Friday, December 21, 2007

एकदम परफेक्‍ट है ‘तारे जमीन पर’


मैंने पहली बार ‘फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो’ देखा। ‘तारे जमीन पर’ फिल्‍म की कहानी ने मुझे पहले दिन से ही सम्‍मोहित कर रखा था। जिंदगी में पहली बार किसी फिल्‍म को फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो देखने की इच्‍छा थी, जिसे मेरे दोस्‍तों ने पूरी करवा दी। शुक्रवार को बारह से 3 के शो में मैंने यह फिल्‍म देखी।
यूं तो आमिर मेरे सबसे पसंदीदा सितारे हैं पर यह फिल्‍म इतनी संवेदनशील और परफैक्‍ट है कि आप भी आमिर के फैन हुए बिना नहीं रहेंगे। पूरी फिल्‍म केंद्रित है, ईशान अवस्‍थी नाम के आठ साल के बच्‍चे के ईर्द गिर्द। बच्‍चा डिसलेक्सिया नाम की एक बीमारी से पीडित है।
अमोल गुप्‍ते की इस कहानी में बच्‍चे को कुछ अक्षर पहचानने में परेशानी आती है और वे उसे उल्‍टे या फिर तैरते हुए नजर आते हैं। घर वाले उसे शैतान या पढाई से जी चुराने का बाहना मारकर बोर्डिंग स्‍कूल में डालने का प्‍लान बनाते हैं और बच्‍चे को मुंबई से पंचगनी की न्‍यू ईरा डे बोर्डिंग स्‍कूल में शिफ़ट कर दिया जाता है। घर से दूर जाने और उसकी चित्र बनाकर अपनी मां को डायरी बनाकर भेजने वाले सीन्‍स को आमिर ने पूरी संवेदनशीलता के साथ फिल्‍माया है।
यूं समझिए कि अगर आप इत्‍मी‍नान से फिल्‍म देख रहे हैं तो आपकी आंखें नम होना निश्चित है। जिन मांओं के बटे अपन की तरह बाहर रहते हैं वे तो हो सकता है दहाडे मारकर रोना शुरू कर दें। ये बात अलग है कि आमिर ने मुझे भी कई बार चश्‍मा हटाने को मजबूर कर दिया।

इंटरवेल से दो मिनट पहले ही प्रकट हुए आमिर
काबिले गौर बात यह है कि निर्माता निर्देशक होने के बावजूद देश के दूसरे सबसे बडे बिकाऊ सितारे ने अपनी एंटरी इतनी देर से कराई। लेकिन फिल्‍म का संपादन इतना चुस्‍त दुरुस्‍त था कि खचाखच भरे हॉल में से मैंने किसी को गाने तक में बाहर जाते हुए नहीं देखा। (जो आजकल अमूमन होता नहीं है, हो भी जाए पर ये कमबख्‍त मोबाइल बज जाता है।) हालत यह थी कि आमिर की एंटी पर तो लोगों ने सिनेमा हॉल में ही जमकर ताली बजाई।


मान गए भाई आमिर

आमिर रामशंकर निकुंभ नाम रखकर टीचर की भूमिका में इस फिल्‍म में एकदम बिंदास, हंसमुख नजर और जवान नजर आए। एक नई नवेली हिरोइन एक दो सीन में नजर आईं, लेकिन लव स्‍टोरी जैसी कोई चीज नदारद थी। एक बात और जो मेरी नजर से बच नहीं पाई आमिर ने अपने चाइल्‍ड आर्टिस्‍ट दरशील सैफरी को पूरा सम्‍मान दिया। फिल्‍म की नंबरिंग में आमिर से पहले ईशान यानी दरशील का नाम था।

डायलॉग गजब के
आमिर ने अपनी पूरी टीम से गजब का काम कराया। आज की भागदौड की जिंदगी में बच्‍चों के सिर पर पढाई के बोझ को उन्‍होंने आसानी से बयां किया।
प्‍यार वो होता है जिसमें बच्‍चा आपकी बाहों में आकर सुकून ले

पता नहीं ये सोलोमन द्वीप की कहानी (सोलोमन द्वीप में आदिवासी पेड काटते नहीं है, बल्कि सब मिलकर पेड के आसपास आकर गालियां सुनाते है और कुछ दिन में पेड सूख जाता है) ठीक थी या नहीं पर फिल्‍म में डायलॉग इतना प्रभावी है कि मिनटों तक तालियां बजती रहती है।
कुल मिलाकर कहें तो मिस्‍टर परफेक्‍शनिस्‍ट आमिर खान की यह एकदम परफैक्‍ट मूवी है, जिसमें बॉलीवुड के किसी भी फंडे का इस्‍तेमाल किए बिना इतनी सुंदर, संवेदनशील और साफ सुथरी फिल्‍म बनाई। संगीत शंकर अहसान लॉय का है और गीत प्रसून जोशी ने लिखे हैं। गानों के बोल बहुत सुंदर है। अगर रात को अकेले में आप ये गीत अकेले में सुनें तो बचपन की याद जरूर सताएगी। बच्‍चों को तो यह फिल्‍म बेहद पसंद आएगी।

5 comments:

महर्षि said...

शानदार फिल्‍म है भाई तारे जमीन पर, समीक्षा भी मस्‍त है

Raviratlami said...

यह समीक्षा अगर आमिर पढ़ेंगे तो उनके भी आंखों से आंसू आना तय है. फ़िल्म तो देखने से पता चलेगा, पर समीक्षा आपने धांसू लिखी है. :)

manglam said...

फिल्मों की समीक्षा या तो ऐसे महान लोग किया करते हैं जो पूरवाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाते और उनकी लेखनी सचाई बयां नहीं कर पाती, या फिर अखबारों में नियमित समीक्षा लिखने वाले जिन्हें महज अपनी ड्यूटी पूरी करनी होती है। वैसे भी इन समीक्षाओं को पढ़कर सिनेमाहॉल का रुख विरले ही कर पाते हैं, लेकिन आपने जिस नजरिये से फिल्म को ब्लॉग पर प्रस्तुत किया है, वाकई ऐसा लगता है कि आमिर खान ने तारे जमीन पर उतार दिए हैं। अब तो दावे से मैं यह कह सकता हूं कि मेरे साथ इस ब्लॉग पर आने वाले और भी कई इस फिल्म को देखने का लोभ संवरण नहीं कर सकेंगे। मेनी-मेनी थैंक्स। काश, गुजरात वालों को भी अक्ल आ जाए, और वे आमिर का विरोध जताना छोड़कर मानवता के इस यग्य में अपनी आहुति दे सकें।

Sanjeet Tripathi said...

बहुत बढ़िया लिखा है बंधु

Tarun said...

bahut sahi likha hai aapne bhi jaisi film waisi sameeksha. Aur jaisa aapne meri sameeksha per keha mere dil ki baat keh di