Friday, May 15, 2009

हर गलती सजा मांगती है

(राजनीति पर लिखने के लिए देश में बहुत सारे दिग्गज पत्रकार हैं। मैं हमेशा खुद को उनसे ज्यादा काबिल नहीं मानता, इसलिए मैं हमेशा राजनीति पर लिखने से खुद को रोकता हूं। सोचता हूं कि अपने ब्लॉग को निजी जिंदगी के आसपास ही रखूं। पर कल मतगणना है हमें अपने 545 महानुभाव मिलने वाले हैं, जो देश चलाएंगे!)
कहते हैं कि हर गलती सजा मांगती है। आज पप्पुओं की गलती हिसाब मांगेगी। मतगणना के बाद पता चलेगा कि कौन सरकार बनाएगा। फिर भी सब जानते हैं कि इस बार त्रिशंकु लोकसभा के आसार हैं। देश ने न कांग्रेस नेतृत्व को देश चलाने के लायक समझा है, न भाजपा को। इस चक्कर में तीसरा और चौथा मोर्चा टाइप के ऐसे रिजेक्टेड लोगों को देश का नेतृत्व करने का मौका मिल सकता है, जो सही मायने में इस लायक हैं ही नहीं। छोटे दलों की यूं बेकद्री को अन्यथा न लीजिए मेरा मतलब है कि वो सिर्फ स्थानीय चीजें सोचते हैं। समग्र देश और विदेश नीति के लिए उनकी कोई राय नहीं है। बस उनकी पार्टी, उनके नेता का भला हो जाए। बहुत ज्यादा सोचगा तो मेरा बिहार, मेरा बंगाल या हमारी तमिल और हम सबका तेलांगना की बात करेगा। भले ही देश गर्त में चला जाए। विकास पर दो किलो चावल का वायदा भारी पड़ जाता है तो कहीं फूटी आंख न सुहाने वाले लोग हाथ मिला लेते हैं। किसी को बहुमत नहीं मिलेगा तो औने पौने दामों में सांसद बिकेंगे। हर सांसद बड़ी पार्टी को ब्लैकमेल करेगा और अपना जुगाड़ फिट करने में रहेगा।
अब बात करें गलती की
असली गलती है हम मतदाताओं की। प्रधानमंत्री चुनना है, केंद्र में सरकार बनानी है पर आदमी चुनते हैं नगर निगम चुनाव की तरह। मेरी राय तो यही है कि आदमी उन्नीस हो तो भी चलेगा पर पार्टी या विचारधारा देखकर वोट करना चाहिए। यूं हर आदमी को भारत में वोट देने का अधिकार मिल गया है। शायद पच्चीस फीसदी भारत इस लायक था ही नहीं कि उसे वोट डालने का अधिकार मिले। यूं भी बिना कीमत चुकाए कोई चीज मिले तो उसकी वैल्यू नहीं होती। ज्यादा करता है आदमी तो एक शराब की बोतल में बिक जाता है। भारत में वोटिंग का अधिकार भी यूं ही है। इसलिए शायद 40 फीसदी भारत वोट डालने ही नहीं जाता।
हम निगम चुनाव की तरह के मुद्दों पर लोकसभा चुनाव में मतदान करते हैं। पाटिüयां भी यह बात समझ गईZ हैं, शायद इसीलिए उन्होंने भी पूरे चुनाव संपन्न हो गए पर एक भी ढंग का राष्ट्रीय मुद्दा नहीं उठाया। बस गाली-गलौज में ही लगे रहे।
हां, कुछ लोग समझदार बनने की कोशिश में इस बार नोट वोट के लिए चले गए पर ज्यादातर लोगों ने बस इसीलिए नो वोट किया कि उनके आगे सड़क नहीं बनी या पूरे गांव में पानी नहीं आता। मीडिया ने भी पूरा गांव करेगा मतदान का बहिष्कार टाइप की हैडिंग लगाकर मामले को खूब हाइप दिया।
अब हमने मतदान ही कुछ इस तरह किया है कि त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति आ गई है। अब सरकार चाहे जिसकी बने पर दो ढाई साल से ज्यादा चलने लायक नहीं बनेगी। यानी फिर चुनाव, देश के पैसे का फिर सत्यानाश!

8 comments:

Richeek Mishra said...

badhiya hain sahab, sachchai sab jante hain, hum bhi aap bhi aur neta bhi, par kya kare paisa, power aur publicity ki bhookh unhe chheena-jhapti me laga deti hain, isliye hamare desh ka bedagarak ho raha hain

Udan Tashtari said...

सोचता हूं कि अपने ब्लॉग को निजी जिंदगी के आसपास ही रखूं।

-यही बात तो हमें आप तक खींच कर ले आती है, जनाब!!

chandrashekhar HADA said...

majboot PM ya majboot SARKAR nahin rajivbhai, majboot VOTER chahiye tabhi desh ka bhala ho payega.....

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वोट करना अधिकार नहीं
कर्त्तव्य होना चाहिए.

GKK said...

This is most critical true analysis, keep it up ...

प्रारंभ...... said...

बिलकुल सही ,यदि देश का मतदाता देश हित के लिये जागरूक होता तो शायद इस देश की 90 प्रतिशत समस्या सुलझ चुकी होती ,इसी लिये मेरा भी मानना है ही देश की वर्तमान दशा के लिये राजनेता नहीं बल्कि हम खुद जिम्मेदार है .

भूतनाथ said...

हाँ बंधुओं....अब हमें इन सबकी तवज्जो करनी है....
मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
पूं......पूं......पूं........!!
होशियार.....खबरदार.......हर राहगुजर......!!
कुछ लोग फिर से राजा बनने जा रहे हैं.....!!
आपने उनकी तवज्जो करनी है......!!
अभी उनके भाग्य की रेखाओं की
उलटी गिनती शुरू होने वाली है....!!
अभी से हर तरफ़ नोटों के बण्डल
और पैकेजों के पैकेज धरे जा रहे हैं......!!
अभी से कितने ही लोग मैनेज किए जा रहे हैं.....!!
अभी सारी पार्टियों के दरबार खुले हुए हैं....!!
सरकार बनते ही बंद हो जायेंगे फ़िर से
इस लोकतंत्र के मन्दिर के कपाट........
आम लोगों के लिए पाँच साल के लिए बंद.....!!
इसी लोकतंत्र की हमें तवज्जो करनी है.....!!
अभी-अभी संपन्न हुए इस मन्दिर की
ठेकेदारी के चुनाव में खर्च हुए हैं
महज पचास हज़ार करोड़ रूपये.....
जो अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में हुए खर्च....
आठ हज़ार करोड़ से बस कुछ ही ज्यादा है....!!
कारण.....!!अमेरिका में तो बेतरह मंदी है....!!
और भारत में शायद इसका कोई असर नहीं.....!!
एक महीने जो पापड बेले हैं इन चुनाव में हमारे नेताओं ने
उनके एक-एक पापड बेले जाने का हिसाब हमको उन्हें देना है....!!
इसीलिए हे बंधुओं...हे नागरिकों....!!
हमें इसी लोकतंत्र को तवज्जो देनी है....देनी ही है.....!!
अभी बिछी हुई हैं....सब तरफ़ ही षडयंत्र भरी बिसातें.....!!
कौन कब कहाँ घर बदल देगा,यह ख़ुद उसे भी नहीं मालूम.....!!
घोड़ा सीधा चलेगा,हाथी ढाई घर और ऊंट एक-एक डेग.....!!
और प्यादे मंत्रियों की चाल चलेंगे इस बिसात में.....!!
कोई भी राजा होगा ही नहीं इस फीचर में.....!!
और अचानक किसी फ्रेम से एक राजा निकल आएगा....
और वो देश की जनता को नचाएगा....उसका तय करेगा भाग्य
बेशक वो ख़ुद किसी और के इशारों पर नाचता मिलेगा.....!!
कभी सूना करते थे हम कि.....
राजा होता है देश का सबसे सर्वशक्तिमान....संप्रभु.....!!
आज का राजा तो नाचता है....किसी मैडम
या किसी किंग मेकर की उँगलियों पर......
तो हाँ दोस्तों....हमें लोकतंत्र की आत्मा की खातिर
इसी राजा की तवज्जो करनी है....!!
बंधुओं....अपनी आत्मा की धज्जियाँ उडाकर भी
हमें संविधान का सम्मान करना है....
हमें इन सबकी तवज्जो करनी है.....
जो उडाते हैं....हर इक पल....
हमारे भारत के संविधान की धज्जियाँ.....!!

sudhakar soni,cartoonist said...

sahi kaha_har galti kimat mangti hai