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Wednesday, February 4, 2009

चवन्नी चैप के ब्लॉग पर मैं

वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रहामत्ज ने इस बार अपने ब्लॉग चवन्नी चैप में हिंदी टाकिज सीरिज लिखने के लिए मुझे मौका दिया है। यह पूरा की पूरा मैटर मैं यहां भी लगा रहा हूं। पूरी सीरिज उनके ब्लॉग पर उपलब्ध है।
अजयजी ने मुझे मौका दिया मैं इसके लिए उनका आभारी हूं।- राजीव जैन


हिंदी टाकीज
कभी सोचा नहीं था कि फिल्‍म देखने और उससे जुडे अनुभव लिखने का मौका मिलेगा। पर एक दिन अजयजी सर का मेल मिला कि आप हिंदी टाकीज के लिए एक कडी लिखिए तो ऑफ के दिन समय निकालकर यादें ताजा करने बैठ गया। कोशिश की है कि फिल्‍मों से जुडे कुछ अच्‍छे बुरे अनुभव आपके साथ बांट सकूं।

राम तेरी गंगा मैली
मुझे अब याद नहीं कि इस फिल्‍म में क्‍या था, मैं शायद तब बमुश्किल छह-सात साल का रहा होगा। पर यह मेरी पहली फिल्‍म होने के साथ साथ ऐसी इकलौती फिल्‍म है जो मैंने अपने पूरे परिवार के साथ देखी हो। पापा, मां, दादी और हम दोनों भाइयों को लेकर शायद इसलिए यह फिल्‍म दिखाने ले गए हों कि फिल्‍म का टाइटल ‘राम तेरी गंगा मैली’ था। अगर फिल्‍म का पोस्‍टर न देखा हो तो फिल्‍म न देखने वाले को धार्मिक फिल्‍म जैसा अहसास देता है। खैर मुझे एक दो सीन याद आ जाते हैं और यह भी याद है कि हम फिल्‍म खत्‍म होने से थोडा पहले ही ही उठकर चले आए, ताकी फिल्‍म खत्‍म होने के बाद बाहर निकलने के लिए धक्‍का-मुक्‍की न करनी पडे।


मेरी पहली फिल्‍म
इसके बाद मैं शायद स्‍कूल से ही पहली बार फिल्‍म देखने गया था। शायद फिल्‍म का नाम छोटा जादूगर था। हमें सातवीं और आठवीं में साल में एक बार टॉकिज ले जाया जाता था। टैक्‍स फ्री फिल्‍म थी सो टिकट भी दो या तीन रुपए से ज्‍यादा नहीं होता था। क्‍यूंकि उस समय हमारे शहर में पांच रुपए के आसपास तो पूरा टिकट ही था।
इन दिनों वैसे मैं फिल्‍में भले ही न देखता रहा हों, लेकिन फिल्‍म के पोस्‍टर जरूर देखता था। क्‍यूंकि हमारी स्‍कूल बिल्डिंग के एक कॉर्नर में ही पोस्‍टर लगाए जाते थे।

प्रचार का अनोखा स्‍टाइल
उस समय फिल्‍म के प्रचार का स्‍टाइल भी अब के स्टाइल से थोडा अलग हुआ करता था। एक उदघोषक महोदय रिक्‍शे में बैठकर निकलते थे और एक फिल्‍मी गाने के साथ साथ बीच बीच में माइक पर चिल्‍लाते हुए जाते थे ‘आपके शहर के नवरंग टाकिज में लगातार दूसरे सप्‍ताह शान से चल रहा है आंखें। आप देखिए अपने परिवार यार दोस्‍तों को दिखाइये। फिल्‍म में हैं गोविंदा::, चंकी पांडेय।‘ इसी का असर था कि हम स्‍कूल से पैदल लौटते हुए भी इसी तरह चिल्‍लाते हुए अपने मौहल्‍ले तक पहुंचते थे।

एग्‍जाम के बाद फिल्‍म का साथ
नवीं क्‍लास के बाद हम लोग बडे बच्‍चों की गिनती में आ गए थे। वैसे टाकिज तक तो मैं रोज जाता था। मेरे शहर कि सार्वजनिक लाइब्रेरी भी उसी बि‍ल्डिंग में ही थी और मैं दसवीं तक रोज लाइब्रेरी रोज जाता था। दसवीं और उसके बाद तो एग्‍जाम के बाद पिक्‍चर देखना जाना बीएससी फाइनल ईयर के लास्‍ट एग्‍जाम तक उत्‍सव की तरह चला। यही वह दिन होता था जब मां को कहकर जाते कि खाना जल्‍दी बना दो पिक्‍चर देखने जाना है और छह से नौ बजे के शो के लिए भी वो कुछ न कहती थीं।

कोटा और हर टेस्‍ट
पीएमटी के लिए एक साल डॉप किया और कोचिंग करने हम कई दोस्‍त कोटा चले गए। कोचिंग में हर सात या चौदह दिन में रविवार को यूनिट के हिसाब से टेस्‍ट होता था। इसकी रैं‍किंग लिस्‍ट भी बनती थी। यानी टैस्‍ट होने तक मारकाट मची रहती थी। संडे को 3से 5 बजे तक टेस्‍ट हुआ करता था। और उसके बाद छह से नौ बजे तक के शो के लिए हम लोग ऑटो करके टॉकिज तक सबसे पहले पहुंचने की कोशिश करते। इस साल जितनी फिल्‍में मैंने टाकिज में देखीं उतनी एक साल में अभी तक कभी नहीं देखीं। घर से बाहर मनोरंजन का इकलौता साधन यही हुआ करता था। फिल्‍म के बाद लौटते और खाना खाकर सो जाते अगले दिन से पिफर वही भागदौड।
इस दौर में जुडवा जैसी हिट फिल्‍म भी देखी, तो जैकी श्राफ की भूला देनी वाली फिल्‍म ‘’ भी देख डाली। जुडवां की टिकट खिडकी पर मैंने पहली बार कोटा के टॉकिज में लोगों को डंडे खाते देखा।(मेरे अपने गांव राजगढ में टिकट जुगाडना मेरे लिए बडी बात नहीं थी। हमारे शहर का लाइब्रेरियन ही पार्ट टाइम टिकट कीपर हुआ करता था) बाद में इंतजार इतना करना पडा कि छह से नौ की टिकट नहीं‍ मिली तो जुडवा का नौ से बारह बजे का शो देखना पडा।

एक फिल्‍म और कई दिन की चुप्‍पी
फायर एक ऐसी फिल्‍म थी जिसने मेरे घर में काफी गफलत कराई। शायद बीएससी सैकंड ईयर की बात थी। मम्‍मी पापा शहर से बाहर थे। मैं और मेरा बडा भाई घर पर थे। भाई ने हम दोनों का खाना बनाया। मां घर पर नहीं होती तो हमेशा ऐसा ही होता था। इतने में मेरा एक दोस्‍त आया और बोला कि तगडी फिल्‍म लगी है फायर, देखने चलें क्‍या। मैंने उसके बारे में सुन रखा था, इसलिए मैंने उसे मना किया। मैंने कहा कि भाई को बोलकर चलेंगे क्‍या? पता नहीं कैसे हुए कि भाई के दोस्‍तों ने भी फिल्‍म का प्‍लान बना रखा था। मेरी तो अपने भाई से ज्‍यादा खुला हुआ नहीं था पर मेरे दोस्‍त ने उनसे कहा कि हम फिल्‍म देखने जा रहे हैं आप भी चलो। उन्‍होंने कहा कि हां मुझे भी जाना है। मेरे हिसाब से उन्‍हें तब तक फायर की स्‍टोरी लाइन का पता नहीं था। हम दोनों चले गए। छोटा शहर था एक ही हॉल था बॉक्‍स में 25 के आसपास ही सीट थी। हम दोनों भाई एक लाइन में ही आगे पीछे ही बैठे थे। फिल्‍म में जब शबाना आजमी और नंदिता दास के अंतरंग दृश्‍य आने लगे तो मैंने दोस्‍त से कहा यार चल यहां से भाई भी यही हैं, अच्‍छा नहीं लगता। दोस्‍त नहीं उठा, हम कुछ करते इससे पहले ही हमारे भाई की मित्र मंडली में से मेरे भाई सहित कुछ लोग बाहर चले गए। और मैं नौ बजे पूरी फिल्‍म देखकर ही घर लौटा। भाई ने लौटने के बाद कुछ नहीं पूछा, घर में शांति रही। और हम दोनों भाइयों ने शरमाशर्मी में कई दिन तक आपस में बात भी नहीं की।
मेरी दिल्‍ली 2002 से 2005 तक दिल्‍ली-नोएडा रहा। तीन साल में टॉकिज पर बमुश्किल आठ-दस फिल्‍में देखी होंगी, लेकिन अगर टीवी पर देखी गई फिल्‍में मिलाकर कहूं तो शायद अपने जीवन की सबसे ज्‍यादा फिल्‍में मैंने इन्‍हीं दिनों में देखीं।
दिल्‍ली में शुरुआती दिन थे, मैं दिल्‍ली के बारे में ज्‍यादा कुछ नहीं जानता था। ऑफ वाले दिन मयूर विहार से सीधी बस में बैठकर कनॉट प्‍लेस के लिए निकलता। रीगल में अगर कोई ठीकठाक फिल्‍म होती तो देख लेता, क्‍यूंकि अकेले या किसी एक और दोस्‍त के साथ कहीं और टॉकिज ढूंढने से अच्‍छा यही होता। अग्निवर्षा जैसी फिल्‍म मैंने इसी टाकिज में देखी। कोंडली से दरियागंज में गोलछा तक पहुंचना आसान हुआ करता था, देवदास इसी हॉल में देखी गई।
इन्‍हीं दिनों की बात है मुगल ए आजम कलर में दोबारा रिलीज हुई। अट़टा पर नोएडा में पहला म‍ल्‍टीप्‍लेक्‍स बनकर तैयार हुआ। बचपन से ही इस फिल्‍म को बडे पर्दे पर देखने की इच्‍छा थी। इसलिए री रिलीज के अगले दिन ही हम देखने पहुंच गए। फिल्‍म में मजा भी आया पर मेरे पीछे बैठे एक प्रेमी युगल की कलाकारी और फिल्‍म में उर्दू के डायलॉग का मजाक उडाना बीच बीच में परेशान करता रहा।

एमजेएमसी की मस्‍ती
सही मायनों में फिल्‍म को मस्‍ती करते हुए एंजाय करना मैंने इन्‍हीं दिनों में सीखा । सत्‍तर अस्‍सी रुपए से ज्‍यादा की टिकट खरीदकर ग्रुप में फिल्‍म देखने का मजा यहीं लिया। धूम और रंग दे बसंती जैसी फिल्‍में देखीं। सही मायनों में यही वही ऐज थी जब मैं नौकरी करते हुए फिर से कॉलेज लाइफ जी रहा था और हम एक साथ लडके, लडकियां यूनिवर्सिटी के बाद आमतौर पर बिना किसी को बताए हुए ही फिल्‍म चले जाते थे।

पीसी और फिल्‍में
2005 और उसके बाद सीडिज इतनी सुलभ हो गई कि कई सालों से जिन जिन फिल्‍मों का नाम सुना था, देख नहीं पाया। वे सभी कम्‍प्‍यूटर पर देखीं। वाटर, मैंने गांधी को नहीं मारा, निशब्‍द जैसे विवादास्‍पद फिल्‍में शामिल है। और अब लैपटॉप लेने के बाद तो फिल्‍म देखना और आसान हो गया है। मैंने जुरासिक पार्क से लेकर पुरानी देवदास तक जो मेरा मन करता है। कहीं से भी पैन डाइव सीडी, नेट या किसी की हार्ड डिस्‍क कॉपी करके देखीं। दो घंटे या उससे थोडे ज्‍यादा में फिल्‍म खत्‍म। यानी कुल मिलाकर अब फिल्‍म देखना आसान हो गया है।

:::और अब
टाकिज में अकेले जाने का मन नहीं करता और फिल्‍म देखना इतना महंगा हो गया है कि अब सावरिया, गजनी, वैलकम टू सज्‍जनपुर जैसे अच्‍छी और बडे बजट वाली फिल्‍में ही टॉकिज में देखता हूं। बाकी लैपटॉप पर देखकर ही काम चला लेता हूं।

Sunday, September 14, 2008

इंतजार कीजिए इंटरनेट पर राज करेगी हिंदी


इंटरनेट पर हिंदी का तेजी से विकास हुआ है। फोंट की समस्या अब लगभग खत्म हो चुकी है, यूनिकोड फोंट के बाद हिंदी की लगभग सभी वेबसाइट इसी फोंट में आ गई हैं। दो साल पहले तक हिंदी भाषी इंटरनेट पर या तो टूटी-फूटी अंग्रेजी में मेल करता था या फिर रोमनाइज भाषा में, पर अब स्थिति बदल रही है वह अपनी मातृभाषा में ही लिख सकता है, और फोंट भी अटैच करके भेजने का झंझट खत्म। इंटरनेट पर हिंदी में लिखने के लिए अब लिपिका जैसे ऑनलाइन यंत्र आ गए हैं। किसी भी फोंट को यूनिकोड में परिवर्तित करने के लिए ढेरों फोंट परिवर्तक मौजूद हैं।
ब्लॉगिंग ने भी इंटरनेट पर हिंदी के विकास में अहम योगदान दिया है, लोगों को हिंदी में लिखना सिखाया। मैं ऐसे बहुत सारे लोगों से परिचित हूं, जिन्होंने ब्लॉगिंग के लिए ही हिंदी टाइपिंग सीखी, जो नहीं सीख पाए वे भी आसानी से ट्रांसलिट्रेशन के जरिए हिंदी में लिख रहे हैं।
हिंदी लिखने में आसानी का ही असर है कि 2007 की शुरुआत में 500 चिट्ठे वाला ब्लॉगजगत अब छह हजार का आंकड़ा पार कर गया है। 4300 हिंदी ब्लॉग तो अकेले चिट्टाजगत पर ही रजिस्टर्ड हैं। जुलाई 2007 में चिट्टाजगत पर कुल 4000 पोस्ट लिखी गई, जो जून 2008 में 10 हजार से ज्यादा हो गई।
हमें हिंदी के पिछड़ेपन का रोना छोड़कर देखना होगा कि आम आदमी अपनी जुबान में क्या कहना चाहता है। अब लोग ऑरकुट पर भी हिंदी में स्क्रैप भेज रहे हैं, भले ही वो अंग्रेजी को देवनागरी में लिखने से आए। हर वक्त भाषा की शुद्धता का ध्यान रखने वाले हिंदी के बड़े विद्वानों को सोचना होगा कि हम हिंदी को कैसे आमजन की भाषा बनाएं।
बस हमें चिंता इस बात की करनी चाहिए कि कि इंटरनेट पर हिंदी की संदर्भ सामग्री (जैसे विकिपीडिया) को कैसे और ज्यादा समृद्ध बनाया जाए। हमें विषय आधारित चिट्ठे बनाने होंगे। अभी का हाल यह है कि तीस फीसदी लोग तो हिंदी ब्लॉग पर सिर्फ क वितागिरी करते हैं, बाकी इधर-उधर की बातें और समसामयिक चर्चा। एक और चिंता की बात हम हिंदी माध्यम वाले अंग्रेजी विकिपीडिया से सामग्री लेते हैं, लेकिन उसकी एवज में अनुवाद करके हिंदी विकिपीडिया नहीं डालते। हम रोज सिर्फ उस अनुवाद को ही हिंदी विकिपीडिया पर डाल दें तो सालभर बाद यह परिदृश्य बदल जाएगा।
हिंदी के रेफरेंस के लिए काम करने वाले शब्दों का सफर जैसे नियमित चिट्ठों की संख्या एक फीसदी से भी कम है। अब जैसे-जैसे लोगों का इस ओर रुझान बढ़ेगा,विषयों की विविधता बढ़ेगी,लोग जुड़ेंगे। धीरे धीरे ही सही,एक दिन हिंदी भी नेट पर राज करेगी।
(डेली न्यूज़ में हिंदी दिवस पर प्रकाशित असंपादित लेख)

Tuesday, July 29, 2008

वाह रे चुतियापा !

शुरुआत में यह शब्द पढ़कर आपको निराशा हो सकती है। पर आजकल जिंदगी में यही चल रहा है। रोज-रोज की भागदौड़ और बिना बे्रक के नौकरी में शायद एक यही शब्द है चुतियापा, जो रोज-रोज करना होता। लेकिन हर रोज पहले दिन से अलग और उससे कहीं बेहतर। यह सब जरूरी है अगले दिन सकुशल ऑफिस आने के लिए। हो सकता है मेरी तरह दूसरे लोग भी इसे फील करें, लेकिन शायद अब तक लिख न पाए हों। पांच-छह साल तक रोज-रोज वही सिंगल-डीसी, कॉलम-दो कॉलम कर करके कई बार लगता है कि ये क्या कर रहे हैं। जवाब वही चुतियापा! बहुत दिन हो गए, ऑफिस में काम करके सिर इतना पक जाता है कि न ब्लॉग लिखने की हिम्मत होती है न पढ़ने की। पूरा जुलाई बीत गया, एक वीडियो पोस्ट करने के अलावा मैं ब्लॉग के लिए ही समय नहीं दे पाया। कई बार लगता है कि ब्लॉग पर भी चुतियापा शुरू हो गया है। हमारे भाई लोग इतने आ गए हैं, कि शुरुआती दिनों में जो अच्छी अच्छी बातें थी, उनकी जगह आपकी टीका-टिप्पणी और दुकानदारी ने ले ली है। ब्लॉग पर मीडिया की खबरों में जयपुर का नाम आते ही मुझे घूरने लगते हैं। कुछ लोग तो ऐसे हैं जिन्हें यह नहीं पता कि ब्लॉग किस चिडि़या का नाम है। और डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट फलां फलां डॉट कॉम में तेरी फोटो देखी और तू क्या क्या लिखता है टाइप की बात पूछते हुए आ जाते हैं। वो तो शुक्र है कि अब जयपुर में कम से कम 25 ब्लॉगर्स हो गए हैं। खैर ये तो हुआ ब्लॉग न लिखने का कारण आज का चुतियापा यहीं खत्म शुरुआत पर दिल की बातें यूं ही जारी रहेंगीशुक्रिया

Friday, June 13, 2008

जयपुर से ब्लॉग पर दो कार्टूनिस्ट

जयपुर में ब्लॉगिंग तेजी से लोकप्रिय हो रही है। सभी ब्लॉगर्स को बधाई। अभी तक ब्लॉग जगत पर कार्टूनिस्ट के रूप में अपने कीर्तिश भट्ट जी ही थे। उनका साथ देने के लिए जयपुर से दो जाने-माने कार्टूनिस्ट ब्लॉगजगत पर आ गए हैं। शायद अभी तक ब्लॉगवाणी, चिट्ठाजगत और नारद से नहीं जुड़ पाए हैं। इसलिए मैं आप तक यह शुभ सूचना पहुंचा रहा हूं।
नए ब्लॉगर्स का उत्साहवर्धन करने के लिए आप उनके ब्लॉग पर इस लिंक से जा सकते हैं।
अभिषेकजी तिवारी
सुधाकरजी सोनी

Sunday, March 23, 2008

मैं और ब्‍लॉगिंग का एक साल

मुझे ब्‍लॉगिंग करते हुए एक साल हो गए।
पहली पोस्‍ट बेशक हिंदी में नहीं में नहीं थी, कई दिन तक हिंदी लिखने का तरीका खोजता रहता, पहले यूनीनागरी और आखिरकार आईएमए से हिंदी लिखने लगा। पहली बार ऑनलाइन बिना सुमित स्क्रिप्‍टराइटर या किसी सॉफटवेयर से हिंदी लिखने पर इतनी खुशी हुई कि बयां नहीं की जा सकती।
इतनी खुशी तो तब भी नहीं हुई जब 31 दिसंबर 2007 को दैनिक हिंदुस्‍तान ने दुनिया को बदलने वाले दस साल में ब्‍लॉग को सबको अभिव्‍यक्ति का समान अवसर देने वाला सूचना का माध्‍यम बताते हुए, लिखा कि ब्‍लॉगिंग कुछ के लिए शुरुआत है, क्‍योंकि जिंदगी सिखाती है कुछ।
बीते साल भर में 65 पोस्‍ट लिख दीं। कुछ दिन बहलाने के लिए कुछ सूचनाएं इधर उधर करने के लिए। शुरुआत में सिर्फ मनोरंजन के लिए बस यूं ही ब्‍लॉग बना लिया, बाद में कई ऐसे लोगों से मिला, जिनसें बिना ब्‍लॉगिंग के मिलना असंभव था।
धीरे धीरे ब्‍लॉगिंग करने वालों का एक परिवार बन गया। जयपुर में एक ब्‍लॉगर्स मीट की। अपने ही समाचार पत्र के लिए ब्‍लॉगिंग पर एक लेख लिख मारा।
भाई लोगों ने सप्‍ताह का ब्‍लॉगर में इंटरव्‍यू ले लिया।
कविता से लेकर फिल्‍म तक, जहां जहां मन हुआ अपना लिखा और दिल को तसल्‍ली दी। कई बार अच्‍छे कमेंट और कॉम्‍पलिमेंट मिले, कई बार जानकारी पूरी रखने का संदेश और मार्गदर्शन। पर बस अब ब्‍लॉगिंग अपनी आदत में शुमार हो गई।
नेट पर बैठते ही पहले बस यूं ही जो मन हुआ खोलकर बैठ जाता। जरूरी नहीं हर बार काम की चीज होती, घंटों चैटिंग भी की। पर अब ये सब लगभग बंद हो गया है।
ब्‍लॉग पढने में ही दो घंटे तक गुजर जाते हैं।
बस अब यही कोशिश है कि इस अनियमित ब्‍लॉगिंग को धीरे धीरे विषय आधारित ब्‍लॉगिंग तक ले जाऊं। अब तक ज्‍यादातर ब्‍लॉग मैंने अपनी ही जिंदगी पर लिखे।
सभी वरिष्‍ठ चिटठाजनों का मार्गदर्शन मिलता रहेगा। वे लोग जो नियमित रूप से मेरी शुरुआत पढते हैं, फीडबैक मुझ तक पहुंचाते रहेंगे।
साल भर झेलने के लिए शुक्रिया

Saturday, January 5, 2008

इसलिए जरूरी है ब्‍लॉगिंग का एक रेफरेंस ब्‍लॉग

साइबर आसमां में हिंदी ब्‍लॉगों की उडान, लिखते समय मैंने बहुत सारे ब्‍लॉग फिर सर्च किए। कुल मिलाकर ये समझिए की मैंने लगभग हर उस ब्‍लॉग इवेंट को याद करने की कोशिश की जो इस बीते साल में हुई थी। अगर मुझे सिर्फ अपने लिए ही लिखना होता तो शायद मैं इतनी मेहनत नहीं करता पर मेरे एक सीनियर ने सिर्फ मेरा ब्‍लॉग देखकर साल भर की समीक्षा के लिए एडिट पेज पर चल रही श्रंखला के लिए युवा विशेष वाले पेज के लिए ब्‍लॉग जगत की समीक्षा के रूप में मुझे कुछ लिखने का काम सौंपा।

खबरें कई बार लिखीं पर एडिट पेज पर कुछ लिखना यह मेरे लिए पहली बार था। इसके लिए कई दिग्‍गज ब्‍लॉगर्स समीक्षा आदरणीय जीतूजी,मैथिलीजी,यशवंतजी और नीलिमा चौहान और कई मित्रों से संपर्क साधा। हां यशवंतजी और नीलिमाजी की ओर से जानकारी भी उपलब्‍ध कराई।

मैं चाहता हूं कि ब्‍लॉग खबरिया में सभी बडे ब्‍लॉगर्स और उनकी कहानी। ज्‍यादा नहीं तो कम से कम जो बडे अखबारों में कॉलम लिख रहे हैं या वेबदुनिया की ब्‍लॉग चर्चा में आ चुके हैं, ताकी हमारा अपना ब्‍लॉग जगत तेजी से आगे बढे जो लोग ब्‍लॉग के मामले में कम समझते हैं, जानकारी हासिल कर सकें।

लेकिन कुल मिलाकर मैंने महसूस किया की ब्‍लॉग जगत की अधिकृत जानकारी देने के लिए कोई मंच नहीं है। अगर आपको कोई आंकडा या अंदाजा चाहिए तो कैसे जुटाएंगे, यह बडी समस्‍या है। इसलिए मुझे यह आलेख सबमिट करने की आखिरी तारीख 30 दिसंबर तक मैं इस नतीजे पर पहुंच चुका था कि ब्‍लॉग की खबर रखने वाला भी एक ब्‍लॉग होना चाहिए। (हालांकि इस बीच बेनजीर भुटटो के निधन के कारण यह छपा जरूर 3 जनवरी को) मैंने एक ब्‍लॉग बनाया 'ब्‍लॉग खबरिया'(http://blogkhabaria.blogspot.com/), हालांकि अभी किसी एग्रीगेटर से अटैच नहीं होने के कारण यह अभी सभी को दिखाई नहीं दे पा रहा।
उम्‍मीद है आप सभी मेरी बात से सहमत होंगे और आपका आशीर्वाद मिलेगा।


बिल्‍कुल आपकी मदद ली गई रविजी
आदरणीय रविजी आप ब्‍लॉगिंग के द्रोणाचार्य हैं। मेरा जैसा नौसिखिया आप जैसे दिग्‍गजों के नाम सुनकर और सहायता से ही ब्‍लॉग की तरफ आकर्षित हुआ। साइबर आसमां में हिंदी ब्‍लॉगों की उडान आलेख आपसे प्रेरित है। बहुत लोगों से बातचीत या मेल के आदान प्रदान के अतिरिक्‍त मैंने दिलीप मंडल जी और आपके ब्‍लॉग को रेफरेंस की तरह इस्‍तेमाल किया। (मंडलजी के रिजोलुशन वाला हिस्‍सा संपादकजी की कैंची का शिकार हो गया।) जब ब्‍लॉगजगत की समीक्षा करनी थी तो बिना आपकी मदद के लिए यह कैसे संभव हो पाता। ये बात अलग है कि मैं आपाधापी में आपसे संपर्क नहीं कर पाया।

साइबर आसमां में हिंदी ब्‍लॉगों की उडान


जयपुर से प्रकाशित राजस्‍थान पत्रिका ग्रुप के हिंदी अखबार डेली न्‍यूज में 3 जनवरी को हिंदी ब्‍लॉग जगत पर समीक्षात्‍मक लेख छपा है। पूरा लेख आप यहां पढ सकते हैं।

हिंदी के गलियारों में ब्‍लॉग और चिटठाकारिता जैसे शब्‍द खूब चर्चित हुए, बीते साल भर में ब्‍लॉग की संख्‍या 500 से 1500 हो गई, अभिव्‍यक्ति को मानो पंख लग गए।

हम ब्लॉगिंग को ‘ईवेंट ऑफ द ईयर’ भी कहें तो कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होगी। बदलते परिदृश्‍य में ब्‍लॉग तेजी से लोकप्रिय हुआ। 2007 की शुरुआत में हिंदी ब्‍लॉग्‍स की संख्‍या करीब 500 थी, जो साल के अंत में 1500 हो गई।
ब्‍लॉग की जीत में सबसे बडी बात थी यूनिकोड फान्‍ट का प्रचार प्रसार, जिसने हिंदी चिटठाकारिता को प्राणवायु दी। हिंदी भाषा के डायनमिक फांट से हिंदी फांट को लेकर होने वाली सभी दिक्कतें खत्म हो गईं। अभिव्‍यक्ति जैसी हिंदी साहित्‍य की वेबसाइट यूनिकोड में आ गई। गूगल ने हिंदी सर्च और हिंदी वर्तनी की जांच सुविधा गूगल डॉक्‍स में उपलब्‍ध कराई। माइक्रो सॉफट ने विस्‍टा लॉन्‍च किया, जिससे हिंदी लिखना आसान हो गया और मुफ़्त फ़ॉन्ट परिवर्तक भी जारी किया। लिनिक्स भी पीछे नहीं रहा और भारत में बॉस जारी किया।
गूगल ने हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए हिन्दी ट्रांसलिट्रेशन औजार जोड़ दिया। इसके बाद तो मानों हिंदी ब्‍लॉगिंग को पंख लग गए।
इस साल की सबसे बड़े ब्लाग इवेंट एग्रीगेटर नारद का मोहल्ला ब्‍लॉग से विवाद और इसके बाद मैथिली गुप्‍त का नया एग्रीगेटर ब्लागवाणी बनाना है। ब्‍लॉगवाणी तुरंत ही हिट हो गया और अब ब्‍लॉगवाणी पर 500 से ज्‍यादा ब्‍लॉग रजिस्‍टर है। अब तो इन चिट्ठासंकलकों यानी एग्रीगेटर्स के बीच जमकर प्रतियोगिताएं चल रही हैं कि कौन ज्यादा से ज्यादा सुविधाएँ दे सकता है। और इससे हिन्दी का ब्लॉग लेखक खुश है पर, उनकी आपसी खींचतान अप्रिय, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के स्तर पर आ पहुंची थी जिसका अफसोस इस वर्ष हम सभी को रहेगा। संकलक अब हिन्दी चिट्ठों को आसान रोमन लिपि में भी दिखाने लगे।
साल की दूसरी बडी चिटठा हलचल कम्युनिटी ब्लॉग के रूप में भड़ास का जन्म, अचानक यशवंतजी का उसको खत्‍म करना और उसका पुर्नजन्म लेकर 100 सदस्य बनाना बडा मामला था।
बीते साल की एक और बडी घटना है ब्लागर्स मीट यानी चिटठा मिलन समारोह। इसमें ऑनलाइन पहचान के चलते लोग ऑफलाइन यानी कि साथ बैठकर दोस्‍ती को आगे बढाने की कोशिश में लग गए। ब्‍लॉग ने अभिव्‍यक्ति का एक मंच प्रदान किया।

नौसिखियाओं के साथ साथ साहित्‍यजगत के बड़े बडे नामधारी ब्लागिंग की दुनिया में आए। साहित्यकार और कथाकार उदय प्रकाश का ब्लाग, अभिनेता आमिर खान का ब्लाग। इसके अलावा ढेरों दिग्‍गज पत्रकार ब्‍लॉग लेकर आए।

ब्‍लॉग पर ऐसे ऐसे सब्‍जेक्‍टस पर चिंतन मनन हुआ जिसकी हम कम से कम हिंदी मीडिया में तो कल्‍पना नहीं कर सकते। हिंदी ब्लॉग्‍स पर इस साल व्यावसायिकता का सवाल बहुत दमदार तरीके से डिस्कस किया गया। हिंदी ब्लॉगिंग क्या रूप अख्तियार कर रही है और उसका क्या रूप होना चाहिए पर बहस पुरजोर तरीके से हुई है, सराय द्वारा प्रायोजित नीलिमा चौहान और गौरी पालीवाल की हिंदी चिट्ठाकारिता पर की गई रिसर्च भी इसी क्रम में काबिले गौर है। सामाजिक राजनीतिक और नैतिकता से जुडे मसलों पर तीखी बहसों को बहुत तवज्जो मिली ।
जुलाई में चलती रेलगाड़ी से पहला हिन्दी ब्‍लॉग लिखा गया। इसने हिन्दी में व्यवसायिक चिट्ठाकारी को सफल होने में खासा योगदान भी दिया।

ब्‍लॉग भी कम्‍यूनिकेशन का एक माध्‍यम है अगर इसकी चर्चा भी संचार के दूसरे माध्‍यमों पर होने लगे तो यह सही मायनों में ब्‍लॉग की जीत है। इस बात को हम ठीक उसी तरह समझ सकते हैं, जैसे फिल्‍म समीक्षा अखबार और टेलीविजन पर होती है। इसका मतलब है कि अखबार या टेलीविजन चैनल दोनों को पता है कि फिल्‍में अहम हैं और उसकी समीक्षा की जानी चाहिए। ब्‍लॉग की समीक्षा की शुरुआत को इसी परिप्रेक्ष्‍य में लिया जाना चहिए कि ब्‍लॉग जगत में क्‍या चल रहा है, इससे लोग इत्‍तेफाक रखने लगे हैं।
हिन्दी ब्लॉग जगत में पत्रकारों के पदार्पण के बाद पहले प्रिंट मीडिया और फिर इलेक्‍टॉनिक मीडिया में हिन्दी ब्लॉगों के चर्चे होने लगे। यूं तो हलचल पहले भी हो रही थी, परंतु राष्ट्रीय अख़बार में पहली पहल हिन्दुस्तान टाइम्स में हुई, और बाद में एनडीटीवी के शनिवार सुबह के कार्यक्रमों में हिन्दी ब्लॉगों के अच्छे खासे चर्चे होते रहे। कादंबिनी में ब्‍लॉग पर लेख छपा, हिंदी अखबारों में ब्‍लॉग पर नियमित कॉलम शुरू हुए। जनसत्‍ता में टीवी पत्रकार और मोहल्‍ला वाले अविनाश ब्‍लॉग समीक्षा लिखते हैं। मतलब, हिंदी भाषियों की भावनाओं को ऑनलाइन पंख लग गए हैं। उम्‍मीद कीजिए, रोजगार का नया क्षेत्र खुलने वाला है।