Saturday, November 21, 2009

वाह रे आपदा प्रबंधन

अपना देश सचमुच भगवान भरोसे है और अपनका शहर तो सौ फीसदी भगवानजी की शरण में। अब ये भगवानजी कौनसे वाले हैं अपन को आइडिया नहीं है पर यहां कोई लॉ एंड ऑर्डर है न कोई आपदा प्रबंधन का सिस्टम, जिसकी जो मर्जी करे। जो होना है वह अपने आप ही होगा। और मामले ऐसे की देश में पहली बार होकर मिसाल कायम कर रहे हैं।
सीतापुरा के पास आईओसी डिपो में आग लगी, जब 14 दिन बाद तेल खत्म हुआ तब ही बुझी, मजाल है कि कोई सिस्टम यह बताने भी आया हो कि कब बुझेगी। देशभर के मीडिया को जब तक लौ तीस फुट तक उमड रही थी, तब तक इंटरेस्ट था उसके बाद किसी ने पूछा भी नहीं। अब सुन रहे हैं कि सरकार जागी है देश भर में आबादी के बीच वाले डिपो शिफ़ट होंगे। पर शायद इतनी बडी आग से पहले किसी ने यह भी न सोचा कि अगर आग फैल गई तो बुझेगी कैसे।
उसके बाद जयपुर के पास ही मंडोर एक्सप्रेस पलट गई, टेन की बोगी को चीरते हुए अंदर घुस गई। शुक्र था कि एसी डिब्बे चपेट में आए इसलिए मरने वालों की तादात दहाई का आंकडा न छू पाई वर्ना मरने वाले कितने होते पता नहीं, जनरल बोगियों की हालत जो होती है वह किसी से छिपी नहीं है। अब जांच करने वाले बता रहे हैं कि पटरी में क्रेक था इसलिए तेज गति से आ रही टेन के दवाब से पटरी टूट गई और हादसा हो गया। लोग कह रहे हैं कि इतने हादसों में यह पहली बार हुआ है कि पटरी बोगी को चीरते हुए अंदर चली गई हो।
अब बे-आपदा प्रबंधन का एक और उदाहरण देखिए।
9 नवंबर यानी आज से 12 दिन पहले जयपुर के पास ही शाहपुरा के जगतपुरा गांव में चार साल का साहिल 200 मीटर गहरे खुले बोरवेल में गिर गया। तीन दिन तक पूरा मीडिया जमा रहा। प्रशासन भी प्रेसनोट जारी करता रहा। पर आज 13वें दिन तक बच्चा जिंदा निकलना तो दूर उसका शव तक निकाला नहीं जा सका। अब तो शव लिखना ही उचित ही है कि अगर भगवान खुद भी आ जाएं तो उसे जिंदा न निकाल सकेंगे।
जयपुर में 23 को निकाय चुनाव है इसलिए प्रशासन चुनाव में बिजी हो गया और मीडिया उसकी कवरेज में। और दो दिन तक टीवी देख रहे लोग वापस सास बहू के सीरियल्स में। यानी सब भूल गए कि साहिल के घर में 12 दिन से खाना नहीं बना और गांव में आज भी मायूसी है।

अब सुनिए बच्चे को निकालने के लिए चलाया गया अभियान
पहले लोगों और प्रशासन ने मैनुअली फावडे से मिटटी निकाली। जब उससे मन भर गया और पार न पडी तो हल्ला मचा। फिर प्रशासन ने काम अपने हाथ में संभाला, बोरवेल में बच्चे को देखने के लिए पहले तो कैमरा ही न मिला। बाद में बडी मशक्कत के बाद सीसीटीवी लगाया गया तो डॉक्टरों को बच्चे की हलचल नहीं दिखी। उसके दो दिन बाद तक बोरवेल के समानांतर रूप में सिर्फ 90 फुट तक ही खोदा जा सका। इसमें भी कहते हैं कि 70 फुट के बाद मिटटी नहीं खुद पा रही थी इसलिए पाइप मंगवाए गए। प्रशासन ने बीसलपुर वाले पाइप का जुगाड किया वो भी सिर्फ 20 फुट क्यूंकि इससे ज्यादा मिला ही नहीं। सीकर से मिल सकता था, जहां से लाया नहीं जा सका। इसके बाद इंद्रदेव नाराज हो गए और काम रुक गया। फिर काम शुरू हुआ तो लोग उम्मीद छोड चुके थे काम धीमा हो गया और अब तक कुल मिलाकर 105 फुट ही खुदाई हो सकी है।
ये है अपन का आपदा से निपटने का सिस्टम एक बच्चे को बोरवेल में से नहीं निकाला जा सका, न जिंदा न मुर्दा।
दुखी मन से ::::::

Monday, November 9, 2009

सब कुछ होगा, बस न बचेगा तो कोई भारतीय

हिंदी बडी है या राज ठाकरे
महाराष्‍ट में राज ठाकरे लोकप्रियता बटोरने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। अभी चुनाव हुए चार दिन हुए कि उन्‍होंने मराठी को लेकर फिर राजनीति शुरू कर दी। उनकी पार्टी एमएनएस के विधायकों ने सदन में ही दादागिरी शुरू कर दी। वहां से समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी को शपथ लेने से रोका, माइक हटाकर थप्‍पड जड दिया।
उनका कसूर यही था कि उन्‍होंने राष्‍टभाषा हिंदी में शपथ लेने की कोशिश की। एमएनएस का तर्क था कि वे महाराष्‍ट के विधायक हैं और वहां उन्‍हें मराठी में शपथ लेनी चाहिए। सपा की ओर से तर्क दिया गया कि आजमी को मराठी नहीं आती, लेकिन एमएनएस नेता राम कदम ने कहा कि दस दिन पहले ही सभी को मराठी में शपथ लेने को कह दिया गया था, उन्‍हें इतने दिन में मराठी सीख लेनी चाहिए थी।

खैर जो कुछ भी हो
पर यह बात समझ से परे हैं कि देश के किसी भी राज्‍य में कुछ गुंडे हिंदी बोलने पर ही पाबंदी लगा दें, वो भी विधानसभा के भीतर। अपने राज्‍य की भाषा को सम्‍मान दिलाने के पचासों तरीके हैं पर किसी को बाध्‍य नहीं किया जा सकता। एमएनएस ने जो किया इससे ज्‍यादा बडा देशद्रोह शायद सदन में तो शायद संभव नहीं है।

अगर इस तरह के मामलों को गंभीरता से नहीं लिया गया तो जो लालू यादव कह रहे हैं उस बात से इत्‍तेफाक रखना ही होगा कि देश को टूटने से कोई नहीं रोक सकता। हालत यह हो जाएगी कि उत्‍तर का आदमी दक्षिणवाले से चिढेगा, पूर्व वाला पश्विम वाले से चिढेगा। देश में कोई भारतीय नहीं होगा।
कोई राजस्‍थानी होगा, कोई मराठी, कोई गुजराती। कोई हिंदू होगा तो कोई मुसलमान।
सब कुछ होगा बस न बचेगा तो कोई भारतीय
इसलिए पहले भारत को बचाओ, जब भारत बचेगा तब मुंबई होगी, राज होंगे और फिर उनकी एमएनएस

Tuesday, October 6, 2009

एक स्वाभिमानी की कहानी

ऑफिस के लिए निकला ही था कि किसी ने हाथ देकर लिट मांग ली। मेरे बैठाते ही भाई ने अपनी कहानी सुनाना शुरू कर दिया। कहने लगा कोटा से आ रहा हूं दौसा जाना है, जहां तक जाओ छोड़ देना। मैंने कहा, कोटा से पैदल। बोला कि मजदूरी को लेकर ठेकेदार से लड़ाई हो गई, इसलिए छोड़कर आ गया। मैंने कहा तो पैदल क्यूं आ गए। बोला कि साहब पैसे नहीं थे, इसलिए आ गया। मैंने कहा भाई ट्रेन तो सरकारी है, उसी में आ जाते। बोला बैठा था पर टीटी आ गया। पैसे मांगने लगा, मेरे पास थे नहीं तो लप्पड़ मार दिया। बस उतर कर पैदल ही चला आ रहा हूं। छठा दिन है चलते-चलते। मुझसे रहा न गया, पीछे मुड़कर उसकी शक्ल देखी तो कंधे पर एक पीले रंग की स्वापी थी और होंठ एकदम फटे हुए, सूखे। मैंने दस दस के दो नोट निकाले और बाइक गांधीनगर स्टेशन की तरफ मोड़ दी। मैंने कहा सामने गांधीनगर स्टेशन है। 13 रुपए के आसपास का टिकट होगा चले जाओ ट्रेन से। बोला भाई साहब दो-तीन दिन से ठीक से कुछ खाया भी नहीं है, पैदल जाऊंगा तो किसी गांव में खाना भी हो जाएगा। मैं रास्तेभर सोचता रहा कि यार आज की दुनिया में ऐसा भोला इंसान भी है क्या ?
इतने में मेरे ऑफिस की गली आ गई और मैंने उसे आगे का रास्ता बताकर विदा ली।
- जयपुर से कोटा की दूरी करीब 2५०किमी है।

Saturday, September 26, 2009

टाइमपास है व्‍हाट़स योर राशि


कल कई महीनों बाद फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो देखी व्‍हाटस योर राशि
फिल्‍म की कहानी कुछ यूं है कि एक गुजराती एनआरआई लडका एमबीए करने के बाद शादी करने भारत आता है।
भाई पर कर्ज है, घर की माली हालत खराब है ठीक सरकारों की तरह। शादी करने पर नाना की संपत्ति में से हीरो को करोडों की जमीन मिलनी है। और घरवालों को आस है कि एनआरआई बेटे को दहेज मिलेगा, इसलिए सभी को शादी की जल्‍दी है।
एक वेबसाइट पर लडके की शादी का एड दिया था। बदले में 1765 रेस्‍पांस मिले। लडका परिवारवालों की मदद करना चाहता है, पर दहेज नहीं लेना चाहता। शादी सिर्फ दस दिनों में करनी है और इतने दिन में इनती सारी लडकियों से मिलना संभव नहीं है।
इसलिए लडके की राय पर यह तय हुआ कि सिर्फ 12 राशियों के हिसाब से सिर्फ 12 ही लडकियां देखी जाएं। और इन्‍हीं 12 लडकियों के जरिए, समाज की कई सारी बुराइयों को दिखाया है और इन्‍हीं लडकियों के देखने के बहाने ही तीन घंटे से ज्‍यादा समय की इस तथाकथित कॉमेडी फिल्‍म का तानाबाना बुना गया है।
इन 12 ल‍डकियों को देखकर भी हीरो शायद कुछ तय नहीं कर पाया कि शादी किससे की जाए, तो एक रिश्‍तेदार ने उसकी बिना राय जाने सीधे फेरे के मंडप पर पहुंचा दिया।
12 लडकियों में सबकी अपनी अपनी कहानी है। अपने अपने गुण अवगुण है। पर पता नहीं आशुतोष गोवारीकर क्‍या चाहते हैं, उन्‍हें लगता है कि बिना पौने चार घंटे के कोई फिल्‍म पूरी हो ही नहीं सकती। फिल्‍म देखते समय बोर नहीं करती पर स्‍टोरी में ऐसा भी नहीं था, जिसे एडिट नहीं किया जा सकता था।
फिल्‍म में करीब 12 गाने हैं, जिनमें से एक दो को छोडकर फिल्‍म के बाहर आने तक आप भूल ही जाएंगे।
फिल्‍म की सबसे बडी बात यह कि प्रियंका चोपडा ने 12 किरदार निभाए हैं। संजना के किरदार में वो सबसे अच्‍छी लगी हैं और शायद वही उनपर सबसे ज्‍यादा सूट करता है, हां हैप्‍पी एंड में शादी भी उसी के साथ होती है।
उन 12 लडकियों के डिटेल पर चर्चा फिर कभी
अभी इतना ही, हां बस फिल्‍म टाइमपास है, आशुतोष गोवारीकर टाइप की नहीं है, जिसके लिए आप लंबे समय तक इंतजार करते थे।

ब्‍लॉग न लिखने पर मेरी सफाई

ब्‍लॉग पर लिखे आजकल कई दिन बीत जाते हैं। शादी के बाद से (1 जुलाई) ब्‍लॉग पर सक्रियता कम हो गई। इस बीच दिलीप नागपाल ने ब्‍लॉग बडी या बीवी लिखकर मुझे मजबूर कर दिया कि मैं कोई प्रतिक्रिया दूं।
कारण कई हैं।
पहला तो ये कि मकान चेंज करने के बाद से इनदिनों घर पर नेट कनेक्‍शन नहीं है। नया कौनसा लेना है, यह डिसाइड नहीं कर पाया। अगर आपके पास कोई सस्‍ते प्‍लान का आइडिया हो तो अवश्‍य दें।
दूसरा ये हो सकता है कि छुटटी से लौटकर पहले हर ऑफ वाले दिन घर की ओर कूच करना पडता था। अब पत्‍नी भी जयपुर आ गई है, रूम भी व्‍यवस्थित हो गया है। ये समझिए ब्‍लॉग पर वापसी के दिन फिर शुरू होने वाले हैं। बस इतने दिन इसलिए लग रहे हैं क्‍योंकि मुझे पता है कि अगर अखबार के बाद दिन के पांच घंटे वो मुझे लैपटॉप पर देखेगी, तो शायद तलाक ही हो जाए ! :))

इसलिए पहले उसे भी ब्लोगिंग सिखाने की कोशिश कर रहा हूं। दुआ कीजिए कि आपको एकसाथ दो दो ब्‍लॉगची दिखाई दें। ब्‍लॉग का समय आजकल बीवी के बाद टीवी के नसीब में है। पर आप चिंता न कीजिए लिख कुछ नहीं रहा, पर थोडा ही सही, पढ सभी को रहा हूं।

 
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