Tuesday, September 18, 2007

क्‍या किताब की चोरी चोरी नहीं है


दोस्‍तो

जयपुर में इन दिनों राजस्‍थान पत्रिका का राष्‍टीय पुस्‍तक मेला चल रहा है। रविवार को मैं भी गया देखने। वैसे तो मुझे पढने लिखने की खास ‘बुरी’ आदत नहीं है, लेकिन हमारे संस्‍थान में माननीय प्रंबंध निदेशक और पत्रिका के संपादक श्री गुलाब कोठारी ने विशेषतौर पर हिदायत है कि ‘आप पढने लिखने वालों के पेशे में हैं, लोग आप पर भरोसा करते हैं, आपकी हर लाइन को जनता सोकर उठते ही पत्‍थर की लकीर की तरह सच मानती है, इसलिए आपको पढने की आदत होनी चाहिए।’ इसलिए कोशिश में लगा हूं, कि कुछ पढ लिख लूं, पर अभी खरीदने की आदत ही लगा पाया हूं, कोशिश करुंगा कि जो लाया हूं वो पढ लूं।
हां तो रेफरेंस छोडकर आगे सुनें तो जैसे ही मैंने किताबें देखनी शुरू की मुझे याद आया कि उनमें से कई किताबें मैंने पिछले साल खरीदी थीं, लेकिन अब न तो अभी तक पढीं न ही वे घर पर मौजूद हैं। दिमाग पर जोर डाला तो कुछ किताबों के नाम भी और याद गए, और कुछ लोगों के भी जो किताबें लेकर गए थे। मेरे साथ बुक फेयर में गए मेरे मित्र से मैंने कुछ किताबें लोगों के ले जाने की बात कही, तो पास खडे सज्‍जन भी बोल गए भई किताब की चोरी चोरी नहीं। एक बार जो किताब ले गया वो लौटता नहीं।
बस मुझे लगा कि उन्‍होंने वही कह डाला, जो मैं कहना चाहता था। वैसे मैं किताबे हर किसी को तो देता नहीं पर खास मित्र भी इस मामले में लापरवाह हैं। या तो लेकर भूल जाते हैं या फिर वो भी किसी और को दे देते हैं। इसलिए मेरी नेक सलाह मानिए इसे पढकर आज ही याद कीजिए कब कौनसी किताब खरीदी थी, आज वो कहां है।
वैसे मैंने अपनी आदत में एक सुधार कर लिया है कि पहले किताब बिल उसी किताब में रख देता था, अब मैंने एक फोल्‍डर में डालने शुरू कर दिए हैं, ताकी कभी बिल भी दिख जाए तो याद तो आ जाए कि फलां किताब मेरे पास थी। और दूसरा आजकल मैं मना कर देता हूं कि बॉस मैं पढने के लिए किताब किसी को भी नहीं देता,एक बार बुरा लगता है लेकिन आपको कुछ तो करना ही पडेगा न। वैसे भी आदमी पैसा खर्च करता है तभी किसी चीज की कद्र करता है। फ्री की चीज को आदमी सीरियसली नहीं लेता चाहे किताब हो या मेरी सलाह !

14 comments:

आशीष said...

Rajeev main bhi apni kitabein kisi ko bhi nahin deta hoon..chahe voh koi bhi hain..logon ko lena yaad rahta hain lekin dena nahin..aap kitab do yaa mat do..sujav jaroor dete rahanaa

संजय बेंगाणी said...

किताबें इधर उधर हो जाने से हम भी दुखी है.

Gaurav said...

i m totally agree with u,

सजीव सारथी said...

भाई किताबों के मामले में तो हम भी बड़े possessive हैं, कमबख्त ऐसा शौक है की जितनी भी अपने पास हो दूसरे की देख मन ललचा जाता है

neelima said...

पुस्तक मेले में जाने का मन मेरा भी है , कब तक चलेगा।
लेकिन अपनी किताबों मैं किसी को देती नहीं हूं। चाहे कितना भी अच्छा मित्र क्यों ना हो। किताब, कलम और कैसेट एक बार गए तो फिर नहीं आते।
मेरी यह सलाह गांठ बांध लीजिए।

Sagar Chand Nahar said...

राजीवजी
उन सज्जन का कहना भी गलत नहीं आपका भी नहीं। मैने भी कई किताबें खोई है इस तरह पर कम्ब्ख्त मन ऐसा है कि कोई मित्र दिखा नहीं कि हम अपना संग्रह उन्हें दिखाने लग जाते हैं। फिर चाहे वह पुस्तक,सीडी या कैसेट का ही क्यों ना हो, फिर जानी तो है ही|
पचास सौ रुपये की पुस्तक के लिये आसानी से मना कर पाना संभव भी नहीं होता।
और जब हमने अपने हाथों से दी हो तो चोरी भी तो नहीं कह सकते :)

॥दस्तक॥
गीतों की महफिल

Anonymous said...

aap to nahak hi mpareshan ho rahe hain gyan bantane se badta hai.waise bujurg kah gaye hain chori to chahe dhele ki ho chori hi hoti hai......
abhishek

राजीव said...

बहुत सही बात कही आपने, लगभग हर पुस्तक प्रेमी को यह शिकायत सदा ही रही है। हम भी अपवाद नहीँ, कई तो याद भी नहीँ, एक पुस्तक विशेष के मामले में याद भी है, अपने एक गुरु समान सज्जन को दी थी, एकाध बार माँगी भी, उन्होंने कभी मना भी नहीँ किया वापसी के लिये पर स्वयं ही समय नहीँ निकाल पाया। यह बात आज फिर आद आ गयी, लगभग 10-12 वर्ष पहले की तो होगी ही बात। चूंकि वह तकनीकी पुस्तक थी Engg. Economics की और इंटरनेट के बाद ऐसे विषयों पर सामग्री की कमी नहीँ लगती तो पुस्तक भी विस्मृत हो गयी। एकाध पुस्तक जो कभी पुत्र ने भी ली तो बार बार उसके बारे में पूछ लेता हूँ, कि कहाँ है वह पुस्तक।

अंत में नीलिमा जी ने भी बहुत मार्के की बात जोड़ी है, केवल किताब ही नहीँ कलम भी। कैसेट तो मैं नहीँ जानता, कलम अवश्य किसी को देना पसंद नहीँ करता, अपने परिवारिक सदस्यों को भी नहीँ।

cma said...

baat to sahi kahi hai sir aapne.
kitabe ek baar gai t owapas nahi aati.apne saath bhi aisa hi hai. padrne likhne ka mujhe shuk to bahut hai jese bhi time milta hai likh padr lete hai.
mai aapke vicharo se sahmat hu bas isme apni ek baat aur anubhav jodrna chahti hu- wo ye ki yadi apni kitabo se dusro ka bhala hota ho to dil badra karke khushi se de deni chahiye.
kyoki bahut kam aise pustak premi hote hai jo dosto se book lekar shuk se aur seriously padrte hai. so jab bhi aise dost mile unhe muskuurate huai dena chahiye.waise bhi vidwano ka kahna hai ki gyan jitna baato utna badrta hai chahe wo pratyaksh yo ya aipratyakh. ye baad wali line meri yai.

Udan Tashtari said...

बिल्कुल सही कहा आपने. मन दुखी हो जाता है किताब इधर उधर होने से.

aashutosh said...

Badiya h... sir ape beech ki baat apne tak hi rakho na..

kuldeep said...

Sach kaha Rajeev ji apane..Aap aur ham Ved Vyas ji ke gaye tha..Tinka-Tinka chunkar unhone kitabon ka ak sansar apne charon aur buna..aaj kitabon ko dur jate dekh unki tadap ka andaj laga sakte hain..apano ke dur jane se taklif hoti hi hai chahe kitab ho ya insaan...insaan to zakham bhi de jata hai lekin kitab to sirf malham ka kaam karti hai.

आर्य मनु said...

is lekh se ye to pata chal hi gaya ki aap rajasthan ki aatma patrika me hai.
aapka aabhar,jo aapne badi gehri baat kahi, jisse hum sabhi vakif hai, fir bhi "shikaar" ban jate hai.
ek baat aapse milne ki tamanna hai,kabhi udaipur padhare to plz sampark karein, main patrika office ke pas hi sunderwas me rehta hu.
bhavdiya,
manu

City Spidey said...

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