आया और रात भर जगकर मैंने स्लमडॉग देखी।
फिल्म अच्छी है बस कुछ बात खटकती है जिसे आगे आप पढेंगे, बस एक चीज है कि दुनिया में वो चर्चा में आई जिसमें हमारी गरीबी दिख रही है, मुंबई की गंदगी दिख रही है। पर गालियों को छोड दिया जाए तो फिल्म अच्छी है।
आइए अब आपको बताऊं फिल्म की कहानी
जमाल मलिक एक मुसलिम बच्चा है जो मुंबई की एक झुग्गी बस्ती में है, दंगों में हिंदुओं ने उसकी मां को मार दिया। उसका एक बडा भाई है, जो अब किसी डॉन के लिए काम करता है और वह खुद किसी कॉल सेंटर में चाय सर्व करता है। इत्तेफाक से कौन बनेगा करोडपति में पहुंच जाता है। यहां अनिल कपूर (शो के प्रस्तोता) उससे सवाल पूछ रहे हैं और एक दिन का एपिसोड खत्म होने तक एक करोड रुपए जीत चुका है। अनिल कपूर को जमाल पर शक हो जाता है कि एक चाय वाला “हू वान्ट़स टु मिलेनियर” में कैसे जीत सकता है। इसी शक में अनिल उसे पुलिस के हवाले कर देता है और पुलिस से पूछताछ में पता चला है कि उसकी जिंदगी कैसे गुजरी।
हर सवाल का जवाब कहीं न कही उसकी जिंदगी से जुडा होता है और कहानी आगे रफ़तार पकडती है। कहानी फ़लैशबैक में चलती है।
मां की मौत के बाद जमाल और उसके भाई सलीम को बच्चों से भीख्ा मंगवाने वाले गिरोह के लोग पकड लाते हैं। वो जमाल की आंख निकालकर अंधा कर ही रहे होते हैं कि दोनों भाई वहां से बाहर निकलते हैं और देश भर में घूमते हुए वापस दिल्ली पहुंचते हैं। इस बीच में छोटी जिंदगी में अनाथ बच्चे जिंदगी के बहुत सारे तजुर्बे प्राप्त करते हैं।
बच्चों की बाल सुलभ अदाएं फिल्म की कहानी के साथ रोचकता बनाए रखती है। फिल्म में जमाल के रूप में तीनों ही बच्चों ने बहुत ही बेहतरीन अभिनय किया है।
कहानी के साथ साथ बाद में पता चलता है कि जमाल सही था और उसने कोई फर्जीवाडा नहीं किया। अगले दिन शो फिर होता है और जमाल दो करोड रुपए जीत जाता है।
वैसे यह फिल्म भारत में आज रिलीज होने को है। मैंने अंग्रेजी वर्जन देखा है।
अब इसकी एक कमजोरी
यह बात इस फिल्म को गोल्यडन ग्लोब मिलने के बाद जयपुर में पत्रकारों से बातचीत में फिल्म के ही एक करदार इमरान खान ने भी कही। कि झुग्गी का एक बच्चा बेधडक अंग्रेजी बोलता है और हू वान्टस टु मिलेनियर में पहुंच जाता है। यह बात हिंदी के दर्शक पचा नहीं पाएंगे। यही बात मुझे कई बार क्लिक की। पर फिल्म अंग्रेजी में है इसलिए हो सकता है ऐसा करना पडा हो अब हिंदी वर्जन में क्या होगा यह देखने की बात है।
फिल्म का म्यूजिक बहुत ही अच्छा है, जय हो और रिंगा रिंगा रहमान के खास अंदाज में हैं। पूरी फिल्म में काम लिया गया बैकग्राउंड म्यूजिक भी अच्छा है।
Thursday, January 8, 2009
बिल्ली रास्ता क्यूं काटती है

पता नहीं ये ये बिल्ली रास्ता क्यूं काटती है। कल रात की बात है, आफिस से करीब ढाई बजे घर लौट रहा था। आफिस के ही एक साथी दूसरी बाइक पर थे, घर के पास वाली गली पर एक दूसरे को विदा ही कर रहे थे कि एक बिल्ली पर मेरी नजर पडी, वो मेरा रास्ता काट रही थी।
यूं तो मैं इन सब चीजों में विश्वास नहीं करता पर कहते हैं न जिंदा मक्खी निगली नहीं जाती। मैंने यह बात साथी को बताई तो उन्होंने कहा कि अगली गली से निकल जाना।
फिर क्या था मैं बिल्ली को चकमा देकर गली के दूसरे छोर से होकर घर पहुंच गया। रोज की तरह घर पहुंचकर छोटे भाई का मोबाइल बजाया। एक बार में कोई रेस्पॉन्स नहीं मिला तो करीब 25 मिनट तक मोबाइल और गेट बजाता रहा। शायद पडोसी उठ गए पर अंदर के दो कमरों में सो रहे निर्दयी दो जनों ने गेट और मोबाइल की आवाज न सुनी, तो मुझे समझ आया कि मैं बिल्ली को चकमा नहीं दे पाया।
पता नहीं ये ये बिल्ली का करिश्मा था या फिर भाई का जायज कारण कि जब मोबाइल की बैटरी कम चार्ज होती है तो उसके हैंडसेट से रिंग की आवाज नहीं आती।
खैर सवा तीन बजे छोटे ने मेरे गेट खटखटाने की आवाज सुनी गेट खोला। मैंने हमेशा कि तरह कहा कि कितनी देर से बजा रहा हूं। उसने कहा कि नहीं तो और रिजाई में घुस गया।
Monday, September 29, 2008
बिना पुलिसवाले के रेडलाइट की भी इज्जत नहीं
दिन में छोटे भाई को सिंधी कैंप बस स्टैंड (जयपुर का के ंद्रीय बस स्टैंड) छोड़ने गया। यूं तो मैं थोड़ी तेज ड्राइव करता हूं, लेकिन बेतरतीब नहीं। जाते समय एक कार वाले ने पीछे से हॉनü बजाया तो मैंने बाइक रोकी। उनकी समस्या थी कि मैं बाइक एक तरफ नहीं चला रहा। खैर मुझसे निपटने इससे पहले ही पीछे से आ रही एक बाइक उनकी कार से टकरा गई।
बस स्टैंड तक पहुंचने से पहले ही भीलवाड़ा जाने वाली बस दिखी। छोटे भाई को भीलवाड़ा तक ही जाना था इसलिए मैंने समय बचाने के लिए बाइक वहीं से मोड़कर बस के पीछे लगा दी। रविवार का दिन था चौराहों पर एक भी ट्रैफिक पुलिस वाला नहीं था। पहली लालबत्ती पर बस ने बिना रोके निकाल ली। गणपति प्लाजा के सामने लगी दूसरी लाल बत्ती ग्रीन थी बस निकल गई उसके पीछे पीछे मैं भी था। मेरे आगे निकलने से पहले ही सामने का ट्रैफिक बिना ग्रीन लाइट हुए ही आने लगा। इसबीच में सही दिशा में जा रहा था। मुझे देख एक बाइक सवार ने ब्रेक लगाए और क मबख्त टूटी सड़क की वजह से बाइक çस्लप हो गई। बाइक पर सवार दोनों लोग गिर पड़े। मुझे बस पकड़नी थी इसलिए मैंने एक बार बिना रुके आगे बढ़ने की सोची। गिरा पड़ा बाइक सवार मानों पीटने के लिए उठा और मेरी और दौड़ा, मैंने भी मौके की नजाकत को समझते हुए बाइक रोक ली। अगर भागता तो हो सकता है लोग मेरी गलती समझ सकते थे। मैं रुका और उनको दिखाया कि अभी तक उनकी वाली तरफ लालबत्ती थी और मेरी तरफ ग्रीन सिग्नल। मैंने उनसे कहा कि भाई साहब आप तो बुजुर्ग हो कम से कम लाइटों की इज्जत करा करो।
थोड़ी गर्मा गर्मी के बाद मैं उस बस का पीछा करने लगा और दो लाल बत्ती के बाद अजमेर पुलिया पर बस को पकड़ ही लिया।
कुल मिलाकर बात यह हिंदुस्तान में ट्रैफिक को कंट्रोल के लिए केवल रेडलाइट लगाने से ही काम नहीं चल सकता। जब तक वहां पुलिसवाला न खड़ा हो लोग उसकी इज्जत ही नहीं करते।
(वैसे कई बार मैं भी जंप कर चुका हूं, पर अमूमन पालना करता हूं)
बस स्टैंड तक पहुंचने से पहले ही भीलवाड़ा जाने वाली बस दिखी। छोटे भाई को भीलवाड़ा तक ही जाना था इसलिए मैंने समय बचाने के लिए बाइक वहीं से मोड़कर बस के पीछे लगा दी। रविवार का दिन था चौराहों पर एक भी ट्रैफिक पुलिस वाला नहीं था। पहली लालबत्ती पर बस ने बिना रोके निकाल ली। गणपति प्लाजा के सामने लगी दूसरी लाल बत्ती ग्रीन थी बस निकल गई उसके पीछे पीछे मैं भी था। मेरे आगे निकलने से पहले ही सामने का ट्रैफिक बिना ग्रीन लाइट हुए ही आने लगा। इसबीच में सही दिशा में जा रहा था। मुझे देख एक बाइक सवार ने ब्रेक लगाए और क मबख्त टूटी सड़क की वजह से बाइक çस्लप हो गई। बाइक पर सवार दोनों लोग गिर पड़े। मुझे बस पकड़नी थी इसलिए मैंने एक बार बिना रुके आगे बढ़ने की सोची। गिरा पड़ा बाइक सवार मानों पीटने के लिए उठा और मेरी और दौड़ा, मैंने भी मौके की नजाकत को समझते हुए बाइक रोक ली। अगर भागता तो हो सकता है लोग मेरी गलती समझ सकते थे। मैं रुका और उनको दिखाया कि अभी तक उनकी वाली तरफ लालबत्ती थी और मेरी तरफ ग्रीन सिग्नल। मैंने उनसे कहा कि भाई साहब आप तो बुजुर्ग हो कम से कम लाइटों की इज्जत करा करो।
थोड़ी गर्मा गर्मी के बाद मैं उस बस का पीछा करने लगा और दो लाल बत्ती के बाद अजमेर पुलिया पर बस को पकड़ ही लिया।
कुल मिलाकर बात यह हिंदुस्तान में ट्रैफिक को कंट्रोल के लिए केवल रेडलाइट लगाने से ही काम नहीं चल सकता। जब तक वहां पुलिसवाला न खड़ा हो लोग उसकी इज्जत ही नहीं करते।
(वैसे कई बार मैं भी जंप कर चुका हूं, पर अमूमन पालना करता हूं)
Sunday, September 21, 2008
क्या इनको लिफ्ट देनी चाहिए थी
रविवार का दिन था, दिन में घर पर ही फिल्म देखने के चक्कर में पहले ही थोड़ी देर से आफिस के लिए निकला। रास्ते में ऑफिस से एक चौराहे पहले लकड़ी थामे एक बुजुर्ग ने लिफ्ट मांग ली। मैं वैसे भी कभी लिफ्ट देने से मना नहीं करता, पर किसी बुजुर्ग को पहली बार लिफ्ट दी। हालांकि मुझे किसी को उसकी मंजिल तक पहुंचाने की खुशी थी, पर अनुभव कुछ ठीक नहीं रहा।हुआ यूं कि बाइक रोकते ही मैंने पूछा अंकल कहां जाना है। मैं सिर्फ अगले चौराहे पर पानी की टंकी तक जाऊंगा उसके पास ही मेरा आफिस है, वो बोले कि बस उससे थोड़ा आगे ही जाना है। मैंने कहा ठीक है, बैठ जाइए। बस बैठते ही अंकल लोगों को ड्राइविंग सेंस के लिए गाली देने लगे। चार कदम ही चले कि मुझे कहने लगे कि आराम से चलाओ। मुझे जहां तक जाना था, वहां उनको उतरने के लिए बाइक रोकी तो बोले बेटा जरा सा आगे है, डॉक्टर से मिलना है देर हो जाएगी, जरा छोड़ दो।हालांकि मुझे देर हो रही थी। (वैसे तो मैं ऑफिस टाइम से एक घंटे पहले ही आ गया था पर बॉस ने कुछ काम बता रखे थे इसलिए और पहले निकला था) खैर मैं उन्हें छोड़ने के लिए आगे बढ़ा तो यूनिवçर्सटी के प्ले ग्राउंड में बास्केटबॉल खेल रहे लोगों को एक नजर देखा, तो बुजुर्गवार बोले, क्या देख रहे हो। मैंने कहा अंकल देख रहा हूं किसका मैच हो रहा है। (हो सकता है मैं अपनी जगह गलत हूं, लेकिन अपनी आदत से परेशान हूं, रास्ते में हमेशा देखते हुए निकलता हूं कि कोई परिवर्तन या नई चीज)। वो बोले, मैच देखना है टीवी पर देखो, अभी तो चलो।मुझे गुस्सा आया पर क्या करता उम्रदराज थे, चुप ही रहा। आगे बढ़ा पूछा कहां छोडूं तो बोले थोड़ा सा आगे है। इस बीच उनके डायलॉग चलते रहे। मसलन आगे तेज रफ्तार में स्कूटी पर जा रही लड़की को देखकर बोले इस लड़की को चलाना नहीं आता फिर भी चला रही है, पर अपने को धीरे चलना है। उसके बाद थोड़े भीड़ भरे इलाके से गुजरा तो आगे झुंड में जा रहे राहगीरों को देखकर बोले, ये बिहारी हैं इनको नहीं पता कैसे चलना है। बस गांव से यहां आ गए हैं, न चलने का ढंग है न कुछ और। खैर मैं बिड़ला मंदिर से चला चला सेठी कॉलोनी के पागलखाने तक पहुंचकर पक चुका था। मेरा ऑफिस दो किमी पीछे छूट चुका था और उनके डॉक्टर का मकान नहीं आया। मैंने दो तीन बार पीछा छुड़ाने के लिए धीरे से कहा अंकल कहा गया आपका डॉक्टर का मकान। पर उन्होंने पांच किमी का सफर कराकर करीब-करीब ट्रांसपोर्ट नगर चौराहे के पास तक ले जाकर ही दम लिया। उतरते ही बोले, मैं तुम्हें उस रास्ते से लाया हूं, जहां ट्रैफिक सबसे कम था अब ऐसे ऐसे करके चले जाना, रास्ता तो जानते हो न। और बिना धन्यवाद दिए मकान में अंदर घुस गए!
Saturday, September 13, 2008
जरा बैकअप से पुरानी वाली एहतियात दे दो
दिल्ली में शनिवार को ब्लास्ट हुआ। जयपुर, अहमदाबाद से पहले ब्लास्ट का शिकार बन चुका है। मीडिया की नौकरी है संवेदनशील मामला है, इसलिए हमें भी अपने शहर के दर्द को फिर से कवर करना था। इतने में बॉस का आदेश मिला कि बम से बचने के लिए एहतियात भी जरा छाप देना। रिपोर्टर को चीफ रिपोर्टर साहब का आदेश मिला, भई वो बैकअप से पुलिस की एहतियात वाली जानकारी क्या करें, न करें चला दो।
बस इसी लाइन से मुझे लगा कि हम कितने आदी हो गए हैं इन सब चीजों के (पहले सिर्फ एक्सिडेंट थे, अब ब्लास्ट भी शामिल हो गए हैं) कि तीन महीनों में तीन बार ये एहतियात छापनी पड़ गई।
Thursday, September 4, 2008
क्रेडिट कार्ड वालों को भगाने का एक्सक्लूसिव तरीका
कल दोपहर की बात है। सोकर उठ गया था, टाइम पास कर रहा था कि एचडीएफसी बैंक से क्रेडिट कार्ड बनवाने के लिए दिल्ली के एक लैंडलाइन नंबर से फोन आया। मैं भी मजे लेने के मूड में था इसलिए सीरियसली बात करने लगा। पूछा क्या क्या डिटेल्स हैं। गोल्ड कार्ड देने के साथ साथ एक पेट्रो कार्ड और एक एडिशनल कार्ड पर 40 हजार से दो लाख तक की लिमिट ऑफर की गई। मैंने साथ कि साथ हिडन चार्ज का नाम लेकर कई सवाल दाग दिए। वन इंट्रेस्ट रेट से लेकर कई और बात समझाने लगा।
फाइनली वह एग्जीक्यूटिव घर भेजने के लिए तैयार हुआ, तो डिटेल कन्फर्म करने के लिए पूछा कि सर आप करते क्या हैं। बताया कि उसे पत्रकार हूं। बस फिर क्या था। बजाय मेरे खुद ही बोला सॉरी सर यह तो नेगेटिव प्रोफाइल है। हम लोग जनüलिस्ट्स को क्रेडिट कार्ड इश्यू नहीं करते!
मुझे तो वैसे भी क्रेडिट कार्ड लेना नहीं था। पर मुझे लगा कि शायद यह नुस्खा कई लोगों के काम आ सकता है। बस क्रे डिट कार्ड के लिए फोन आए और आपको पीछा छुड़वाना हो तो सीधे बोलिए, सर पत्रकार हूं, बताएये। हो सकता है आपको बार बार की परेशानी से मुक्ति मिल जाए।
Saturday, June 14, 2008
ओह ! यहां भी लगी क्रिकेट की बुरी नजर
अपन की मोर्निंग वॉक जारी है, पर अपन पार्कों में बच्चों के रवैये से दु:खी हैं। गर्मियों की छुçट्टयां चल रही हैं इसलिए पार्कों में इनदिनों बच्चों की खासी भीड़ है। बच्चे मोर्निंग वॉक कम करते हैं और खेलने का सामान साथ लाते हैं।
अपन को तो यूं ही क्रिकेट के नाम से ही गुस्सा आता है अब ये पार्क में क्रिकेट खेलते बच्चे भी दिख जाते हैं, तो सुबह सुबह पार्कों की बदहाली पर टेंशन शुरू हो जाती है। यूं तो जेडीए (जयपुर की नगर नियोजन संस्था!) ने पार्क में सबसे ज्यादा घास वाले और साफ सुथरे हिस्से को योगासन करने के लिए अधिकृत कर रखा है। इसके लिए यहां बाकायदा बोर्ड भी लगा रखा है, पर आजकल इस पर बच्चों ने कब्जा जमा रखा है। पार्क के इस हिस्से के बीचों-बीच लगे पेड़ को विकेट बनाकर खेलना शुरू कर देते हैं। यानी सुबह सुबह से ही पार्क की अच्छी खासी घास को बर्बाद करने की तैयारी। उनकी बॉल किसी को भी लग सकती है इसलिए लोग खुद ही वहां से दूरी बनाना ही उचित समझते हैं। यहां आने वाले बुजुर्गों के एक ग्रुप ने बचाव के लिए एक कार्नर तय कर लिया है।
अब तक सोचता था कि क्रिकेट देश का टाइम लॉस करने में ही लगा हुआ है, पर अब तो लगता है कि पार्कों में बची-खुची हरियाली भी इसका शिकार हो जाएगी। ईश्वर देश के इन नौनिहाल `धोनियों´ और `ईशांतों´ को सद्बुद्धि दे कि ये स्टेडियम में जाकर खेलें या अपनी घर की छत पर!
अपन को तो यूं ही क्रिकेट के नाम से ही गुस्सा आता है अब ये पार्क में क्रिकेट खेलते बच्चे भी दिख जाते हैं, तो सुबह सुबह पार्कों की बदहाली पर टेंशन शुरू हो जाती है। यूं तो जेडीए (जयपुर की नगर नियोजन संस्था!) ने पार्क में सबसे ज्यादा घास वाले और साफ सुथरे हिस्से को योगासन करने के लिए अधिकृत कर रखा है। इसके लिए यहां बाकायदा बोर्ड भी लगा रखा है, पर आजकल इस पर बच्चों ने कब्जा जमा रखा है। पार्क के इस हिस्से के बीचों-बीच लगे पेड़ को विकेट बनाकर खेलना शुरू कर देते हैं। यानी सुबह सुबह से ही पार्क की अच्छी खासी घास को बर्बाद करने की तैयारी। उनकी बॉल किसी को भी लग सकती है इसलिए लोग खुद ही वहां से दूरी बनाना ही उचित समझते हैं। यहां आने वाले बुजुर्गों के एक ग्रुप ने बचाव के लिए एक कार्नर तय कर लिया है।
अब तक सोचता था कि क्रिकेट देश का टाइम लॉस करने में ही लगा हुआ है, पर अब तो लगता है कि पार्कों में बची-खुची हरियाली भी इसका शिकार हो जाएगी। ईश्वर देश के इन नौनिहाल `धोनियों´ और `ईशांतों´ को सद्बुद्धि दे कि ये स्टेडियम में जाकर खेलें या अपनी घर की छत पर!
Wednesday, June 4, 2008
तो क्या मतलब मॉनिग वॉक का
बाकी लोगों की तरह अपन भी पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से दुखी हैं। हालाकि दु:ख से ज्यादा इस खुशी इस बात की है कि तेल कंपनियों और सरदार मनमोहन सिंह की रोज-रोज की सçब्सडी का बोझ बढ़ रहा है, कि राग से तो मुक्ति मिलेगी।
खैर छोडि़ए ... आज छह साल बाद अपन मॉनिüZग वाक पर गए। यूं तो यह खबर नहीं है पर पत्रकार मॉनिüZग वॉक पर जाए तो खबर लाजमी है, वो भी डेस्क पर बैठा आदमी। यूं तो सुबह उठकर घूमने जाने को मॉनिüZग वॉक कहते हैं, लेकिन अपन बिना सोए ही साढे़ पांच बजे वॉक पर निकल पड़े।
ऑफिस का तनाव कुछ ज्यादा था, इसलिए रात भर सो नहीं पाया। यूं रातभर कहना भी उचित नहीं, आजकल ऑफिस का टाइम रात दो बजे तक है। घर पहुंचकर सोते सोते अमूमन सुबह हो जाती है। खैर अपन सुबह पास ही शहर के सबसे बडे़ पार्क में घूमने चले गए। इतने दिनों बाद मॉनिüZग वॉक पर गए तो वही रास्तो जिससे रोज निकलता हूं, उसकी बहुत सारी चीजें नई नवेली लगने लगीं। कुछ बातें तो ऐसी थीं जिन पर मैंने पहले कभी गौर ही नहीं किया, हो सकता है शायद सुबह की ताजगी से ऐसा हो गया हो!
पार्क के सामने तक पहुंचा तो मैं भौचक था। पार्क की पाकिZग और रोड पर खड़ी गाडि़यां गिनने लगा, 175 से ज्यादा कारें, 200 से ज्यादा टू व्हीलर और बहुत सारी साइकिल। जब मैंने साथ गए अपने दोस्त और छोटे भाई को कहा कि लोग यहां मॉनिüZग वॉक पर आए हैं या गाडि़यों को घुमाने लाए हैं, तो वो चिंतिंत जरूर थे पर मेरी बातों से पूरी तरह सहमत नहीं थे।
मेरा कहना इतना भर था कि लोग अपने आसपास के छोटे पार्क में जा सकते हैं, जरूरी नहीं है कि इतनी दूर शहर के इस सबसे बडे़ पार्क में आएं। पड़ोस के ही किसी छोटे पार्क की भी शरण ली जा सकती है।
खैर अपन की चिंता वहीं छूटी दोपहर बाद पता चला कि पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें बढ़ गई हैं। हालाकि मैं पर्यावरण प्रदूषण को लेकर चिंतित था, लेकिन सवाल अनसुलझा है कि क्या मॉनिüंग वॉक के लिए पेट्रोल जलाना उचित है। मेरी पीड़ा यह है कि अगर पांच किमी दूर जाकर एक पार्क में दो किमी का चक्कर लगाएं उससे अच्छा है कि आप घर से एक किमी दूर ही पैदल निकलें और बिना पार्क जाएं, घर लौट आएं। कम से कम थोड़ा पॉल्युशन और पेट्रोल तो बचेगा वनाü जिस ताजगी के लिए आप मॉनिüZग वॉक कर रहे हैं वह ताजगी ही खत्म हो जाएगी।
तो आप क्या सोचते हैं...
खैर छोडि़ए ... आज छह साल बाद अपन मॉनिüZग वाक पर गए। यूं तो यह खबर नहीं है पर पत्रकार मॉनिüZग वॉक पर जाए तो खबर लाजमी है, वो भी डेस्क पर बैठा आदमी। यूं तो सुबह उठकर घूमने जाने को मॉनिüZग वॉक कहते हैं, लेकिन अपन बिना सोए ही साढे़ पांच बजे वॉक पर निकल पड़े।
ऑफिस का तनाव कुछ ज्यादा था, इसलिए रात भर सो नहीं पाया। यूं रातभर कहना भी उचित नहीं, आजकल ऑफिस का टाइम रात दो बजे तक है। घर पहुंचकर सोते सोते अमूमन सुबह हो जाती है। खैर अपन सुबह पास ही शहर के सबसे बडे़ पार्क में घूमने चले गए। इतने दिनों बाद मॉनिüZग वॉक पर गए तो वही रास्तो जिससे रोज निकलता हूं, उसकी बहुत सारी चीजें नई नवेली लगने लगीं। कुछ बातें तो ऐसी थीं जिन पर मैंने पहले कभी गौर ही नहीं किया, हो सकता है शायद सुबह की ताजगी से ऐसा हो गया हो!
पार्क के सामने तक पहुंचा तो मैं भौचक था। पार्क की पाकिZग और रोड पर खड़ी गाडि़यां गिनने लगा, 175 से ज्यादा कारें, 200 से ज्यादा टू व्हीलर और बहुत सारी साइकिल। जब मैंने साथ गए अपने दोस्त और छोटे भाई को कहा कि लोग यहां मॉनिüZग वॉक पर आए हैं या गाडि़यों को घुमाने लाए हैं, तो वो चिंतिंत जरूर थे पर मेरी बातों से पूरी तरह सहमत नहीं थे।
मेरा कहना इतना भर था कि लोग अपने आसपास के छोटे पार्क में जा सकते हैं, जरूरी नहीं है कि इतनी दूर शहर के इस सबसे बडे़ पार्क में आएं। पड़ोस के ही किसी छोटे पार्क की भी शरण ली जा सकती है।
खैर अपन की चिंता वहीं छूटी दोपहर बाद पता चला कि पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें बढ़ गई हैं। हालाकि मैं पर्यावरण प्रदूषण को लेकर चिंतित था, लेकिन सवाल अनसुलझा है कि क्या मॉनिüंग वॉक के लिए पेट्रोल जलाना उचित है। मेरी पीड़ा यह है कि अगर पांच किमी दूर जाकर एक पार्क में दो किमी का चक्कर लगाएं उससे अच्छा है कि आप घर से एक किमी दूर ही पैदल निकलें और बिना पार्क जाएं, घर लौट आएं। कम से कम थोड़ा पॉल्युशन और पेट्रोल तो बचेगा वनाü जिस ताजगी के लिए आप मॉनिüZग वॉक कर रहे हैं वह ताजगी ही खत्म हो जाएगी।
तो आप क्या सोचते हैं...
Sunday, March 23, 2008
मैं और ब्लॉगिंग का एक साल
मुझे ब्लॉगिंग करते हुए एक साल हो गए।
पहली पोस्ट बेशक हिंदी में नहीं में नहीं थी, कई दिन तक हिंदी लिखने का तरीका खोजता रहता, पहले यूनीनागरी और आखिरकार आईएमए से हिंदी लिखने लगा। पहली बार ऑनलाइन बिना सुमित स्क्रिप्टराइटर या किसी सॉफटवेयर से हिंदी लिखने पर इतनी खुशी हुई कि बयां नहीं की जा सकती।
इतनी खुशी तो तब भी नहीं हुई जब 31 दिसंबर 2007 को दैनिक हिंदुस्तान ने दुनिया को बदलने वाले दस साल में ब्लॉग को सबको अभिव्यक्ति का समान अवसर देने वाला सूचना का माध्यम बताते हुए, लिखा कि ब्लॉगिंग कुछ के लिए शुरुआत है, क्योंकि जिंदगी सिखाती है कुछ।
बीते साल भर में 65 पोस्ट लिख दीं। कुछ दिन बहलाने के लिए कुछ सूचनाएं इधर उधर करने के लिए। शुरुआत में सिर्फ मनोरंजन के लिए बस यूं ही ब्लॉग बना लिया, बाद में कई ऐसे लोगों से मिला, जिनसें बिना ब्लॉगिंग के मिलना असंभव था।
धीरे धीरे ब्लॉगिंग करने वालों का एक परिवार बन गया। जयपुर में एक ब्लॉगर्स मीट की। अपने ही समाचार पत्र के लिए ब्लॉगिंग पर एक लेख लिख मारा।
भाई लोगों ने सप्ताह का ब्लॉगर में इंटरव्यू ले लिया।
कविता से लेकर फिल्म तक, जहां जहां मन हुआ अपना लिखा और दिल को तसल्ली दी। कई बार अच्छे कमेंट और कॉम्पलिमेंट मिले, कई बार जानकारी पूरी रखने का संदेश और मार्गदर्शन। पर बस अब ब्लॉगिंग अपनी आदत में शुमार हो गई।
नेट पर बैठते ही पहले बस यूं ही जो मन हुआ खोलकर बैठ जाता। जरूरी नहीं हर बार काम की चीज होती, घंटों चैटिंग भी की। पर अब ये सब लगभग बंद हो गया है।
ब्लॉग पढने में ही दो घंटे तक गुजर जाते हैं।
बस अब यही कोशिश है कि इस अनियमित ब्लॉगिंग को धीरे धीरे विषय आधारित ब्लॉगिंग तक ले जाऊं। अब तक ज्यादातर ब्लॉग मैंने अपनी ही जिंदगी पर लिखे।
सभी वरिष्ठ चिटठाजनों का मार्गदर्शन मिलता रहेगा। वे लोग जो नियमित रूप से मेरी शुरुआत पढते हैं, फीडबैक मुझ तक पहुंचाते रहेंगे।
साल भर झेलने के लिए शुक्रिया
पहली पोस्ट बेशक हिंदी में नहीं में नहीं थी, कई दिन तक हिंदी लिखने का तरीका खोजता रहता, पहले यूनीनागरी और आखिरकार आईएमए से हिंदी लिखने लगा। पहली बार ऑनलाइन बिना सुमित स्क्रिप्टराइटर या किसी सॉफटवेयर से हिंदी लिखने पर इतनी खुशी हुई कि बयां नहीं की जा सकती।
इतनी खुशी तो तब भी नहीं हुई जब 31 दिसंबर 2007 को दैनिक हिंदुस्तान ने दुनिया को बदलने वाले दस साल में ब्लॉग को सबको अभिव्यक्ति का समान अवसर देने वाला सूचना का माध्यम बताते हुए, लिखा कि ब्लॉगिंग कुछ के लिए शुरुआत है, क्योंकि जिंदगी सिखाती है कुछ।
बीते साल भर में 65 पोस्ट लिख दीं। कुछ दिन बहलाने के लिए कुछ सूचनाएं इधर उधर करने के लिए। शुरुआत में सिर्फ मनोरंजन के लिए बस यूं ही ब्लॉग बना लिया, बाद में कई ऐसे लोगों से मिला, जिनसें बिना ब्लॉगिंग के मिलना असंभव था।
धीरे धीरे ब्लॉगिंग करने वालों का एक परिवार बन गया। जयपुर में एक ब्लॉगर्स मीट की। अपने ही समाचार पत्र के लिए ब्लॉगिंग पर एक लेख लिख मारा।
भाई लोगों ने सप्ताह का ब्लॉगर में इंटरव्यू ले लिया।
कविता से लेकर फिल्म तक, जहां जहां मन हुआ अपना लिखा और दिल को तसल्ली दी। कई बार अच्छे कमेंट और कॉम्पलिमेंट मिले, कई बार जानकारी पूरी रखने का संदेश और मार्गदर्शन। पर बस अब ब्लॉगिंग अपनी आदत में शुमार हो गई।
नेट पर बैठते ही पहले बस यूं ही जो मन हुआ खोलकर बैठ जाता। जरूरी नहीं हर बार काम की चीज होती, घंटों चैटिंग भी की। पर अब ये सब लगभग बंद हो गया है।
ब्लॉग पढने में ही दो घंटे तक गुजर जाते हैं।
बस अब यही कोशिश है कि इस अनियमित ब्लॉगिंग को धीरे धीरे विषय आधारित ब्लॉगिंग तक ले जाऊं। अब तक ज्यादातर ब्लॉग मैंने अपनी ही जिंदगी पर लिखे।
सभी वरिष्ठ चिटठाजनों का मार्गदर्शन मिलता रहेगा। वे लोग जो नियमित रूप से मेरी शुरुआत पढते हैं, फीडबैक मुझ तक पहुंचाते रहेंगे।
साल भर झेलने के लिए शुक्रिया
Friday, March 7, 2008
यहीं हूं और जिंदा भी
करीब करीब बीस दिन हो गए। कोई नई पोस्ट नहीं लिखी। इसलिए शुभचिंतकों ने मेल की, दो चार ने एसएमएस किए और एक दो ने फोन, कि भाई कहां हो आजकल। कुछ लिखा नहीं।
बस उनको यह बताने के लिए ही लिख रहा हूं कि यहीं हूं और जिंदा भी। बस यू समझिए लिख ही नहीं पा रहा हूं। पहले बजट टीम में होने से तीन बजटों में चार पांच दिन टाइम नहीं मिला। उसके बाद दो दिन घर चला गया और अब कंटीन्यूटी टूट गई तो कुछ लिखने का सोचता हूं तो आइडिया ही डाप हो जाता है।
बस इसी सिलसिले को फिर शुरू करने के लिए यूं ही सूचना की तरह ही लिख रहा हूं। बस यह है कि अपन की जिंदगी इनदिनों बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। एक बेहद गंभीर विषय पर न दिल की मान रहा हूं न दिमाग की। पिछले पंद्रह दिन से यही सोचने में ही जिंदगी गुजर रही है।
खैर
जल्द कुछ लिखता हूं
शब्बा खैर
बस उनको यह बताने के लिए ही लिख रहा हूं कि यहीं हूं और जिंदा भी। बस यू समझिए लिख ही नहीं पा रहा हूं। पहले बजट टीम में होने से तीन बजटों में चार पांच दिन टाइम नहीं मिला। उसके बाद दो दिन घर चला गया और अब कंटीन्यूटी टूट गई तो कुछ लिखने का सोचता हूं तो आइडिया ही डाप हो जाता है।
बस इसी सिलसिले को फिर शुरू करने के लिए यूं ही सूचना की तरह ही लिख रहा हूं। बस यह है कि अपन की जिंदगी इनदिनों बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। एक बेहद गंभीर विषय पर न दिल की मान रहा हूं न दिमाग की। पिछले पंद्रह दिन से यही सोचने में ही जिंदगी गुजर रही है।
खैर
जल्द कुछ लिखता हूं
शब्बा खैर
Wednesday, February 13, 2008
आज का युवा क्या करे, क्या न करे

आज का युवा दुराहे पर खडा है। उसके साथ बडी समस्या है कि अगर वो पुराने रीति रिवाज और नियमों में बंधा है तो उसे आउटडेटेड या कमजोर समझा जाता है और पढाई को छोड बाकी सारे काम करे, मौज मस्ती करे तो वह मेटोसेक्सुअल यूथ है। क्रिकेट नहीं देखे तो प्रॉब्लम, फिल्म के बारे में जानकारी न हो तो अपने ही दोस्तों के बीच हंसी का पात्र। गर्लफ्रेंड नहीं हो तो सोसायटी में इज्जत नहीं।
25 साल तक बेरोजगारी और पढाई के दौरान में पता नहीं वह क्या-क्या करता है। सिर्फ पेट के लिए यानी नौकरी के खातिर। उसके अलावा किसी की याद आती है तो बस लडकियां, क्रिकेट या फिल्में। अब किसके पास फुर्सत की वह प्रेम दिवस यानी वेलेंटाइन डे को छोड प्रेमचंद की पूस की रात पढे या ओबामा की वोटिंग परसेंटेज पर दिमाग लगाए।
मसलन अपनी ही बात करुं, मैं भी युवा ही हूं। जिंदगी के 21 साल तक कोर्स की किताब या कॉम्पीटिशन की तैयारी के लिए कुछ एक दूसरी किताबों को छोड शायद ही कुछ और पढा हो। वो तो शुक्र था कि छठी क्लास से ही रेग्यूलर लाइब्रेरी जाता रहा। वर्ना पता चलता कि आज अपन भी बेरोजगारों की भीड में खडे हैं।
लाइब्रेरी में अखबार के बाद इंडिया टुडे, प्रतियोगिता दर्पण या विज्ञान प्रगति को छोड कुछ और नहीं पढता। कई बार याद है कि छोटे होने के नाते मुझसे बडे उम्र के लोग प्रतियोगिता दर्पण मांगकर बालहंस और सुमन सौरभ पढने की सलाह देते। हां बस कई बार चोरी छिपे गृहशोभा जरूर उठा लेता था ( बच्चों को गृहशोभा पढने से लाइब्रेरियन रोकता था)
पहली बार उपन्यास या कोई और किताब मैंने स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता में आने के बाद एक वरिष्ठ साथी की राय पर सुरेद्र वर्मा की “मुझे चांद चाहिए” पढी। उसके बाद मुझे ऐसी धुन सवार हुई कि पत्रकारिता में शुरुआती दो तीन साल में 20 25 प्रमुख किताबें पढ डाली। अब हर साल बुक फेयर से न न करते भी दस बारह किताबें तो ले ही आता हूं। पर ये ब्लॉगिंग के चस्के ने चार घंटे तो नेट पर ही बैठने को मजबूर कर दिया।
खैर इन सबके बाद मैं देखता हूं तो लगता कि मेरे बाद पत्रकारिता में आने वाले या दूसरे युवा साथियों की हालत तो मुझसे भी ज्यादा खराब है। कई बार खुद को साइंस का स्टूडेंट मानकर सोचता हूं कि शायद मुझे हिंदी साहित्य की इतनी जानकारी नहीं है, तो चलेगा। पर शायद मेरा यह रवैया भी ठीक नहीं।
कई बार जब हिंदी साहित्य, संस्कृत या इतिहास से जुडा मामला खोजना होता है तो विकिपीडिया या गूगल ही आखिरी समझदार साथी होता है। मसलन अभी समस्या सामने आई कि हिंदी महीनों के हिसाब से कौनसी रितु कब आती है। कई लोगों से पूछा किसी को ठीक से जानकारी नहीं थी। वो तो भला हो विकिपीडिया का कि वहां सब कुछ है, वर्ना ये भी नहीं पता चलता कि बसंत पंचमी जरूर आ गई पर बसंत का मौसम तो मार्च अप्रैल में आएगा। इसलिए अब कई बार लगता है कि जो 21 साल तक पढा वो शायद कहीं काम नहीं आ रहा और यूं रस्ते चलते जो सबक सीखे थे वो व्यावहारिक जिंदगी में ज्यादा उपयोगी साबित हो रहे हैं।
Subscribe to:
Posts (Atom)
