
हर रोज एक तरह की जिंदगी, क्या इससे ऊब गया हूं मैं
सोचकर अब आप ही बताओ कि ऐसे में अब क्या करू मैं
रोज वहीं चार बजे सोना जब लोग उठने की तैयारी में हों
नींद जब परवान पर हो तो रूममेट जाने की तैयारी में हों
जब नींद पूरी खुले तो चिंता सताए कि क्या छूटी खबरें
क्या क्या रही गलतियां, कौन कहां किस खबर में रहा भारी
इतने पर भूख सताए तो वही बात कि कहां क्या खाया जाए
इससे ऊबरो तो फिर कि अब आज के पांच कैसे बजाए जाएं
अकेले मोबाइल एसएमएस और इंटरनेट पर झूझते रहो
कुछ पढो, कुछ पढकर अकेले ही चिंतित होते रहो
तभी ख्याल आए कि यार छह बजने में थोडी ही देर है
कपडे कौन से पहनूं, कम गंदे कौनसे है, यार एक राउंड और
तैयार हो गए तो कभी आईकार्ड लापता तो कभी बाइक की चाबी
आफिस पहुंचते ही वही भागदौड कि फोन भी आए तो कहूं बाद में करना
काम खत्म हुआ अब दिनभर से मुक्त हुआ तो बारह बज गए
कुछ गपशप का मूड बनाया तो साथियों को घर जाने की जल्दी
इतने में श्यामजी चिल्ला दिए, एक के चक्कर में सब लेट होते हैं
कल से इसे यहीं छोड जाएंगे, पर पता नहीं आजतक मैं अकेले क्यूं नहीं आया
घर पहुंचकर मोबाइल पर चार रिग दी, बडी मुश्किल से गेट खुलवाया
अंदर पहुंचा तो गेट खोलने वाला छोटाभाई भी चित्त हो चुका है
अपन फिर भी नेट पर विराज गए हैं, सोच ही रहा था कि क्या करू
आज ज्यादा सोच लिया तो नतीजे निकाला कि क्या यही जिंदगी है तुमसे पूछूं