Wednesday, January 30, 2008

मैं और बापू – खलनायक से आइडियल तक


देश के साठ फीसदी युवाओं की तरह अपन भी बचपन से सुभाषचंद्र बोस के भक्‍त थे। और एक चीज अपन के दिमाग में साफ थी कि सुभाष बाबू की लोकप्रियता की राह में रोडे अटकाने वाले बापू यानी महात्‍मा गांधी ही थे। यह बात अपन के बालमन में शुरू से ही थी। सो अपन के खलनायकों की लिस्‍ट में बापू भी एक हुआ करते थे।
साइंस के स्‍टूडेंट रहे तो इतिहास से अपना ठीक से वास्‍ता नहीं पडा। बचपन में जो पढा वो पता नहीं रटा या समझा, ठीक से याद नहीं आता। पर मेरी मार्कशीट बताती है कि दसवीं की परीक्षा में हिंदी और इतिहास दो ही सब्‍जेक्‍ट थे, जिसने मुझे राजस्‍थान बोर्ड की परीक्षा में 75वीं रेंक पर पर ही रोक दिया। संघ से वास्‍ता रखने वाले कई दोस्‍त अपन के फ्रेंड सर्कल में थे तो इसका असर भी पडना था, यानी गांधीजी की और वाट लगनी स्‍वा‍भाविक थी।
पर बीएससी के बाद दो ऑप्‍शन थे या तो कैमेस्‍टी से एमएससी या देश के साठ फीसदी युवाओं की तरह कॉम्पिटीशन की तैयारी। कैमेस्‍टी में राजस्थान यूनिवर्सिटी का प्री टेस्‍ट पास किया। ए‍डमिशन की तैयारी थी कि मुझे लगने लगा कि यार साइंस के स्‍टूडेंट को इतिहास की नॉलेज होनी चाहिए। बिना इतिहास के भविष्‍य कैसा।
बस इसी उधेडबुन में कैमेस्‍टी की जगह राजस्‍थान यूनिवर्सिटी में एमए हिस्‍टी में एडमिशन ले लिया। अब शुरू हुआ अपन का इतिहास और बापू से रूबरू होने का समय।
एमए के दो वर्षों के दौरान मुझे पता चला कि गांधी वाकई बापू थे। मेरे कई भ्रम और पूर्वाग्रह खत्‍म हुए, आजादी के बारे में सुभाष बाबू के बारे में, उनसे मतभेद को लेकर।
कुल मिलाकर मैं एक लाइन में समझाने की कोशिश करुं तो मुझे समझ आया कि आजादी के लिए हजारों वीर सपूतों ने बलिदान दिया, संघर्ष किया। पर बापू ने स्‍वराज्‍य की अवधारणा को आमलोगों तक पहुंचाया और आजादी के इस आंदोलन से उनको जोडा। इससे पहले तक सिर्फ पडा लिखा तबका ही आजाद होने का सपना देखता था। यानी बिना बापू के आजादी सिर्फ कल्‍पना थी।
बापू को श्रद़धांजलि के साथ
एक आजाद भारतीय

Friday, January 25, 2008

क्‍या एक अरब में से कोई भारत रत्‍न लायक नहीं


भारत रत्‍न को लेकर एक महीने तक नेताओं और दावेदारों में बहस चली। आखिर ये 26 जनवरी आ गई और अपन को पता चला कि एक अरब से ज्‍यादा की आबादी में कोई भी आदमी इस लायक नहीं है, जो सोनिया माई की नजर में भारत रत्‍न का हकदार हो। जब नेताओं के अलावा या अपनी पसंद के नेताओं के अलावा किसी को देना ही नहीं है तो इस पुरस्‍कार को बंद क्‍यों नहीं कर देते। यह लगातार सातवां साल है जब किसी शख्सियत को देश के इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए नहीं चुना गया। मुझे तो लगता है सोनियाजी को मिलने के बाद ही यह पुरस्‍कार अब फिर आमलोगों को मिलना शुरु होगा।
आखिरी बार 2001 में शहनाई के शहंशाह उस्‍ताद बिस्मिला खां साहब को यह सम्‍मान दिया गया। क्या इसके बाद देश को ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला, जिसे भारत रत्न दिया जा सके ?
सात साल में एक भी व्यक्ति को भारत रत्न न देना हैरान करता है। अपन का कहना यह नहीं है कि जबरदस्‍ती दिया जाए, पर एक अरब की आबादी में इतना बडा प्रशासनिक अमला और सरकार मिलकर ऐसे आदमी को नहीं ढूंढ सकी, जो कलाम साहब की तरह भारत रत्‍न का सही हकदार हो।
इस साल विवाद हुआ तो पता चला कि इसके लिए कोई कमेटी होती है, जो भारत रत्‍न और पदम सम्‍मानों का निर्णय करती है। अब तो जनता को पता चलना चाहिए कि इस समिति में कौन कौन काबिल लोग हैं।
वैसे भारत रत्‍नों के इतिहास को देखें तो प्रधानमंत्री या राष्‍टपति को छोडकर भारत रत्‍न पाने वालों के ज्‍यादा नाम हैं। चालीस भारत रत्‍नों में से 20 तो राजनेता रहे हैं, जिनमें भी ज्‍यादातर पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व राष्‍टपति हैं। बचे हुए लोगों में से फ्रीडम फाइटर और इक्‍का दुक्‍का वैज्ञानिक हैं। मैं यूं राज्‍यवार तो नहीं मांगता पर क्‍या अपन के राजस्‍थान में तो आजतक ऐसा कोई आदमी पैदा नहीं हुआ जिसे भारत रत्‍न दिया जा सकता था।

क्‍या टीवी पत्रकारों का ही योगदान है ?
हो सकता है कि अपन गलत लिख रहे हैं पर क्‍या आजकल सरकार को टीवी पर दिखाई देने वाले लोग ही पत्रकार दिखते हैं, या सिर्फ चुनाव पूर्व इन तीन बडे लोगों को लॉलीपॉप। क्‍या समाचार पत्रों में काम करने वालों का सामाजिक जीवन में कोई योगदान नहीं है। पदम श्री की लिस्‍ट में ही तीन टीवी पत्रकार है। मैं यह नहीं कहता कि बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई और विनोद दुआ को पदम पुरस्‍कार नहीं मिलने चाहिए। ये हमारे अग्रज हैं, इन्‍होंने पत्रकारिता को नई दिशा दी है, इन जैसे लोगों की वजह से लोग पत्रकारों का सम्‍मान करते हैं। मैं तो कहता हूं कि हमारे ब्‍लागर पत्रकार मित्र रवीशजी को भारत रत्‍न मिले, लेकिन प्रिंट के लोग भी सम्‍मान के हकदार हैं। पर लगता है आजकल सिर्फ टीवी से ही लोगों का ध्‍यान नहीं हटता। तो अखबार में बाईलाइन पर किसका ध्‍यान पडता होगा।


इस साल की सूची

पद्म विभूषण
प्रणव मुखर्जी - सोशल सर्विस
सचिन रमेश तेंदुलकर - खेल
आशा भोंसले - कला
रतन नवल टाटा - व्यापार एवं उद्योग
ई श्रीधरन - विज्ञान एवं इंजीनियरी
राजेन्द्र कुमार पचौरी - विज्ञान एवं इंजीनियरी
एडमंड हिलेरी ( मरणोपरांत) - खेल
विश्वनाथ आनंद - खेल
जस्टिस ए . एस . आनंद - सोशल सर्विस
पी एन . धर - सोशल सर्विस
लक्ष्मी नारायण मित्तल - व्यापार एवं उद्योग
एन . आर . नारायणमूर्ति - व्यापार एवं उद्योग
पी . आर . एस . ओबराय - व्यापार एवं उद्योग

पद्म भूषण
सुनीता विलियम्स - विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी
जसदेव सिंह - कमेंट्री और प्रसारण
लॉर्ड मेघनाद देसाई - जनसेवा
उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर - कला
अमरनाथ सहगल ( मरणोपरांत )- कला
उस्ताद असद अली खान - कला
पी . सुशीला - कला
सुशील कुमार सक्सेना - कला
चंद्रशेखर दासगुप्त - लोकसेवा
के . पद्मनाभैया - लोकसेवा
वी . रामचंद्रन - लोकसेवा
बृजेन्द्र नाथ गोस्वामी - साहित्य एवं शिक्षा
श्रीलाल शुक्ल - साहित्य एवं शिक्षा
जी . शियांलिन - साहित्य एवं शिक्षा
कौशिक बसु - साहित्य एवं शिक्षा
पद्मा देसाई - साहित्य एवं शिक्षा
रवीन्द्र केलेकर - साहित्य एवं शिक्षा
श्याम चोना - साहित्य एवं शिक्षा
श्रीनिवास एस . आर . वर्धन - साहित्य एवं शिक्षा
पी . के . ओमेन - साहित्य एवं शिक्षा
जगजीत सिंह चोपड़ा - चिकित्सा
निर्मल कुमार गांगुली - चिकित्सा
मियां बशीर अहमद - जनसेवा
वाई . एम . वोरोनसो ( मरणोपरांत )- जनसेवा
आशीष दत्ता - विज्ञान एवं इंजीनियरी
सुखदेव - विज्ञान एवं इंजीनियरी
वसंत गोवारिकर - विज्ञान एवं इंजीनियरी
डी . आर . मेहता - समाज सेवा
डोमिनिक लेपियरे - समाज सेवा
इंद्रजीत कौर - समाज सेवा
सुरेश कुमार नेवोटिया - व्यापार एवं उद्योग
बाबा नीलकंठ कल्याणी - व्यापार एवं उद्योग
के . वी . कामथ - व्यापार एवं उद्योग
शिव नाडर - व्यापार एवं उद्योग
विक्रम पंडित - व्यापार एवं उद्योग

पद्मश्री
माधुरी दीक्षित - कला
हंसराज हंस - कला
टॉम ऑल्टर - कला
बरखा दत्त - पत्रकारिता
राजदीप सरदेसाई - पत्रकारिता
विनोद दुआ - पत्रकारिता
गंगाधर प्रधान - कला
गेन्नादी मिखाइलोविच पेचिनेकोव - कला
पंडित गोकुलोत्सवजी महाराज - कला
हेलन गिरी - कला
जतिन गोस्वामी - कला
जवाहर बट्टल - कला
जॉन मार्टिल नेल्सन - कला
जोनालागड्डा गुड्प्पा चेट्टी - कला
केकु एम . गांधी - कला
मंगला प्रसाद मोहंती - कला
मनोज नाइट श्यामलन - कला
मिनाक्षी चितरंजन - कला
मूझीकुल्लम कोचुकुट्टम चकयार - कला
पी . के . नारायणन नाम्बियार - कला
प्रताप पवार - कला
सावित्री हेसनम - कला
सेंटियल टी . यांगर - कला
सिरकाझी जी . सिवाचिदम्बरम - कला
येल्ला वेंकटेश्वर राव - कला
अमिताभ मट्टू - साहित्य एवं शिक्षा
बी . शिवनाथी अदिथन - साहित्य एवं शिक्षा
भोलाभाई पटेल - साहित्य एवं शिक्षा
बीना अग्रवाल - साहित्य एवं शिक्षा
के . एस . निसार अहमद - साहित्य एवं शिक्षा
एम . लीलावती - साहित्य एवं शिक्षा
निरुपम वाजपेयी - साहित्य एवं शिक्षा
श्रीनिवास उद्गाटा - साहित्य एवं शिक्षा
सुखदेव थोराट - साहित्य एवं शिक्षा
सूर्यकांता हजारिका - साहित्य एवं शिक्षा
वेल्यानी अर्जुनन - साहित्य एवं शिक्षा
मोहम्मद युसूफ ताइंग - साहित्य एवं शिक्षा
कलीमुल्ला खान - आम्र पौधरोपण
बाइचुंग भूटिया - खेल
बुला चौधरी चक्रवर्ती - खेल
ए . जयंत कुमार सिंह - चिकित्सा
अर्जुनन राजशेखरन - चिकित्सा
सी . यू . वेलमुरुगेन्दन - चिकित्सा
दीपक सहगल - चिकित्सा
दिनेश के . भार्गव - चिकित्सा
इंदुभूषण सिन्हा - चिकित्सा
केईकी आर . मेहता - चिकित्सा
मालविका सब्बरवाल - चिकित्सा
मोहनचंद्र पंत - चिकित्सा
राकेश कुमार जैन - चिकित्सा
रमन कपूर - चिकित्सा
रंधीर सूद - चिकित्सा
श्याम नारायण आर्य - चिकित्सा
सुरेन्द्र सिंह यादव - चिकित्सा
तात्या राव पुंडलिका राव लाहने - चिकित्सा
टोनी फर्नांडिस - चिकित्सा
कोलेट माथुर - जनसेवा
भंवरलाल हीरालाल जैन - विज्ञान एवं इंजीनियरी
जोजफ एल . हलसे - विज्ञान एवं इंजीनियरी
कस्तूरी लाल चोपड़ा - विज्ञान एवं इंजीनियरी
संत सिंह वीरमाणी - विज्ञान एवं इंजीनियरी
कैलाश चंद्र अग्रवाल - जनसेवा
करुणा मैरी बरगांजा - समाजसेवा
डॉ . क्षमा मैत्रेय - समाजसेवा
डॉ . कुटिकुपल्ला सूर्यराव - समाजसेवा
मदनमोहन सब्बरवाल - समाजसेवा
डॉ . शीला भर्थाकुर - समाजसेवा
वी . आर . गौरीशंकर - समाजसेवा
विक्रमजीत सिंह साहनी - समाजसेवा
युसुफ अली एम . अब्दुलकादिर - समाजसेवा
अमित मित्र - व्यापार एवं उद्योग
इस पोस्‍ट का उददेश्‍य किसी की भावना को आहत करने का नहीं है। वैसे अपन तो ग्‍लोबल हैं, खुद को भारत रत्‍न लायक नहीं मानता :)

क्‍या कहूं यार


अचानक चार दिन में ही बदल गई दुनिया मेरी
जिस पर था सबसे जादा यकीं, वो ही सबसे दूर हो गई

पता नहीं क्‍या चाहती है मुझसे, मेरा भला या बुरा
बस किसी के लिए मेरा प्‍यार कुर्बान कर रही है

सोचता हूं बद़दुआ दूं उसको, पर नहीं दूंगा कभी
क्‍यूंकि प्‍यार करता हूं उससे, बुरा नहीं चाहता उसका

बस इसीलिए जाने दे रहा हूं उसे, कि शायद
मुझसे ज्‍यादा कोई और है, जो खुश रख पाएगा उसे

हो सके तो कभी समझ में आ जाए उसे कभी
मैं उतना बुरा भी नहीं था, जितना उसने समझ लिया

वादा किया था तो निभाकर रहता मैं
वो नहीं जो बीच रास्‍ते से चला जाता

खैर बस यही चाहता हूं, वो खुश रहे जहां भी जाएं
क्‍यूंकि प्‍यार करता हूं उससे, बुरा नहीं चाहता उसका

(डिसक्‍लेमर : एक दोस्‍त ने दिल टूटने पर अपन से शेयर की है। इस कविता से अपना कोई लेना देना नहीं है)

Wednesday, January 23, 2008

एक बार मिलकर तो देखिए देवसाहब से


जयपुर साहित्‍य समारोह के पहले दिन बुधवार को फिल्‍म अभिनेता देव आनंद साहब आए। आफिस नहीं जाना था तो अपन भी डिग्‍गी पैलेस पहुंच गए। यहां देव साहब को अपनी आत्‍मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ के बारे में चेन्‍नई की नर्तकी और कंटरीज ऑफ द बॉडी की लेखिका तिशानी दोषी से बातचीत करनी थी।
चौरासी साल के देव साहब को नजदीक से देखकर मैंने पाया कि वो इतने डाउन टू अर्थ है, कि आप बॉलीवुड की चमक दमक और स्‍टारडम में जीने के बाद ऐसी उम्‍मीद नहीं कर सकते। वे चाहने वालों की इतनी इज्‍जत करते हैं कि आदमी को उन फिदा हुए बिना नहीं रह सकता। यूं समझ लीजिए कि वे एक ऐसे मोटिवेटर हैं, कि अगर आप घोर निराशा में हों तो बातचीत के बाद खुश होकर ही लौटेंगे। यानी जिंदगी को पॉजीटिवनेस की और ले जाएंगे।
पहले ही सवाल के जवाब में देव साहब ने कहा कि मैं लेखक नहीं हूं, यूं समझिए कि ओटोबायोग्राफी में जिंदगी का पैकअप किया है। इस किताब के बारे में एक और खास बात कि उन्‍होंने यह पूरी किताब का डाफट हाथ से लिखा गया, कम्‍प्‍यूटर की मदद से नहीं।
वे लडकियों में बेहद चर्चित रहे हैं तो उनके फैन्‍स और वहां आए लोगों में बडी संख्‍या उनकी थी,‍ जिन्‍हें जवानी के दिनों में देव साहब खूब भाते रहे होंगे।
बातचीत के दौरान ‘आई लव चेजिंग गर्ल्‍स’ कहने वाले देवसाहब से ओपन सेशन में यह सवाल भी कई बार पूछा गया कि आप पर लडकियां मरती थीं, आप खूबसूरती के सच्‍चे कद्रदान हैं। आपकी नजर में खूबसूरती क्‍या है।
देवानंद का कहना था कि जो दिल को भा जाए वही खूबसूरती है। लडकी के मामले में चाहे वो काली हो गोरी हो। जिंदगी के मायने में, काम के मामले में अलग अलग पैमाने हैं। वे इस मौके पर अपनी ही फिल्‍म गाइड का डायलॉग बोलना नहीं भूले।
जिंदगी एक ख्‍याल है
जैसे मौत एक ख्‍याल है ना सुख है न दुख है
न दीन है न दुनिया सिर्फ मैं, मैं और मैं
उनसे जब यह कहा गया कि आप लोगों के दिल में इस कदर बैठे हुए हैं कि चित्‍तौडगढ में तो फोर्ट देखने आए हर सैलानी को वहां खडा गाइड खुद को राजू गाइड ही बताता है। कभी चित्‍तौडगढ आइये, देवानंद ने कहा कि बुलाइये जरूर आऊंगा। बस कोई लेक्‍चर की उम्‍मीद मत कीजिएगा हां, अगर कुछ याद आ गया तो मुझे भगवान भी कोई काम करने से नहीं रोक सकता।
यही वो जिंदादिली थी, जिसके अपन कायल हो गए। वर्ना 84 साल का एक आदमी यह बोले कि मैं जिंदगी में किसी की परवाह नहीं करता, लोग तो कुछ न कुछ बोलेंगे ही। चिंता न कीजिए। एसी उम्‍मीद देव साहब को छोडकर किससे कर सकते हैं।
मैंने सवाल किया कि आपकी उम्र मेरे दादा के बराबर की है, फिर भी आप आज भी मुझसे ज्‍यादा यंग लगते हैं। आपकी यंगनेस का राज क्‍या है।
कॉम्‍पलीमेंट के लिए शुक्रिया कर हंसते हुए देव साहब बोले कि मैं पॉजीटिव सोचता हूं, दुनिया की चिंता नहीं करता। जो अच्‍छा लगता है वही करता हूं। वर्ना अब तक तो कई बार मर चुका होता। वे कहते हैं कि जिंदगी में अनुभव होते हैं, वे खराब भी हो सकते हैं और अच्‍छे भी। लेकिन आप खराब के साथ ज्‍यादा समय तक जी नहीं सकते। मैं झटकों (सेटबैक्‍स) को भूल जाता हूं, इसलिए हमेशा नया और तरोताजा रहता हूं।
देव साहब ने कहा कि आपका राजस्‍थान काफी खूबसूरत है विशेषकर सर्दी के मौसम में। उन्‍होंने कहा कि मुझे यहां कि खूबसूरत पगडियां, साडियां, लोग अच्‍छे लगते हैं। सर्दी के मौसम में तो मैं चाहता हूं कि यहीं रहूं।

इस सवाल पर कि अगर आप एक्‍टर, डायरेक्‍टर या लेखक नहीं होते तो क्‍या होते।
बोले बिना एक्टिंग के देवानंद हो ही नहीं सकता।

उन्‍होंने एक और बेहद रोचक बात बताई कि उनके घर और उनकी कंपनी नवकेतन में बहुत सारे लोग काम करते हैं। पर फोन वे खुद ही उठाते हैं। देव साहब बोलते हैं कि यह इसलिए जरूरी है कि मुझे भी तो पता चले कि कौन मुझसे बात करना चाहता है। एक और बात वे कहते हैं कि मैं कभी किसी को मिलने से मना नहीं करता। क्‍योंकि मैं कर ही नहीं सकता, क्‍योंकि उस पर मेरा कोई हक ही नहीं है।

देवसाहब ने इमरजेंसी के बाद फिल्‍म इंडस्‍टरी के लोगों के साथ मिलकर नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया नाम से एक पॉलिटिकल पार्टी बनाई। लेकिन वो कामयाब नहीं हो सकी। उनके राजनीति में सक्‍सेफुल नहीं होने के कारण पूछने पर उन्‍होंने कहा कि उस समय समय कम था, चार हफते बाद चुनाव थे। जिन लोगों को चुनाव में खडा होना था, वे पीछे हट गए। ज्‍यादातर सितारे चाहते थे कि वे मनोनीत होकर राज्‍यसभा में जाएं।

सबसे निजी बात, पूरा मामला तो अपन को पता नहीं पर कोई उषा चौपडा हैं, जिनकी खूबसूरती के देवसाहब लडकपन से कायल रहे हैं। लेकिन अफसोस कि उनकी यह चोपडा मेम कहां हैं, देवसाहब खुद भी नहीं जानते। वाजपेयी के साथ लाहौर गए तो भी उन्‍होंने उन्‍हें ढूंढने कि कोशिश की। वे कहते हैं कि आज भी लोग मुझे कही मिल जाते हैं तो उषा चोपडा के बारे में बताने की कोशिश करते हैं। हाल ही में गोवा फिल्‍म फेस्टिवल के दौरान देव साहब को इटली से आए एक दल ने भी उषा चोपडा को जानने की बात कही। अगर कोई जानता हो ऊषाजी को तो प्‍लीज अपन के देव साहब को जरूर बताइयेगा।
(तकनीकी कारणों से आज मोबाइल से फोटोग्राफस डाउनलोड नहीं किए जा सके, जल्‍द देख सकेंगे)

आपकी वजह से मेरी तो जिंदगी ही बर्बाद हो जाएगी


सोमवार की सुबह करीब साढे नौ बजे मोबाइल पर एक फोन आया। अपन बुआ के घर दो दिन की छुटटी मना रहे थे। नंबर अननोन था, फोन उठाते ही लडकी बोली, हलो हलो। और शुरू हो गई उनकी बकवास। संभलने का तो मौका ही नहीं था। बस अपन तो सोकर उठे ही थे तब। उन्‍होंने फरमाया, आप मुझे इस नंबर पर फोन क्‍यूं करते हैं, मैसेज क्‍यूं करते हैं। अपन ने कहा बहनजी शायद गलतफहमी हो गई है, अपन तो आपको जानते ही नहीं।
वो बोलीं, अगर मेरे भाई को पता चल गया तो आपकी वजह से मेरा घर से निकलना बंद हो जाएगा, मेरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। आप मुझे एसएमएस क्‍यूं करते हैं। जब तक मैं कुछ जवाब देता वो बोलीं, लो भैया आ गए और तुरंत सफाई पेश करते हुए कि भैया ये लडका मुझे परेशान करता है, बात करो इससे।
बस अब क्‍या था मुझे गुस्‍सा आ गया और उसे गालियां सुनाना शुरू किया ( गाली बोले तो तेज आवाज में चिल्‍लाना) । इतने में ही अवाज सुनकर फूफाजी बोले लडकी है, धीरे तो बात करो। उन्‍हें लग रहा था कि शायद मेरी ही गलती है। मैंने कहा आप एक मिनट रुको में इसे सुधारता हूं, पता नहीं कहां कि बिगडी शहजादी है।
मैंने कहा कि मैं क्‍या तुझसे डरता हूं, अपना नाम बताते हुए कहा कि तेरे भाई क्‍या बाप से बात करा, जब किया ही नहीं फोन तो क्‍यूं सुनू तेरी। उन्‍हें बता देता हूं कि मैं कौन हूं और आपकी बेटी जबरदस्‍ती अपन के पीछे पडी है।
मुझे गालियां देता देख सामने वाला लडका भी पहले तो आक्रामक हुआ पर अचानक मुझे लगने लगा कि यह मजाक भी हो सकता है।
इतने में ही दो बार और तेजी से क्‍या बोला कि आफिस में ही अपन के साथी सीधे आ गए कि यार मैं फलां फलां बोल रहा हूं। मजे ले रहा था पर शायद आप टेंशन में आ जाओगे इसलिए बता रहा हूं।
मैंने कहा बाकी तो ठीक है, पर ये लडकी कौन है, जो रोए जा रही थी इतनी देर से। तब उन्‍होंने बताया कि यह एक रिंगटोन है और उसके जरिए वह सुबह से कई लोगों के मजे ले चुका है। यानी सबको लडकी के साथ फंसाकर मजा लूटा जा रहा था कि आप कैसे बिहेव करते हैं।
मैंने उसे जैसे ही बताया कि बुआ के घर हूं उसने कहा कि बाद में बात करते हैं और मामला खत्‍म। उसके बाद कल आफिस पहुंचा तो पता चला कि किसने क्‍या क्‍या जवाब दिया। जैसे दो जवाब जो बेहद मजेदार थे आपको पहुंचा रहा हूं।
पहला:::::::: मेरे तो मोबाइल में ही बैलेंस नहीं है, आपको मिस कॉल कैसे करुंगा।
और दूसरा:::::::: अगर राजीव की तरह अगर मैं घर पर ऐसे बोल रहा होता तो मेरी तो बिना पूरी बात समझे ही पिटाई हो जाती।
( कोशिश करुंगा कि यह रिंगटोन आपको ऑनलाइन सुनवा सकूं। आप भूल से भी इस मजाक के शिकार न हों, इसलिए यह अनुभव आपके साथ बांटा जा रहा है।)