Saturday, March 21, 2009

बाप रे! सत्‍तर हजार की जगह, सात लाख रुपए

इस बार घर गया तो यूं ही पापा से बातचीत चल रही थी। पापा इलेक्‍टीसिटी डिपार्टमेंट में हैड कैशियर हैं। इसलिए उनका बैंक में रेग्‍यूलर आना जाना लगा रहता है।
तो सुनिए पापा का सुनाया हुआ एक किस्‍सा
ये किस्‍सा सुनकर लगेगा कि जब तक देश में इतनी अनपढ और नासमझ जनता है तब तक उन भाई साहब जैसे बेवकूफ लोगों का काम चलता रहेगा।
हुआ यूं कि एक बुजुर्ग अनपढ पोस्‍ट आफिस से पैसा निकालकर सीधे बैंक गया। उसने अपनी पर्ची भरवाकर कैश काउंटर पर रख दी। कैशीयर ने पर्ची और नकद रुपयों में अंतर देखकर या बडी रकम देखकर पूछा- बाबा ये इतने रुपए कहां से लाए हो,
बुजुर्ग बाबा बोले पोस्‍ट आफिस से निकलवाए हैं।
कैशियर ने पूछा, कितने हैं
बाबा बोला – सतर हजार रुपए
आप विश्‍वास नहीं करेंगे कि कैशियर के हाथ में वो कितने रुपए थे।
जी सात लाख रुपए
यानी पोस्‍ट आफिस के कैशियर ने सौ रुपए की सात गडडी देने के जगह, पता नहीं कैसे उसे हजार रुपए की सात गडडी दे दी।
पापा को रोकते हुए मैंने भी आप ही की तरह पूछा कि क्‍या पोस्‍ट आफिस में इतने रुपए होंगे। पापा बोले वैसे तो मुश्किल हैं पर मार्च में लोग टैक्‍स सेविंग के लिए पीपीएफ अकाउंट में खूब जमा करते हैं न, इसलिए इतने होंगे।
हां तो
आगे सुनिए, यह है एक छोटे शहर और शराफत का उदाहरण
बैंक के कैशियर ने पोस्‍ट आफिस को फोन किया, कैशियर से बात की। पहले तो साहब मानने को ही तैयार ही नहीं इसलिए बैंक वाले को बोले कि सात लाख हैं तो जमा कर ले, तुझे क्‍या दिक्‍कत है।
पर जब पडोसी को बताया कि समझा ले भाई की नौकरी चली जाएगी।
समझाने के बाद पोस्‍ट आफिस के कैशियर साहब वहां आए, और जब उन्‍हें अपनी गलती का अहसास हुआ तो उसके होश फाक्‍ता थे। हों भी क्‍यूं न
वो इतने पैसे पता नहीं कितने साल में भर पाता ।
पर जब तक भारत में ये निरक्षरता है तब तक शायद ऐसे बेवकूफ लोगों की ईश्‍वर मदद करता रहेगा।

5 comments:

संदीप शर्मा Sandeep sharma said...

अच्छा है... पैसे लेने वाला कोई पढ़ा-लिखा नहीं था.... इमानदारी जिन्दा थी, क्योंकि सच्चाइ मालूम नहीं थी...

संगीता पुरी said...

पोस्‍ट आफिस के कैशियर का भाग्‍य अच्‍छा था ... इसलिए सामने वाला ईमानदार मिला ... छोटे शहरों में भी अब यह ईमानदारी देखने को नहीं मिलती है।

Gaurav bindas said...

bhai sab log nahi karte.......shayed bankwale ke din thik nahi the....but honesty is best policy......
so here is it....

neelima sukhija arora said...

kismat thi us post office cashier ki, warna itni imandari aajkal to mushkil hai

TARUN JAIN said...

aise logo ki vajah se hi desh barbad hai