Tuesday, July 29, 2008

वाह रे चुतियापा !

शुरुआत में यह शब्द पढ़कर आपको निराशा हो सकती है। पर आजकल जिंदगी में यही चल रहा है। रोज-रोज की भागदौड़ और बिना बे्रक के नौकरी में शायद एक यही शब्द है चुतियापा, जो रोज-रोज करना होता। लेकिन हर रोज पहले दिन से अलग और उससे कहीं बेहतर। यह सब जरूरी है अगले दिन सकुशल ऑफिस आने के लिए। हो सकता है मेरी तरह दूसरे लोग भी इसे फील करें, लेकिन शायद अब तक लिख न पाए हों। पांच-छह साल तक रोज-रोज वही सिंगल-डीसी, कॉलम-दो कॉलम कर करके कई बार लगता है कि ये क्या कर रहे हैं। जवाब वही चुतियापा! बहुत दिन हो गए, ऑफिस में काम करके सिर इतना पक जाता है कि न ब्लॉग लिखने की हिम्मत होती है न पढ़ने की। पूरा जुलाई बीत गया, एक वीडियो पोस्ट करने के अलावा मैं ब्लॉग के लिए ही समय नहीं दे पाया। कई बार लगता है कि ब्लॉग पर भी चुतियापा शुरू हो गया है। हमारे भाई लोग इतने आ गए हैं, कि शुरुआती दिनों में जो अच्छी अच्छी बातें थी, उनकी जगह आपकी टीका-टिप्पणी और दुकानदारी ने ले ली है। ब्लॉग पर मीडिया की खबरों में जयपुर का नाम आते ही मुझे घूरने लगते हैं। कुछ लोग तो ऐसे हैं जिन्हें यह नहीं पता कि ब्लॉग किस चिडि़या का नाम है। और डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट फलां फलां डॉट कॉम में तेरी फोटो देखी और तू क्या क्या लिखता है टाइप की बात पूछते हुए आ जाते हैं। वो तो शुक्र है कि अब जयपुर में कम से कम 25 ब्लॉगर्स हो गए हैं। खैर ये तो हुआ ब्लॉग न लिखने का कारण आज का चुतियापा यहीं खत्म शुरुआत पर दिल की बातें यूं ही जारी रहेंगीशुक्रिया

7 comments:

Udan Tashtari said...

ये कारण नहीं चलेगा, भाई जी. नियमित लिखिये या वेलिड कारण लाईये. :)

Suresh Chandra Gupta said...

कृपया चुतियापा आप दफ्तर में करें ब्लाग पर नहीं. ब्लाग पर तो आप सबके और अपने चुतियापे की पोल खोलते रहिये.

sudhakar soni,cartoonist said...

ye chutiyapa majedaar lagaa

sudhakar soni,cartoonist said...

ye chutiyapa majedaar lagaa

बाल किशन said...

देखिये आपकी बात से सहमत तो हूँ पर ये अभद्र भाषा का उपयोग सार्वजनिक मंच पर सर्वथा अनुचित है.

मीडियागुरु said...

You seems to be bored with your routine work probably because of the rough language and hollow content being used in the media you are connected with. By using the same language you are bringing your boredom to your blog. Come out of this situation. Language reflects ones charecter.

shakir azim said...

आप कैसे हैं lagta hai bahut bor hogayen hai daily routin se हम sabhi तो आजकल ऐसे ही जी रहे हैं.
पता ही नही चलता की ज़िन्दगी चल रही है या हम ही ज़िन्दगी को घसीट रहे हैं.बस यूँ समझे सुबह होती है शाम होती है
उम्र यूँही ही तमाम होती है.शाकिर अजीम