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Tuesday, July 21, 2009

शादी के बाद ........

शादी से लौटकर आया, इनबॉक्स देखा तो कई शुभचिंतकों की शुभकामनाएं और प्रतिक्रियाएं मिली। कई ने ब्लॉग लिखने को कहा। पर अभी मूड नहीं बन पा रहा। शायद अभी खुमारी ही नहीं उतर रही।
शादी से लौटकर पांच मिनट पहले ही किसी दोस्त खत्म हुई चैट हूबहू पेस्ट कर रहा हूं। शादी के बाद क्या परिवर्तन हुआ, इसका आसानी से पता चल जाएगा।

Gaurav: hello
Sent at 1:28 AM on Wednesday
me: hi
Gaurav: kya chal raha hai
ghoom kar aaya kaha
me: haan aa gaya manali
Gaurav: kaisa raha
Sent at 1:30 AM on Wednesday
me: maje
tu bata kaya chal raha hai
Gaurav: kuch nahi yaar
same college lyf
bhabhi abhi rgh hi hai ?
Sent at 1:32 AM on Wednesday
me: haan yaar
badi mushkil se jaipur mein time gujar raha haun
uske bina
dil nahi lag raha
Gaurav: haa haa
sahi bol raha hai, kab laane ka hai
Sent at 1:34 AM on Wednesday
me: diwali tak
yaar
Gaurav: oh :(
very bad
me: jingi pahle se jayda ulaj gai hai
dil waha naukri yaha
Gaurav: hmm wo to hai
off bhi 1 din ka hi hai
me: haan yaar
Gaurav: shaadi ke baad kaisa lag raha hai..
Sent at 1:38 AM on Wednesday
me: jimedari ka ahasas
Gaurav: ab tu shaadi shuda logo se shikayat nahi rakhega :)
Sent at 1:39 AM on Wednesday
me: haan sahi hai
per mein aaj bhi logo ko pahle ki tarah SMS karkr pareshan kar raha hun
Gaurav: haa haa
shaadi kaisi rahi
sab bhabhiyaa ayi
Sent at 1:43 AM on Wednesday
me: haan
sumit ke orkut per photo hai dekh le
Gaurav: wo to dekh li
Sent at 1:46 AM on Wednesday

Thursday, April 23, 2009

असमंजस, क्‍या हम सही हैं?

आफिस के बाद आजकल रोज चाय पीने का चस्‍का लग गया है। हम लोगों की एक मंडली भी तैयार हो गई है, जो अमूमन रोज चाय पीने जाती हैं। दो बजे के बाद सुबह लगभग चार बजे तक यहां बैठना हमारी आदत में शुमार हो गया है।
रोज वहां चाय के बहाने अड्डा जमाने से हम लोगों की चायवाले (जो दुकान पर चाय बनाता है) से भी जान पहचान हो गई है। पीने को पानी मांगते हैं तो ज्‍यादातर एक प्‍लास्टिक की बोतल थमा देता है। चार चाय बोलेंगे मन हुआ तो छह बनाकर ले आता है।
अभी कल परसों ही पता चला उसके ठंडे और पानी के अच्‍छे टेस्‍ट का राज। भाई ने बताया कि बस फ्रीजर से बोतल निकाली ढक्‍कन हटाया और रैपर फाडकर फेंकने से बिसलरी की बोतल पानी की आम बोतल में बदल जाती है।
मुझे एकाएक झटका लगा कि क्‍या हम रोज बिसलरी पी रहे हैं।
कल चाय पीने सिर्फ हमारी बेचलर्स यूनियन (मैं, तरुण और ऋचीक)
ही गई थी। हमने सोचा कि इस भाई को समझाया जाए कि क्‍यूं मालिक को चूना लगा रह। है। बातचीत की तो बोला, इतना काम करता हूं पता नहीं सेठ का कितना फायदा कर देता हूं। दिन भर लोगों को लूटते हैं अब आप लोगों को ठंडा पानी और अच्‍छी चाय पिला देते हैं तो इस सेठ का क्‍या बिगड जाएगा।

(कल ऋचीक ने खासतौर पर यह पोज खिंचवाया )
बातचीत और समझाइश का दौर चला तो पता चला कि वो तो अपने तरुण भाई के गांव के पास का ही रहने वाला है।
कहने लगा आप लोग इस चाय वाले को याद तो रखोगे। फिर अपने सेठ के कारनामे बताने लगा कि कैसे तीन रुपए की चाय पांच रुपए और दस रुपए कि ठंडी बिसलरी बीस रुपए में बेची जाती है। सेठ कहां ले जाएगा इतने पैसे थोडे आप लोगों पर खर्च हो जाएंगे तो सही रहेगा।

कल यह सब पता नहीं था, कल ही आधा ब्‍लॉग लिख चुका था पर आधी बात आज जानीं। अब तय नहीं कर पा रहा कि वो अकेले ही गलती कर रहा है या हम भी उसके काम में शामिल होकर और बुरा कर रहे हैं। वैसे तो मुझे लगता है कि शायद हमारे प्‍यार से बोलने और हमारी गपशप चायवाले को सुकून देते हों। रातभर की उसकी माथाफोडी में हम उसे अच्‍छे लगने लगे हों। पर मैं खुद तय नहीं कर पा रहा कि हम गलत हैं या सही।

Wednesday, December 31, 2008

आत्‍मविश्‍वास, घमंड और ये जरा सा अंतर

आत्‍मविश्‍वास या घमंड इन दो शब्‍दों के बीच जरा सा अंतर है। मैं यह कर सकता हूं, यह मेरा विश्‍वास है और सिर्फ मैं ही यह कर सकता हूं यह घमंड है। बात बहुत मजेदार और एक बडा सत्‍य है। इस बात को मैंने भी अपनी जिंदगी में देखा है और आप में से भी कई लोगों ने महसूस किया होगा। मैं इस बात को काफी पहले से जानता हूं और मानता हूं कि कभी कभी अति आत्‍मविश्‍वास में आदमी घमंडी हो जाता है।
यह सीधा सा फंडा मुझे एक बार फिर याद आया आमिर खान की नई फिल्‍म गजनी देखने के बाद। फिल्‍म में अपनी कंपनी एयर वायस सेल्‍यूलर के एमडी के रूप में बोर्ड मीटिंग में आमिर यह बात कहते नजर आते हैं। शायद आमिर इस बात को अच्‍छी तरह पचा चुके हैं। इसलिए वे आत्‍मविश्‍वासी है पर घमंडी नहीं।
(पर यह बात शायद अपने शाहरुख और यशराज बैनर वाले नहीं जानते। अपना सिक्‍का चलता देख सिर्फ 18 दिनों में बिना मेहनत के लिखी गई कहानी पर एक अवश्विसनीय फिल्‍म रब ने बना दी जोडी बना दी। और ये घमंड उन्‍हें ले बैठा)
नया साल चंद घंटों में आने वाला है। हम इसमें यह वचन लें कि अपने आत्‍मविश्‍वास को घमंड में न बदलने दें और जिंदगी को यूं ही चलने दें।

पथ पर
चलते रहो निरंतर.
सूनापन हो
या निर्जन हो
पथ पुकारता है गत-स्वन हो
पथिक,
चरण ध्वनि से
दो उत्तर
पथ पर
चलते रहो निरंतर ....!

(जनकवि त्रिचोलन के संकलन से साभार)

सभी को नववर्ष मंगलमय हो इसी उम्‍मीद के साथ।

Tuesday, July 29, 2008

वाह रे चुतियापा !

शुरुआत में यह शब्द पढ़कर आपको निराशा हो सकती है। पर आजकल जिंदगी में यही चल रहा है। रोज-रोज की भागदौड़ और बिना बे्रक के नौकरी में शायद एक यही शब्द है चुतियापा, जो रोज-रोज करना होता। लेकिन हर रोज पहले दिन से अलग और उससे कहीं बेहतर। यह सब जरूरी है अगले दिन सकुशल ऑफिस आने के लिए। हो सकता है मेरी तरह दूसरे लोग भी इसे फील करें, लेकिन शायद अब तक लिख न पाए हों। पांच-छह साल तक रोज-रोज वही सिंगल-डीसी, कॉलम-दो कॉलम कर करके कई बार लगता है कि ये क्या कर रहे हैं। जवाब वही चुतियापा! बहुत दिन हो गए, ऑफिस में काम करके सिर इतना पक जाता है कि न ब्लॉग लिखने की हिम्मत होती है न पढ़ने की। पूरा जुलाई बीत गया, एक वीडियो पोस्ट करने के अलावा मैं ब्लॉग के लिए ही समय नहीं दे पाया। कई बार लगता है कि ब्लॉग पर भी चुतियापा शुरू हो गया है। हमारे भाई लोग इतने आ गए हैं, कि शुरुआती दिनों में जो अच्छी अच्छी बातें थी, उनकी जगह आपकी टीका-टिप्पणी और दुकानदारी ने ले ली है। ब्लॉग पर मीडिया की खबरों में जयपुर का नाम आते ही मुझे घूरने लगते हैं। कुछ लोग तो ऐसे हैं जिन्हें यह नहीं पता कि ब्लॉग किस चिडि़या का नाम है। और डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट फलां फलां डॉट कॉम में तेरी फोटो देखी और तू क्या क्या लिखता है टाइप की बात पूछते हुए आ जाते हैं। वो तो शुक्र है कि अब जयपुर में कम से कम 25 ब्लॉगर्स हो गए हैं। खैर ये तो हुआ ब्लॉग न लिखने का कारण आज का चुतियापा यहीं खत्म शुरुआत पर दिल की बातें यूं ही जारी रहेंगीशुक्रिया

Wednesday, May 14, 2008

विश्वास नहीं होता जयपुर में विस्फोट हुए


विश्वास नहीं होता कि मेरे अपने शहर में विस्फोट हुआ है। शाम को सवा सात बज रहे थे। संपादकजी के साथ रोजमराü की तरह मीटिंग खत्म करके निकले ही थे कि अचानक किसी ने कहा कि जयपुर में बम फटे। मैंने मजाक में कहा शायद सूतली का बम फटा होगा। फिर किसी ने कहा कि नहीं बम विस्फोट हुआ है, तो भी मैं अपने शांतिप्रिय शहर से वाकिफ हूं। तब भी मैंने कहा कि हो सकता है कि कोई सिलेंडर फटा होगा। लेकिन तब तक ऑफिस के सारे फोन घराü गए, सभी रिपोर्टर्स और फोटोजनलिस्ट्स को मौके पर दौड़ा दिया। एक के बाद एक 35 मिनट के दौरान आठ धमाके हुए, 67 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा घायल हो गए।
टीवी चैनलों ने आनन फानन में खबरें चलाई। कुछ सही कुछ गलत, कितनी ही अफवाहें निकलीं, कुछ अपने ही दावे करते रहे। खैर देर रात तक अपने अपने दावे क्रिया प्रतिक्रिया आती रहीं। कुल मिलाकर साढे़ तीन बजे तक खबरों से जूजझते रहे। काम खत्म करके विस्फोट वाले इलाके को छोड़ शहर का चक्कर मारा, रास्ते में एक भी पुलिसवाला नहीं मिला। मैं असमंजस में था, शहर में आठ विस्फोट हुए उसके बावजूद पुलिस सिर्फ घटनास्थल तक ही सीमित, कमाल है?
घर पहुंच गया, लेकि न सुबह तक नींद नहीं आई। अखबारों का इंतजार करता रहा, शहर के सारे अखबार देरी से थे, सात बजे के बाद अखबार आए, सारी खबरें पढ़ लीं। मैं खुद रात में इन खबरों का हिस्सा था, लेकिन अब एक दिन बाद भी विश्वास नहीं होता कि जयपुर में भी ऐसा हादसा हो सकता है। पता नहीं किसकी नजर लगी है जयपुर की शांति को?

Wednesday, May 7, 2008

पत्रकारिता और भागमभाग

पत्रकारिता में आजकल भागमभाग का दौर है। मेरा मानना है कि हर दो साल में करीब साठ फीसदी से ज्‍यादा लोग नौकरी बदल रहे हैं। यानी हर आदमी तेजी में है। यह तेजी शायद खबर को जल्‍दी से जल्‍दी पाठक तक पहुंचाने वाले आजतक की तेजी से भी ज्‍यादा है। बीते एक साल में इतने समाचार पत्र और टीवी चैनल्‍स शुरू हुए कि यह रफतार और बढ गई।
रात की ही बात थी, आफिस से घर लौटकर बस यूं ही आरकुट पर मैसेज चैक कर रहा था। इसी बीच एक मित्र के फोटो एलबम पर नजर पडी। बात पर्सनल है और उससे भी ज्‍यादा वो फोटो जो अब दुबारा इस तरह किसी भी कीमत पर खींचा भी नहीं जा सकता। इस एक फोटो से आप मीडिया की भागदौड को साफ अनुभव कर सकते हैं।

अब सुनिए कहानी, फोटो में कुर्सियों पर बैठे लोगों को छोड ( फोटो में एक जयपुर की राजकुमारी हैं) बाकी सारे लोग आज उस संस्‍थान में नहीं है, जहां का यह फोटो है। यूं तो इस फोटो वाले दिन मैं खुद भी उसी टीम का हिस्‍सा था, इत्‍तेफाक से फोटो खिंचते समय मौके पर नहीं था। मैं खुद भी एक बार नौकरी बदल चुका हूं।
अब उस फोटो में राजकुमारी दीया को छोड 12 पत्रकारों में से समूह संपादक और तीन दूसरे वरिष्‍ठ साथी ही उसी संस्‍थान में हैं। बाकी अब दूसरी जगह नौकरी कर रहे हैं ( दाएं से चौथे, मेरे मित्र प्रवीण गौतम का सडक दुर्घटना में निधन हो गया।) वैसे उसी संस्‍थान में बचे हुए सभी लोगों का भी अपनी अपनी जगह से तबादला हो चुका है। यानी बदलाव तो सौ फीसदी है।
और तो और इधर उधर हुए लोगों में से आधे लोग तो इस दौरान दो बार नौकरी बदल चुके हैं। यानी कारण कुछ भी हो आदमी बदलाव चाहता है।
शायद सभी को पता है कि बहता पानी, ठहरे हुए से ज्‍यादा पवित्र माना जाता है!

Thursday, May 1, 2008

दिखावे पर न जाओ अपनी अक्‍ल लगाओ


आईपीएल के मैच चल रहे हैं। अपन तो क्रिकेट अप्रेमी आदमी है। हालाकि क्रिकेट से अपनी दुश्‍मनी सिर्फ इसलिए थी कि टाइम खराब होता है अपना और मिलता है पैसा खिलाडियों को। पर टवंटी टवंटी ने बाकी कुछ और नहीं तो पूरे भारत देश का थोडा टाइम तो बचाया है, सबकुछ वही है पर थोडा कम समय में निपट जाता है।
सुना है आजकल तो ये चीयरलीडर्स भी गजब ढा रही हैं। लोग कह रहे हैं कि आजकल भीड या तो शाहरुख, प्रीति जिंटा और करीना को देखने जाते हैं या फिर चीयरलीडर्स को, मैच में तो कम ही लोगों की दिलचस्‍पी है।
आईपीएल में एक के बाद एक लगातार तगडे धमाके हो रहे हैं। पहले मीडिया ने बहिष्‍कार की धमकी दी। उसके बाद शाहरुख ने कहा कि पहले कुछ और बताया वर्ना मैं कभी फ्रेंचाईजी ही नहीं खरीदता। उसके बाद अपन के भज्‍जी ने श्रीसंत को थप्‍पड जड दिया। इस बीच प्रीति जिंटा ने अपने खिलाडियों को जी भर के गले लगना शुरू किया। उसके बाद चीयरलीडर्स पर संसद में हो हल्‍ला हुआ। ठाकरे बोले कि उन पर खर्च होने वाला पैसा किसानों को मिले। अब आज की ही बात है जयपुर में मैच के बाद अपन की राजस्‍थान रॉयल्‍स टीम के कप्‍तान शेनवार्न ने कहा कि सौरव गांगुली घमंडी है, मैच में देरी से आए। उन्‍हें टॉस के लिए इंतजार कराया और स्मिथ के कैच को भी झूठा बताया।
इन सबसे उबर कर अपनी नजर कुल टैली पर पडी तो पता चला कि आईपीएल सीरिज शुरू होने से पहले तक सबसे कमजोर माने जाने वाली राजस्‍थान रॉयल्‍स की टीम अब सबसे धांसू बनकर उभरी है। शुरुआती एक मैच को छोडकर अब तक पांच मैचों में से चार मैच जीत चुकी है।
टीम की यह स्थिति देखकर अपन को स्‍प्राइट की वह टैगलाइन याद आ जाती है, जो उसके शुरुआती विज्ञापनों में आती थी। दिखावे पर न जाओ अपनी अक्‍ल लगाओ।

Sunday, March 23, 2008

मैं और ब्‍लॉगिंग का एक साल

मुझे ब्‍लॉगिंग करते हुए एक साल हो गए।
पहली पोस्‍ट बेशक हिंदी में नहीं में नहीं थी, कई दिन तक हिंदी लिखने का तरीका खोजता रहता, पहले यूनीनागरी और आखिरकार आईएमए से हिंदी लिखने लगा। पहली बार ऑनलाइन बिना सुमित स्क्रिप्‍टराइटर या किसी सॉफटवेयर से हिंदी लिखने पर इतनी खुशी हुई कि बयां नहीं की जा सकती।
इतनी खुशी तो तब भी नहीं हुई जब 31 दिसंबर 2007 को दैनिक हिंदुस्‍तान ने दुनिया को बदलने वाले दस साल में ब्‍लॉग को सबको अभिव्‍यक्ति का समान अवसर देने वाला सूचना का माध्‍यम बताते हुए, लिखा कि ब्‍लॉगिंग कुछ के लिए शुरुआत है, क्‍योंकि जिंदगी सिखाती है कुछ।
बीते साल भर में 65 पोस्‍ट लिख दीं। कुछ दिन बहलाने के लिए कुछ सूचनाएं इधर उधर करने के लिए। शुरुआत में सिर्फ मनोरंजन के लिए बस यूं ही ब्‍लॉग बना लिया, बाद में कई ऐसे लोगों से मिला, जिनसें बिना ब्‍लॉगिंग के मिलना असंभव था।
धीरे धीरे ब्‍लॉगिंग करने वालों का एक परिवार बन गया। जयपुर में एक ब्‍लॉगर्स मीट की। अपने ही समाचार पत्र के लिए ब्‍लॉगिंग पर एक लेख लिख मारा।
भाई लोगों ने सप्‍ताह का ब्‍लॉगर में इंटरव्‍यू ले लिया।
कविता से लेकर फिल्‍म तक, जहां जहां मन हुआ अपना लिखा और दिल को तसल्‍ली दी। कई बार अच्‍छे कमेंट और कॉम्‍पलिमेंट मिले, कई बार जानकारी पूरी रखने का संदेश और मार्गदर्शन। पर बस अब ब्‍लॉगिंग अपनी आदत में शुमार हो गई।
नेट पर बैठते ही पहले बस यूं ही जो मन हुआ खोलकर बैठ जाता। जरूरी नहीं हर बार काम की चीज होती, घंटों चैटिंग भी की। पर अब ये सब लगभग बंद हो गया है।
ब्‍लॉग पढने में ही दो घंटे तक गुजर जाते हैं।
बस अब यही कोशिश है कि इस अनियमित ब्‍लॉगिंग को धीरे धीरे विषय आधारित ब्‍लॉगिंग तक ले जाऊं। अब तक ज्‍यादातर ब्‍लॉग मैंने अपनी ही जिंदगी पर लिखे।
सभी वरिष्‍ठ चिटठाजनों का मार्गदर्शन मिलता रहेगा। वे लोग जो नियमित रूप से मेरी शुरुआत पढते हैं, फीडबैक मुझ तक पहुंचाते रहेंगे।
साल भर झेलने के लिए शुक्रिया

Wednesday, February 13, 2008

आज का युवा क्‍या करे, क्‍या न करे


आज का युवा दुराहे पर खडा है। उसके साथ बडी समस्‍या है कि अगर वो पुराने रीति रिवाज और नियमों में बंधा है तो उसे आउटडेटेड या कमजोर समझा जाता है और पढाई को छोड बाकी सारे काम करे, मौज मस्‍ती करे तो वह मेटोसेक्‍सुअल यूथ है। क्रिकेट नहीं देखे तो प्रॉब्‍लम, फिल्‍म के बारे में जानकारी न हो तो अपने ही दोस्‍तों के बीच हंसी का पात्र। गर्लफ्रेंड नहीं हो तो सोसायटी में इज्‍जत नहीं।

25 साल तक बेरोजगारी और पढाई के दौरान में पता नहीं वह क्‍या-क्‍या करता है। सिर्फ पेट के लिए यानी नौकरी के खातिर। उसके अलावा किसी की याद आती है तो बस लडकियां, क्रिकेट या फिल्‍में। अब किसके पास फुर्सत की वह प्रेम‍ दिवस यानी वेलेंटाइन डे को छोड प्रेमचंद की पूस की रात पढे या ओबामा की वोटिंग परसेंटेज पर दिमाग लगाए।
मसलन अपनी ही बात करुं, मैं भी युवा ही हूं। जिंदगी के 21 साल तक कोर्स की किताब या कॉम्‍पीटिशन की तैयारी के लिए कुछ एक दूसरी किताबों को छोड शायद ही कुछ और पढा हो। वो तो शुक्र था कि छठी क्‍लास से ही रेग्‍यूलर लाइब्रेरी जाता रहा। वर्ना पता चलता कि आज अपन भी बेरोजगारों की भीड में खडे हैं।
लाइब्रेरी में अखबार के बाद इंडिया टुडे, प्रतियोगिता दर्पण या विज्ञान प्रगति को छोड कुछ और नहीं पढता। कई बार याद है कि छोटे होने के नाते मुझसे बडे उम्र के लोग प्रतियोगिता दर्पण मांगकर बालहंस और सुमन सौरभ पढने की सलाह देते। हां बस कई बार चोरी छिपे गृहशोभा जरूर उठा लेता था ( बच्‍चों को गृहशोभा पढने से लाइब्रेरियन रोकता था)
पहली बार उपन्‍यास या कोई और किताब मैंने स्‍वतंत्र रूप से पत्रकारिता में आने के बाद एक वरिष्‍ठ साथी की राय पर सुरेद्र वर्मा की “मुझे चांद चाहिए” पढी। उसके बाद मुझे ऐसी धुन सवार हुई कि पत्रकारिता में शुरुआती दो तीन साल में 20 25 प्रमुख किताबें पढ डाली। अब हर साल बुक फेयर से न न करते भी दस बारह किताबें तो ले ही आता हूं। पर ये ब्‍लॉगिंग के चस्‍के ने चार घंटे तो नेट पर ही बैठने को मजबूर कर दिया।

खैर इन सबके बाद मैं देखता हूं तो लगता कि मेरे बाद पत्रकारिता में आने वाले या दूसरे युवा साथियों की हालत तो मुझसे भी ज्‍यादा खराब है। कई बार खुद को साइंस का स्‍टूडेंट मानकर सोचता हूं कि शायद मुझे हिंदी साहित्‍य की इतनी जानकारी नहीं है, तो चलेगा। पर शायद मेरा यह रवैया भी ठीक नहीं।
कई बार जब हिंदी साहित्‍य, संस्‍कृत या इतिहास से जुडा मामला खोजना होता है तो विकिपीडिया या गूगल ही आखिरी समझदार साथी होता है। मसलन अभी समस्‍या सामने आई कि हिंदी महीनों के हिसाब से कौनसी रितु कब आती है। कई लोगों से पूछा किसी को ठीक से जानकारी नहीं थी। वो तो भला हो विकिपीडिया का कि वहां सब कुछ है, वर्ना ये भी नहीं पता चलता कि बसंत पंचमी जरूर आ गई पर बसंत का मौसम तो मार्च अप्रैल में आएगा। इसलिए अब कई बार लगता है कि जो 21 साल तक पढा वो शायद कहीं काम नहीं आ रहा और यूं रस्‍ते चलते जो सबक सीखे थे वो व्‍यावहारिक जिंदगी में ज्‍यादा उपयोगी साबित हो रहे हैं।

Thursday, February 7, 2008

मोबाइल कं‍पनियों की एक्स्ट्रा इनकम के सोर्स

ये मोबाइल इतनी जल्‍दी लोकप्रिय हुआ है कि पूछिए मत। और ये मोबाइल बनाने वाली से ज्‍यादा इन सर्विस प्रावाइडर्स ने मोटा माल कमाया। एयरटेल से लेकर रिलायंस तक, यह बात सबको पता है। लेकिन आजकल इन कं‍पनियों ने ग्राहकों को चूना लगाने के लिए एक से एक स्‍कीम चला रखी हैं। या कहिए लूट मचा रखी है इन कंपनियों ने
अपन के पास टाटा इंडिकॉम का नंबर है। आपके पास भले ही किसी का नंबर हो पर ये जानकारी आपकी अर्थव्‍यवस्‍था में डाका पडने से रोक सकती है।
टाटा के फोन में 12900 नंबर टाटा की वायस स्‍टेशन का नंबर है और टाटावाले इस नंबर को हैंडसेट में एक नंबर पर फास्‍ट डायलिंग में सेट करके रखते हैं।
अभी अपन की जेब में पता नहीं कैसे मोबाइल का की-पेड खुला रह गया और करीब 13:48 मिनट तक फोन इस नंबर पर लगा रहा। अपन को यह बात अगले फोन बजने के बाद पता चली। तुरंत कस्‍टमर केयर पर फोन लगाया तो पता चला कि छह रुपए पचास पैसे प्रतिमिनट इस सुविधा का शुल्‍क है।
अपन के तो दिमाग की बत्‍ती गुल हो गई, यानी बैठे बिठाए सौ रुपए का चूना। इलाज पूछा तो पता चला कि अब 12977 पर फोन करके इसमें पासवर्ड डाला जा सकता है और इसे फास्‍ट डायलिंग से हटाया जा सकता है। अपन न तो तुरंत इस “असुविधा” को बंद करा दिया। अगर आपके पास भी फास्‍ट डायलिंग में ऐसा कोई नंबर है तो तुरंत हटा लें।

टाटा के फोन में 12900 नंबर टाटा की वायस स्‍टेशन का नंबर है, अगर आपके फोन में फास्‍ट डायलिंग में लगा है तो तुरंत हटा लें

मैंने यह बात अपने टाटा धारक एक दोस्‍त को बताई। उसने कहा हां यार, कई बार हो चुका है ऐसा। पर वह हाथोंहाथ अपने पिछला बिल देखने लगा तो उसे पता चला कि दिसंबर के बिल में उसके 62 मिनट एक साथ इसी नंबर पर लग गए, यानी 372 रुपए का नुकसान। ये हाल तो तब है, जब इस नंबर पर कॉल करने के बाद बार बार में की एंटरी करनी होती हैं, पता नहीं 62 मिनट फोन एक साथ चालू कैसे रह जाता है इस नंबर पर।
हां इसी तरह वोडाफोन के कई हैंडसेट में तो एक स्‍क्रीन सेवर ही बार बार में आ जाता है और गलती से एग्जिट होने की जगह ओके हो जाता है, तो इसी तरह साढे छह रुपए प्रतिमिनट वाली कॉल लग जाती है।

Wednesday, January 30, 2008

मैं और बापू – खलनायक से आइडियल तक


देश के साठ फीसदी युवाओं की तरह अपन भी बचपन से सुभाषचंद्र बोस के भक्‍त थे। और एक चीज अपन के दिमाग में साफ थी कि सुभाष बाबू की लोकप्रियता की राह में रोडे अटकाने वाले बापू यानी महात्‍मा गांधी ही थे। यह बात अपन के बालमन में शुरू से ही थी। सो अपन के खलनायकों की लिस्‍ट में बापू भी एक हुआ करते थे।
साइंस के स्‍टूडेंट रहे तो इतिहास से अपना ठीक से वास्‍ता नहीं पडा। बचपन में जो पढा वो पता नहीं रटा या समझा, ठीक से याद नहीं आता। पर मेरी मार्कशीट बताती है कि दसवीं की परीक्षा में हिंदी और इतिहास दो ही सब्‍जेक्‍ट थे, जिसने मुझे राजस्‍थान बोर्ड की परीक्षा में 75वीं रेंक पर पर ही रोक दिया। संघ से वास्‍ता रखने वाले कई दोस्‍त अपन के फ्रेंड सर्कल में थे तो इसका असर भी पडना था, यानी गांधीजी की और वाट लगनी स्‍वा‍भाविक थी।
पर बीएससी के बाद दो ऑप्‍शन थे या तो कैमेस्‍टी से एमएससी या देश के साठ फीसदी युवाओं की तरह कॉम्पिटीशन की तैयारी। कैमेस्‍टी में राजस्थान यूनिवर्सिटी का प्री टेस्‍ट पास किया। ए‍डमिशन की तैयारी थी कि मुझे लगने लगा कि यार साइंस के स्‍टूडेंट को इतिहास की नॉलेज होनी चाहिए। बिना इतिहास के भविष्‍य कैसा।
बस इसी उधेडबुन में कैमेस्‍टी की जगह राजस्‍थान यूनिवर्सिटी में एमए हिस्‍टी में एडमिशन ले लिया। अब शुरू हुआ अपन का इतिहास और बापू से रूबरू होने का समय।
एमए के दो वर्षों के दौरान मुझे पता चला कि गांधी वाकई बापू थे। मेरे कई भ्रम और पूर्वाग्रह खत्‍म हुए, आजादी के बारे में सुभाष बाबू के बारे में, उनसे मतभेद को लेकर।
कुल मिलाकर मैं एक लाइन में समझाने की कोशिश करुं तो मुझे समझ आया कि आजादी के लिए हजारों वीर सपूतों ने बलिदान दिया, संघर्ष किया। पर बापू ने स्‍वराज्‍य की अवधारणा को आमलोगों तक पहुंचाया और आजादी के इस आंदोलन से उनको जोडा। इससे पहले तक सिर्फ पडा लिखा तबका ही आजाद होने का सपना देखता था। यानी बिना बापू के आजादी सिर्फ कल्‍पना थी।
बापू को श्रद़धांजलि के साथ
एक आजाद भारतीय

Wednesday, January 23, 2008

एक बार मिलकर तो देखिए देवसाहब से


जयपुर साहित्‍य समारोह के पहले दिन बुधवार को फिल्‍म अभिनेता देव आनंद साहब आए। आफिस नहीं जाना था तो अपन भी डिग्‍गी पैलेस पहुंच गए। यहां देव साहब को अपनी आत्‍मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ के बारे में चेन्‍नई की नर्तकी और कंटरीज ऑफ द बॉडी की लेखिका तिशानी दोषी से बातचीत करनी थी।
चौरासी साल के देव साहब को नजदीक से देखकर मैंने पाया कि वो इतने डाउन टू अर्थ है, कि आप बॉलीवुड की चमक दमक और स्‍टारडम में जीने के बाद ऐसी उम्‍मीद नहीं कर सकते। वे चाहने वालों की इतनी इज्‍जत करते हैं कि आदमी को उन फिदा हुए बिना नहीं रह सकता। यूं समझ लीजिए कि वे एक ऐसे मोटिवेटर हैं, कि अगर आप घोर निराशा में हों तो बातचीत के बाद खुश होकर ही लौटेंगे। यानी जिंदगी को पॉजीटिवनेस की और ले जाएंगे।
पहले ही सवाल के जवाब में देव साहब ने कहा कि मैं लेखक नहीं हूं, यूं समझिए कि ओटोबायोग्राफी में जिंदगी का पैकअप किया है। इस किताब के बारे में एक और खास बात कि उन्‍होंने यह पूरी किताब का डाफट हाथ से लिखा गया, कम्‍प्‍यूटर की मदद से नहीं।
वे लडकियों में बेहद चर्चित रहे हैं तो उनके फैन्‍स और वहां आए लोगों में बडी संख्‍या उनकी थी,‍ जिन्‍हें जवानी के दिनों में देव साहब खूब भाते रहे होंगे।
बातचीत के दौरान ‘आई लव चेजिंग गर्ल्‍स’ कहने वाले देवसाहब से ओपन सेशन में यह सवाल भी कई बार पूछा गया कि आप पर लडकियां मरती थीं, आप खूबसूरती के सच्‍चे कद्रदान हैं। आपकी नजर में खूबसूरती क्‍या है।
देवानंद का कहना था कि जो दिल को भा जाए वही खूबसूरती है। लडकी के मामले में चाहे वो काली हो गोरी हो। जिंदगी के मायने में, काम के मामले में अलग अलग पैमाने हैं। वे इस मौके पर अपनी ही फिल्‍म गाइड का डायलॉग बोलना नहीं भूले।
जिंदगी एक ख्‍याल है
जैसे मौत एक ख्‍याल है ना सुख है न दुख है
न दीन है न दुनिया सिर्फ मैं, मैं और मैं
उनसे जब यह कहा गया कि आप लोगों के दिल में इस कदर बैठे हुए हैं कि चित्‍तौडगढ में तो फोर्ट देखने आए हर सैलानी को वहां खडा गाइड खुद को राजू गाइड ही बताता है। कभी चित्‍तौडगढ आइये, देवानंद ने कहा कि बुलाइये जरूर आऊंगा। बस कोई लेक्‍चर की उम्‍मीद मत कीजिएगा हां, अगर कुछ याद आ गया तो मुझे भगवान भी कोई काम करने से नहीं रोक सकता।
यही वो जिंदादिली थी, जिसके अपन कायल हो गए। वर्ना 84 साल का एक आदमी यह बोले कि मैं जिंदगी में किसी की परवाह नहीं करता, लोग तो कुछ न कुछ बोलेंगे ही। चिंता न कीजिए। एसी उम्‍मीद देव साहब को छोडकर किससे कर सकते हैं।
मैंने सवाल किया कि आपकी उम्र मेरे दादा के बराबर की है, फिर भी आप आज भी मुझसे ज्‍यादा यंग लगते हैं। आपकी यंगनेस का राज क्‍या है।
कॉम्‍पलीमेंट के लिए शुक्रिया कर हंसते हुए देव साहब बोले कि मैं पॉजीटिव सोचता हूं, दुनिया की चिंता नहीं करता। जो अच्‍छा लगता है वही करता हूं। वर्ना अब तक तो कई बार मर चुका होता। वे कहते हैं कि जिंदगी में अनुभव होते हैं, वे खराब भी हो सकते हैं और अच्‍छे भी। लेकिन आप खराब के साथ ज्‍यादा समय तक जी नहीं सकते। मैं झटकों (सेटबैक्‍स) को भूल जाता हूं, इसलिए हमेशा नया और तरोताजा रहता हूं।
देव साहब ने कहा कि आपका राजस्‍थान काफी खूबसूरत है विशेषकर सर्दी के मौसम में। उन्‍होंने कहा कि मुझे यहां कि खूबसूरत पगडियां, साडियां, लोग अच्‍छे लगते हैं। सर्दी के मौसम में तो मैं चाहता हूं कि यहीं रहूं।

इस सवाल पर कि अगर आप एक्‍टर, डायरेक्‍टर या लेखक नहीं होते तो क्‍या होते।
बोले बिना एक्टिंग के देवानंद हो ही नहीं सकता।

उन्‍होंने एक और बेहद रोचक बात बताई कि उनके घर और उनकी कंपनी नवकेतन में बहुत सारे लोग काम करते हैं। पर फोन वे खुद ही उठाते हैं। देव साहब बोलते हैं कि यह इसलिए जरूरी है कि मुझे भी तो पता चले कि कौन मुझसे बात करना चाहता है। एक और बात वे कहते हैं कि मैं कभी किसी को मिलने से मना नहीं करता। क्‍योंकि मैं कर ही नहीं सकता, क्‍योंकि उस पर मेरा कोई हक ही नहीं है।

देवसाहब ने इमरजेंसी के बाद फिल्‍म इंडस्‍टरी के लोगों के साथ मिलकर नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया नाम से एक पॉलिटिकल पार्टी बनाई। लेकिन वो कामयाब नहीं हो सकी। उनके राजनीति में सक्‍सेफुल नहीं होने के कारण पूछने पर उन्‍होंने कहा कि उस समय समय कम था, चार हफते बाद चुनाव थे। जिन लोगों को चुनाव में खडा होना था, वे पीछे हट गए। ज्‍यादातर सितारे चाहते थे कि वे मनोनीत होकर राज्‍यसभा में जाएं।

सबसे निजी बात, पूरा मामला तो अपन को पता नहीं पर कोई उषा चौपडा हैं, जिनकी खूबसूरती के देवसाहब लडकपन से कायल रहे हैं। लेकिन अफसोस कि उनकी यह चोपडा मेम कहां हैं, देवसाहब खुद भी नहीं जानते। वाजपेयी के साथ लाहौर गए तो भी उन्‍होंने उन्‍हें ढूंढने कि कोशिश की। वे कहते हैं कि आज भी लोग मुझे कही मिल जाते हैं तो उषा चोपडा के बारे में बताने की कोशिश करते हैं। हाल ही में गोवा फिल्‍म फेस्टिवल के दौरान देव साहब को इटली से आए एक दल ने भी उषा चोपडा को जानने की बात कही। अगर कोई जानता हो ऊषाजी को तो प्‍लीज अपन के देव साहब को जरूर बताइयेगा।
(तकनीकी कारणों से आज मोबाइल से फोटोग्राफस डाउनलोड नहीं किए जा सके, जल्‍द देख सकेंगे)

Saturday, January 5, 2008

इसलिए जरूरी है ब्‍लॉगिंग का एक रेफरेंस ब्‍लॉग

साइबर आसमां में हिंदी ब्‍लॉगों की उडान, लिखते समय मैंने बहुत सारे ब्‍लॉग फिर सर्च किए। कुल मिलाकर ये समझिए की मैंने लगभग हर उस ब्‍लॉग इवेंट को याद करने की कोशिश की जो इस बीते साल में हुई थी। अगर मुझे सिर्फ अपने लिए ही लिखना होता तो शायद मैं इतनी मेहनत नहीं करता पर मेरे एक सीनियर ने सिर्फ मेरा ब्‍लॉग देखकर साल भर की समीक्षा के लिए एडिट पेज पर चल रही श्रंखला के लिए युवा विशेष वाले पेज के लिए ब्‍लॉग जगत की समीक्षा के रूप में मुझे कुछ लिखने का काम सौंपा।

खबरें कई बार लिखीं पर एडिट पेज पर कुछ लिखना यह मेरे लिए पहली बार था। इसके लिए कई दिग्‍गज ब्‍लॉगर्स समीक्षा आदरणीय जीतूजी,मैथिलीजी,यशवंतजी और नीलिमा चौहान और कई मित्रों से संपर्क साधा। हां यशवंतजी और नीलिमाजी की ओर से जानकारी भी उपलब्‍ध कराई।

मैं चाहता हूं कि ब्‍लॉग खबरिया में सभी बडे ब्‍लॉगर्स और उनकी कहानी। ज्‍यादा नहीं तो कम से कम जो बडे अखबारों में कॉलम लिख रहे हैं या वेबदुनिया की ब्‍लॉग चर्चा में आ चुके हैं, ताकी हमारा अपना ब्‍लॉग जगत तेजी से आगे बढे जो लोग ब्‍लॉग के मामले में कम समझते हैं, जानकारी हासिल कर सकें।

लेकिन कुल मिलाकर मैंने महसूस किया की ब्‍लॉग जगत की अधिकृत जानकारी देने के लिए कोई मंच नहीं है। अगर आपको कोई आंकडा या अंदाजा चाहिए तो कैसे जुटाएंगे, यह बडी समस्‍या है। इसलिए मुझे यह आलेख सबमिट करने की आखिरी तारीख 30 दिसंबर तक मैं इस नतीजे पर पहुंच चुका था कि ब्‍लॉग की खबर रखने वाला भी एक ब्‍लॉग होना चाहिए। (हालांकि इस बीच बेनजीर भुटटो के निधन के कारण यह छपा जरूर 3 जनवरी को) मैंने एक ब्‍लॉग बनाया 'ब्‍लॉग खबरिया'(http://blogkhabaria.blogspot.com/), हालांकि अभी किसी एग्रीगेटर से अटैच नहीं होने के कारण यह अभी सभी को दिखाई नहीं दे पा रहा।
उम्‍मीद है आप सभी मेरी बात से सहमत होंगे और आपका आशीर्वाद मिलेगा।


बिल्‍कुल आपकी मदद ली गई रविजी
आदरणीय रविजी आप ब्‍लॉगिंग के द्रोणाचार्य हैं। मेरा जैसा नौसिखिया आप जैसे दिग्‍गजों के नाम सुनकर और सहायता से ही ब्‍लॉग की तरफ आकर्षित हुआ। साइबर आसमां में हिंदी ब्‍लॉगों की उडान आलेख आपसे प्रेरित है। बहुत लोगों से बातचीत या मेल के आदान प्रदान के अतिरिक्‍त मैंने दिलीप मंडल जी और आपके ब्‍लॉग को रेफरेंस की तरह इस्‍तेमाल किया। (मंडलजी के रिजोलुशन वाला हिस्‍सा संपादकजी की कैंची का शिकार हो गया।) जब ब्‍लॉगजगत की समीक्षा करनी थी तो बिना आपकी मदद के लिए यह कैसे संभव हो पाता। ये बात अलग है कि मैं आपाधापी में आपसे संपर्क नहीं कर पाया।

Saturday, December 29, 2007

बच के रहना इन रेडियो टैक्सियों से


बेमतलब की सलाह है। पर क्‍या करुं पूरा दिन और पैसे की बर्बादी की बाद सबक मिला है। सोचा आप से शेयर कर लूं, दुख हल्‍का हो जाएगा। इसलिए लिख रहा हूं। सीधे मुददे पर सर्दियों की छुटटी मनाने के लिए इनदिनों अपन की बुआ, भैया भाभी और बहन सब अपने ही साथ हैं। आफिस से छुटटी नहीं मिल रही लेकिन फिर भी सबको घुमाना तो जरूरी था।
सुबह जागा तब तक अपन को छोड बाकी सब लोग जाने को तैयार थे। जबरन उठाकर अपन को भी चलने के लिए कहने लगे। जयपुर के पास पदमपुरा जैन मंदिर जाना था, करीब 32 किमी है। अपन ने कहा कि बस से जाने में परेशानी होगी कोई कार हायर कर ली जाए। नेट ज्ञान काम आया तुरंत गूगल महाराज की शरण में गए और ढूंढ निकाला जयपुर में फोन पर टैक्‍सी मुहैया कराने वाले श्रीश्‍याम रेडियो टैक्‍सी का नंबर। फोन किया और बातचीत के बीस मिनट बाद टैक्‍सी दरवाजे पर। बस यहीं से शुरू हुई असली तकलीफ। गाडी में बैठते ही पता चला कि ये तो गैस से चलेगी। खैर तय हिसाब की जगह मीटर बीस रुपए पर और किमी .775 किमी। खैर थोडी दूर चले तो बुआ और उनके बच्‍चों ने फरमा दिया कि गैस की बहुत बदबू है और इसकी जगह ऑटो में चल चलेंगे। इसमें नहीं थोडी देर बाद सोने पर और सुहागा हुआ कोई वायरिंग जलने लगी। आधे रास्‍ते से पहले ही बुआ और बच्‍चों को आगे वाली सीट पर बिठाया और बाकी लोग जैसे तैसे गाडी के दोनों तरफ के शीशे खोलकर उस बदबू से मुकाबला करते हुए करीब 40 मिनट में मंदिरजी के सामने तक पहुंच गए।
उतरते समय नजर मीटर पर थी, ताकी कोई घपला न हो।
अरे ये क्‍या डिग्‍गी में रखा बैग गायब, डाइवर को पूछा तो जवाब, अपन को पूछ के रखा क्‍या आपने। आपके चक्‍कर में मेरी रिजाई भी रास्‍ते में गिर गई। अपन ने तुरंत घरवालों से पूछा कि बैग में था क्‍या, सब लेडिज पर्स और महत्‍वपूर्ण सामान तो सुरक्षित हैं न। बोले कुछ किलो पूजन सामग्री कुछ छोटे मोटे कपडे, शॉल, नाश्‍ता यही कुछ था।
तुरंत गाडीवाले के ऑफिस में फोन लगाया। वहां तीन बार फोन इधर से उधर टांसफर हुआ और मालिक साहब लाइन पर आए, अपन ने बोला कि बॉस गाडी से बैग गिर गया। कैसी खटारा गाडी है जिसकी डिग्‍गी तक ठीक नहीं है।
साहब तो अपन पर ही चढ गए, बोले डाइवर तो कह रहा है कि सामान उससे पूछ कर नहीं रखा। और फिर वे बोले हो जाता है साहब कई बार स्‍पीड ब्रेकर पर खुल जाती है डिग्‍गी, अब कोई बात नहीं, जाने दो। अपन ने चार भाषण मारे और दिमाग खराब होने के बाद फोन रख दिया।
सारी पूजन सामग्री बैग में ही थी सो पूजन सामग्री फिर वहीं दुकान से खरीदी और मंदिर में चले गए।
लौटकर गाडी में बैठे तो अरे ये क्‍या मीटर तो पहले से पचास रुपए से भी ज्‍यादा आगे से शुरु हो रहा है। अपन ने बोला भाई ये क्‍या लूटमार है। डाइवर साहब बोले ये तो वेटिंग चार्ज है, अपन से रहा नहीं गया। मैंने कहा गजब है भाई आदमी गाडी कहीं लेकर जाएगा तो थोडी देर तो रुकेगा ही न। गाडी किमी सिस्‍टम पर है, इसका मतलब क्‍या इसे दौडाते ही रहें।
अपन ने फिर उसके मालिक को फोन लगाया, वे फरमाए कि ये तो पूरे जयपुर को पता है कि हम ये चार्ज करते हैं। मैंने कहा कि मेरी जब आपसे बात हुई तो आप सिर्फ इतना बोले कि पहले किमी के 20 रुपए और बाद में 8 रुपए किमी। बाकी तो बताया भी नहीं था, ज‍बकि मैंने पहले ही कह दिया था कि करीब 45 मिनट रुकेंगे।
वे बोले ये तो देना ही होगा, मैंने कहा अगर गाडी जाम में फंसती या रेलवे क्रासिंग पर अटकती तो क्‍या होता। बोले हां हां पैसे तो देने ही होंगे।
बस अपन से रहा नहीं गया, दो चार गरमागरम सुनाकर मैंने बोला कानून ज्‍यादा मत सिखा वर्ना मुझे गुस्‍सा आ जाएगा। इसके बाद अपन वहां बिल्‍कुल नहीं रुके और मैंने कहा कि बस चल अब बाकी जगह तेरी गाडी से नहीं जाएंगे। तू तो बस जयपुर पहुंचकर छोड दे हमें, वहां से आगे घूमने के लिए दूसरी गाडी कर लेंगे।

बस लौटते समय अपनी नजर पूरे रास्‍ते भर हर गाडी की डिग्‍गी पर ही रही। खैर करीब 22 किमी के सफर में अपन को ये राजस्‍थान रोडवेज की बस नजर आ ही गई, जो जनता का सामान इस खुली डिग्‍गी में भी ढोह रही थी।

सांगानेर में सांघीजी के मंदिर पहुंचकर हमने गाडी छोड दी। और अब शुरू हुई असल कहानी।
अपन ने कह दिया कि अब मैं फोन नहीं करुंगा, बात कर अपने मालिक को और बोल दे कि बैग और उसके सामान के पैसे दे तब ही गाडी का किराया मिलेगा।
बडी बहस के बाद डाइवर ने रेडियो सिस्‍टम से फोन करके अपने मोबाइल पर सेठजी से फोन कराया। अब वो साहब मानने को ही तैयार नहीं कि गाडी से सामान गिरा है।
बात बढती देख आसपास के लोग आ गए। कोई अपन को डाइवर को पीटने की सलाह दे और कोई पुलिस में जाने की। खैर मैंने उसके मालिक से कहा कि जो सैटलमेंट करना है करे, और अपन के दिन की बर्बादी बचाए।
अब वो साहब फरमाए कि अगर गाडी में गैस की बदबू आ रही थी तो बैठे ही क्‍यूं। आप तो अब बहानेबाजी कर रहे हैं। सामान भी पता नहीं रखा या नहीं।
अब दो ही विकल्‍प थे या तो मामला पुलिस में ले जाएं या पैसे देकर काम खत्‍म और जिंदगी का पक्‍का सबक।
खैर वह टोटल बिल से 50 रुपए कम करने को तैयार हो गया। अपन ने उसे आधे रास्‍ते से ही विदा किया और आगे से रेडियो टैक्‍सी से तौबा कर ली।

Monday, December 17, 2007

.... मैं अपना हिस्‍सा लेकर जा रहा हूं


भारतीय रेल को लगता है अपना स्‍लोगन बदलना पडेगा, क्‍यूंकि ‘भारतीय रेल आपकी संपत्ति है इसे सुरक्षित रखें’ के इस ध्‍येय वाक्‍य को लोगों ने कुछ ज्‍यादा ही अपना समझ लिया है। अभी 13 और 14 दिसंबर को ग्‍वालियर जाना हुआ। आते जाते दोनों समय का सफर जयपुर-ग्‍वालियर इंटरसिटी में काटा।
जयपुर लौटते समय डी 7 के नई स्‍टाइल के डब्‍बे में बैठने का सुख मिला। पर ये क्‍या, मैं टायलेट गया तो देखा कि लोग टायलेट की विंडो, टोंटी और कांच उतारकर ले गए। लगता है रेलवे के इस ध्‍येय वाक्‍य की लोगों ने दिल से इज्‍जत की और प्रॉपर्टी से अपना हिस्‍सा लेकर चले गए।

मुझसे रहा न गया मैंने टीसी से पूछा कि यह नया डिब्‍बा कितने दिन पहले लगाया है। बोले 10 से 12 दिन हुए है। मैंने कहा कि लोगों को सुंदरता पसंद नहीं है, टोंटी और शीशा तक खोल कर रह गए। उन्‍होंने कहा हां भाई भारत है, किराया दिया होगा तो ले गए वापस।

अब पता नहीं अपन भारतवासी कब सुधरेंगे। ज्ञानदत्‍तजी कुछ और किस्‍से सुना सकते हैं रेलवे के।

Tuesday, September 18, 2007

मैं क्रिकेट नहीं देखता


बस कहीं आप पहली लाइन से यह न समझें कि श्रीमान राजेंद्र यादव की मैं हंस नहीं पढता से यह हैडिंग चुराया गया है, माफ करें यह बात तो मैंने सपनों में भी नहीं सोची। वैसे मेरे साथी जानते हैं कि मैं कितना बडा चोर हूं।
पहले अमर उजाला की वेबसाइट में था तो इधर- उधर ताकझांक और जुगाड करने की आदत लग गई। उसके बाद मेरे इस हुनर का दुरुपयोग आज भी मेरे कई साथी करा ही लेते हैं।

क्षमा करें सीधे मुददे की बात आज जब महेंद्र सिंह घोनी को भारतीय क्रिकेट टीम का कप्‍तान बनने की खबर सुनी तो सोचा जिंदगी में पहली बार क्रिकेट पर ही कुछ लिखा जाए। वैसे सुबह उठते ही मुझे यकीन हो गया कि कप्‍तान तो धोनी ही बनेगा, क्‍यूंकि एनडीटीवी पर मुझे बहुत भरोसा है और सुबह मैंने एनडीटीवी डॉट कॉम पर खबर पढी कि धोनी के कप्‍तान बनने के आसार तो बस यकीं हो गया। क्‍यूंकि मेरे पत्रकारिता के छोटे से कार्यकाल का अनुभव है कि बीबीसी के बाद एनडीटीवी ही है, जो कच्‍ची खबर नहीं चलाता।
तो मैंने सोचा आज के युग में जनता को यह जानने का अधिकार है कि ऐसा आदमी भी है, जो क्रिकेट नहीं देखता। बात 2002 की है जब अमर उजाला डॉट कॉम में बतौर नाइट शिफ़ट के सबसे जूनियर खिलाडी मुझे बिजनेस के साथ खेल पेज की जिम्‍मेदारी दे दी गई। बस तब थोडे दिन को छोडकर मैंने कभी खेल की खबरों में खास दिलचस्‍पी नहीं ली।
मैं हमेशा से पॉलिटिकल खबरों को पसंद करने वाला हूं, और बीजेपी मेरी कमजोरी रही है। पर आजकल क्राइम की खबर एडिट करने में भी बेझिझक टांग फंसा देता हूं।

खैर मरने दीजिए ये सब, तो मेरी जिंदगी का छोटा सा अनुभव यह कहता है कि अगर आगे बढना है तो बस क्रिकेट से दूरी बना लीजिए। मैं आज जहां भी हूं बस इसी की वजह से, आपको क्लियर कर दूं। बचपन में मेरे सारे दोस्‍त क्रिकेट में दिमाग लगाते सिवाए मेरे । (कोई यह बात पढ रहा हो उस जमाने का साथी, तो माफ करना यह राज उस वक्‍त नहीं बताया जा सकता था) और आपको ये तो पता ही है कि कमबख्‍त कोई न कोई सीरिज तो होती ही फरवरी मार्च में ही है। जब भारत में बच्‍चों की पढाई के लिए सबसे मुफीद टाइम होता है।

मैं बचपन में कई बार तो यह सोचता था कि कहीं यह अमेरिका टाइप के किसी देश की साजिश तो नहीं कि भारत के बच्‍चों को मैच में उलझाये रखो और ये पढ लिख न पाएं ( शायद यह बात मेरे सातवी कक्षा में पढने के दौरान की है) । हालांकि मेरी यह गलतफहमी थोडे दिनों में ही दूर हो गई, जब मुझे पता चला कि अमेरिका तो खुद ही क्रिकेट जैसा टाइम बिगाडू खेल नहीं खेलता।

हां तो अब आप कहेंगे कि काम की बात तो कोई की नहीं अभी तक। तो सुनिए अब अगर टवंटी टवंटी को छोड दिया जाए तो क्‍या आपको नहीं लगता कि क्रिकेट में जबरदस्‍ती ही जरूरत से ज्‍यादा टाइम खराब हो जाता है। पूरा देश काम धाम चौपट करके लगा रहता है मैच देखने में। मैच में अगर जीते तो खिलाडियों की तारीफ शुरू और हार गए तो पहली त्‍वरित टिप्‍पणी साला मूड खराब कर दिया:::: खेलना ही नहीं आता, फलां को वन डाउन भेज दिया, आखिरी ओवर उसको दे दिया जबकि लास्‍ट ओवर्स में पिछले ही मैच में पिटा था।
और गलती से जीत गए तो दस बीस रुपए के पटाखे फोडेंगे। थोडे कंजूस हैं तो अखबार में मजे ले लेकर दो बार मैच की खबर पढेंगे या टीवी पर हाइलाइट देखेंगे या उनके रिकार्ड की तस्‍दीक करेंगे, किसके आसपास का रिकार्ड अब टूटने वाला है यह जानने का जुगाड करेंगे।

अब आप मुझे बताइये पैसा मिला सचिन, सौरव, धोनी:::::::::::: और लाडले इरफान को और आपका क्‍या, सिवाए टाइम खोटी होने के।

हां, तो मैं कह रहा था कि सारे दोस्‍त क्रिकेट देखते और मैं बस उनकी बातचीत झेलने के लिए सिर्फ स्‍कोर बोर्ड। गर्मियों की छुटटी में ज्‍यादा हुआ तो हाइलाइट। इससे ज्‍यादा तो मैं झेल ही नहीं सकता।
बस एक बार मैच कैसा होता है इसलिए 31 अकटूबर 2005 को इंटरनेशनल मैच देखा लाइव वो भी बिना पैसे खर्च किए एसएमएस स्‍टेडियम जयपुर में। और गलती से वो भी इतना यादगार बन गया कि धोनी स्‍टार हो गया। (धोनी को तीसरे वनडे में तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी करने भेजा गया। उस समय भारत श्रीलंका के 300 रनों के लक्ष्य का पीछा कर रहा था। तेंडुलकर का विकेट गिर चुका था, इसके बाद जो हुआ वह अपने आप में एक इतिहास है। धोनी ने वन डे इतिहास की सबसे बेहतरीन पारियों में से एक खेलते हुए 145 गेंदों पर 183 रनों की शानदार पारी खेली। बाद में इसे विस्डन ने उस साल की सबसे बेहतरीन पारियों में से एक बताया।) स्‍टेडियम धोनी भाई का धूम धडाका, धोनी धो डाला से गूंज गया और मैंने खूब टाइम पास किया। अब लगे हाथ इसकी कहानी भी सुन लीजिए कि मैं कैसे पहुंच गया मैच देखने। लालकोठी में ही रहता था रात को आफिस से आकर सो गया, पर सोते सोते याद आया कि सारा शहर कह रहा है मैच के टिकट नहीं मिल रहे, कोई फ्री का पास जुगाड दे। कई लोग पत्रकार होने के नाते मुझसे भी मांग चुके थे, पर मैंने बला टालने के लिए वही अपना पुराना डायलॉग मार दिया, बॉस मैं यहीं थोडा पढा लिखा दिखता हूं आफिस में अपनी बिलकुल नहीं चलती। पर रात को सोते सोते मैंने सोचा यार पता नहीं अगली बार जयपुर में कब मैच हों, अपन भी लगे हाथ गंगा स्‍नान कर लें।
बस रात को सोते सोते दो चार को फोन किया। पता चला कि टिकट नहीं मिलेंगे। मैं यह खबर सुनकर सो गया, पर सुबह उनमें से ही किसी का फोन आया कि यार वीवीआईपी तो नहीं मिल पाएंगे, अगर जाना है तो पांच हजार वाला एक टिकट है, सुबह ले लेना।

बस मैं सुबह साढे आठ जगा और पहुंच गया मैच देखने, पूरा दिन
खराब किया और पर बस यह खुशनसीबी थी बस धोनी स्‍टार क्रिकेटर बन गया और शानदार बालों का मालिक लाइमलाइट में आ गया और मैं शाम को आफिस भी पहुंच गया, जरा देर हुई पर मैनेज हो गया।

अब मैं सोचता हूं कि जिंदगी में कोई अनुभव बेकार नहीं जाता, अगर उस दिन में मैच देखने नहीं गया होता तो क्रिकेट पर इतनी बकवास मैं किस मुंह से करता !
शुक्रिया दोस्‍तों