Wednesday, May 7, 2008

पत्रकारिता और भागमभाग

पत्रकारिता में आजकल भागमभाग का दौर है। मेरा मानना है कि हर दो साल में करीब साठ फीसदी से ज्‍यादा लोग नौकरी बदल रहे हैं। यानी हर आदमी तेजी में है। यह तेजी शायद खबर को जल्‍दी से जल्‍दी पाठक तक पहुंचाने वाले आजतक की तेजी से भी ज्‍यादा है। बीते एक साल में इतने समाचार पत्र और टीवी चैनल्‍स शुरू हुए कि यह रफतार और बढ गई।
रात की ही बात थी, आफिस से घर लौटकर बस यूं ही आरकुट पर मैसेज चैक कर रहा था। इसी बीच एक मित्र के फोटो एलबम पर नजर पडी। बात पर्सनल है और उससे भी ज्‍यादा वो फोटो जो अब दुबारा इस तरह किसी भी कीमत पर खींचा भी नहीं जा सकता। इस एक फोटो से आप मीडिया की भागदौड को साफ अनुभव कर सकते हैं।

अब सुनिए कहानी, फोटो में कुर्सियों पर बैठे लोगों को छोड ( फोटो में एक जयपुर की राजकुमारी हैं) बाकी सारे लोग आज उस संस्‍थान में नहीं है, जहां का यह फोटो है। यूं तो इस फोटो वाले दिन मैं खुद भी उसी टीम का हिस्‍सा था, इत्‍तेफाक से फोटो खिंचते समय मौके पर नहीं था। मैं खुद भी एक बार नौकरी बदल चुका हूं।
अब उस फोटो में राजकुमारी दीया को छोड 12 पत्रकारों में से समूह संपादक और तीन दूसरे वरिष्‍ठ साथी ही उसी संस्‍थान में हैं। बाकी अब दूसरी जगह नौकरी कर रहे हैं ( दाएं से चौथे, मेरे मित्र प्रवीण गौतम का सडक दुर्घटना में निधन हो गया।) वैसे उसी संस्‍थान में बचे हुए सभी लोगों का भी अपनी अपनी जगह से तबादला हो चुका है। यानी बदलाव तो सौ फीसदी है।
और तो और इधर उधर हुए लोगों में से आधे लोग तो इस दौरान दो बार नौकरी बदल चुके हैं। यानी कारण कुछ भी हो आदमी बदलाव चाहता है।

शायद सभी को पता है कि बहता पानी, ठहरे हुए से ज्‍यादा पवित्र माना जाता है!

Thursday, May 1, 2008

दिखावे पर न जाओ अपनी अक्‍ल लगाओ


आईपीएल के मैच चल रहे हैं। अपन तो क्रिकेट अप्रेमी आदमी है। हालाकि क्रिकेट से अपनी दुश्‍मनी सिर्फ इसलिए थी कि टाइम खराब होता है अपना और मिलता है पैसा खिलाडियों को। पर टवंटी टवंटी ने बाकी कुछ और नहीं तो पूरे भारत देश का थोडा टाइम तो बचाया है, सबकुछ वही है पर थोडा कम समय में निपट जाता है।
सुना है आजकल तो ये चीयरलीडर्स भी गजब ढा रही हैं। लोग कह रहे हैं कि आजकल भीड या तो शाहरुख, प्रीति जिंटा और करीना को देखने जाते हैं या फिर चीयरलीडर्स को, मैच में तो कम ही लोगों की दिलचस्‍पी है।
आईपीएल में एक के बाद एक लगातार तगडे धमाके हो रहे हैं। पहले मीडिया ने बहिष्‍कार की धमकी दी। उसके बाद शाहरुख ने कहा कि पहले कुछ और बताया वर्ना मैं कभी फ्रेंचाईजी ही नहीं खरीदता। उसके बाद अपन के भज्‍जी ने श्रीसंत को थप्‍पड जड दिया। इस बीच प्रीति जिंटा ने अपने खिलाडियों को जी भर के गले लगना शुरू किया। उसके बाद चीयरलीडर्स पर संसद में हो हल्‍ला हुआ। ठाकरे बोले कि उन पर खर्च होने वाला पैसा किसानों को मिले। अब आज की ही बात है जयपुर में मैच के बाद अपन की राजस्‍थान रॉयल्‍स टीम के कप्‍तान शेनवार्न ने कहा कि सौरव गांगुली घमंडी है, मैच में देरी से आए। उन्‍हें टॉस के लिए इंतजार कराया और स्मिथ के कैच को भी झूठा बताया।
इन सबसे उबर कर अपनी नजर कुल टैली पर पडी तो पता चला कि आईपीएल सीरिज शुरू होने से पहले तक सबसे कमजोर माने जाने वाली राजस्‍थान रॉयल्‍स की टीम अब सबसे धांसू बनकर उभरी है। शुरुआती एक मैच को छोडकर अब तक पांच मैचों में से चार मैच जीत चुकी है।
टीम की यह स्थिति देखकर अपन को स्‍प्राइट की वह टैगलाइन याद आ जाती है, जो उसके शुरुआती विज्ञापनों में आती थी। दिखावे पर न जाओ अपनी अक्‍ल लगाओ।

Wednesday, April 30, 2008

ईश्‍वर रक्षा करे हिंदी की


हिंदी में अनुवाद के गडबडझाले आपने खूब देखे होंगे। अर्थ का अनर्थ संता बता या लालूजी जोक में खूब सुने और सुनाए होंगे। पर अपन की सरकार और उसकी यह राष्ट्रभाषा हिंदी का हाल देखिए जरा।
तिगडी खानपुर के पास वायुसेनाबाद में लगे इस बोर्ड में डिफेंस लैंड की हिंदी की गई है रक्षा भुमि। अब तो साफ है हिंदुस्‍तान में शायद हिंदी की रक्षा ईश्‍वर ही कर पाए, सेना ने भी पल्‍ला झाडा!
यह चित्र दैनिक हिंदुस्‍तान, नई दिल्‍ली ने एक मई को प्रकाशित किया है।

Sunday, April 27, 2008

वाह भाई शाहरुख


अपन के शाहरुख खान, सारे एडिटर्स से अच्‍छे हैं! 25 अप्रेल को शाहरुख खान ने वो 'चमत्‍कार' कर दिखाया जो अच्‍छे अच्‍छे एडिटर्स भी न कर सके। शाहरुख एक ही दिन में दो समाचार पत्र समूहों के बतौर अतिथि संपादक थे।
उन्‍होंने 25 अप्रेल को दैनिक भास्‍कर समूह के दो अखबारों दिव्‍य भास्‍कर और दैनिक भास्‍कर का संपादन किया और वे समाचार पत्र के आफिस में मौजूद थे। वहीं वे उसी दिन दिल्‍ली के एचटी में मौजूद थे। उन्‍होंने बतौर संपादक एचटी, नई दिल्‍ली के सप्‍लीमेंट एचटी सिटी का संपादन किया।
अपन को दो के चिंतन के बाद भी यह समझ नहीं आया कि एक आदमी एक ही दिन में दो जगह कैसे। वैसे अपन ने गौर से देखा तो शाहरुखजी दैनिक भास्‍कर की प्रति पढ रहे हैं वो इस साल के आमबजट वाले दिन की है।

ईश्‍वर सबको शाहरुख जैसा संपादकीय हुनर दे, वैसे अपन ने दोनों अखबार देखे, खूबसूरत भी थे और कुछ नए स्‍टोरी आइडिया भी।

Thursday, April 24, 2008

बिना टिकट ब्लेयर


टोनी ब्लेयर पिछले साल तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे।वह सबसे लंबे समय तक वहां के प्रधानमंत्री तो रहे ही, बल्कि उनके नेतृत्व में लेबर पार्टी ने लगातार तीन चुनाव जीते, जो एक रिकॉर्ड है। और अब भी टोनी ब्लेयर संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय यूनियन, अमेरिका और रूस के पश्चिम एशिया में विशेष दूत की जिम्मेदारी निभाते हैं। मतलब यह कि प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद भी वैश्विक परिदृश्य में टोनी ब्लेयर का महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि बढ़ा ही है। लेकिन यही ब्लेयर बीते दिनों एक ट्रेन में बिना टिकट पाए गए! जिस हीथ्रो एक्सप्रेस में वह सवार हुए थे, उसमें ट्रेन में भी टिकट बनवाने की सुविधा है। लिहाजा टिकट न होने पर रेलवे अधिकारी ने ट्रेन में टिकट बना तो दिया, लेकिन पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री की जेब में किराये के 24.50 पाउंड भी नहीं थे! वह तो भला हो ब्लेयर के सहयात्री का, जिसने उनके टिकट के पैसे दे दिए। बहुतेरे लोग होंगे, जो इस मामले में ब्लेयर का समर्थन नहीं करेंगे। लगभग सात साल पहले टोनी ब्लेयर की पत्नी भी लंदन ब्लैकफि्रयर्स से ल्यूटन तक बिना टिकट यात्रा करते हुए पकड़ी गई थी, और उन्हें जुर्माना भरना पड़ा था। ऐसा भी नहीं है कि प्रधानमंत्री पद से हटने के बादब्लेयर के पास पैसे का टोटा हो गया है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले करीब एक साल में भाषणों से ही उन्होंने करीब चार करोड़ रुपये कमाए हैं। अलबत्ता इस घटना का एक दूसरा पहलू भी है। सवाल यह है कि क्या हमारे यहां कोई राजनेता ऐसी शमिZदगी से दो-चार होता है? कतई नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि हमारे यहां के राजनीतिज्ञ ज्यादा ईमानदार और नैतिक हैं। बल्कि उनमें से कुछ तो इतने बेईमान हैं कि अपना कूपन तक बेच देते हैं, अपनी जगह अपने रिश्तेदारों को सफर करवाना अपना अधिकार समझते हैं। अगर उनके पास टिकट न हो, तो भी कोई उनसे टिकट मांगने की जुर्रत नहीं करता। लेकिन वर्ष 2001 में चेरी ब्लेयर को जब ट्रेन में बिना टिकट पकड़ा गया था, तब उनके पति प्रधानमंत्री थे! यानी वहां कानून सबके लिए बराबर है। लेकिन हमारे यहां यह सिर्फ कहने के लिए है। यहां तो रेल मंत्री के रिश्तेदारों की सहूलियत के लिए ट्रेन के प्लेटफॉर्म तक बदल दिए जाते हैं। विधायकों-सांसदों की सहूलियत के लिए आम यात्रियों को परेशान किया जाता है। विद्रूप देखिए कि लोकतंत्र का मौजूदा मॉडल हमने ब्रिटेन से ही लिया है। फिर भी दोनों में कितना बड़ा फर्क है। एक देश का पूर्व प्रधानमंत्री आम आदमी की तरह ट्रेन में सफर करता है, और टिकट के पैसे न होने पर शर्मसार हो जाता है। बिलकुल हो सकता है कि उन्होंने बेध्यानी में अपनी जेब में रुपये ही न रखे हों। और एक हमारा देश है, जहां कितने ही पूर्व मंत्रियों पर हवाई यात्रा के करोड़ों रुपये बकाया हैं। हम ब्लेयर पर हंसे या खुद पर रोएं?
(अमर उजाला के संपादकीय से साभार)