Saturday, April 4, 2009

एक दम पकाऊ तस्‍वीर, गले नहीं उतरती कहानी


थिएटर मालिकों और डिस्‍टीब्‍यूटर्स में विवाद के चलते यूं ही नई फिल्‍में कम रिलीज हो रही हैं। “8 बाई 10 तस्‍वीर” रिलीज हुई तो ऐसी कि यूं समझिए अगर आप देखने पहुंच गए‍ तो लगेगा कि पैसे बेकार गए।
यूं तो फिल्‍म नागेश कुकनूर की है, अपन तो इसका सब्‍जेक्‍ट और नागेश का नाम देखकर पहुंच गए थिएटर। पर, क्‍या करें हॉ‍लीवुड स्‍टाइल कि कल्‍पना करके फिल्‍म बनाई है। पर स्‍टोरी इतनी अजब कि आप विश्‍वास ही नहीं करेंगे।
फर्स्‍ट हाफ तो बेहद कमजोर है, कई बार लगता है कि बस अब तो फिल्‍म खत्‍म होने को है पर उससे पहले ही एक नया पेंच आ फंसता है। फिल्‍म की कहानी कुछ यूं है कि नायक के पिता एक बिजनेसमैन हैं बडी कंपनी के मालिक हैं। पर बेटे जय (अक्षय) को उनके बिजनेस में इंटेरेस्‍ट नहीं है। वह इन्‍वायरमेंट प्रोटेक्‍शन सर्विस नाम से एक संस्‍था चलाता है। हालाकि काम करते हुए उसे फिल्‍म के शुरुआती पांच मिनट में बताया जाता है, उसके बाद तो हीरो काम पर ही नहीं जाता। बचपन में एक हादसे के बाद उसमें एक अजीब सी शक्ति आ जाती है। वह किसी भी फोटो को देखकर उसमें छिपा भूतकाल जान सकता है।
इस बीच उसके पिता की मौत हो जाती है। नौकरी से निकाले गए एक इंस्‍पेक्‍टर (जावेद जाफरी) के आगह करने पर उनका ध्‍यान इस ओर जाता है कि उनके पिता की हत्‍या की गई है। बस वो दोनों यह खोजने में जुट जाते हैं और फिल्‍म के अंत में पता चलता है कि दाल में काला नहीं पूरी दाल ही काली है।
मां के रोल में शर्मिला टैगोर और वकील के रूप में गिरीश कर्नाड को दो चार डायलॉग मिले हैं। अक्षयय की प्रेमिका शीला के रूप में आयशा टाकिया आजमी (शादी के बाद यही नाम है फिल्‍म की क्रेडिट में ) अक्षय के आजू बाजू खूब दिखती हैं। पर डायलॉग नहीं दिखते। (संस्‍पेंस है इसलिए यह नहीं बता रहा कि उन्‍होंने क्‍या गुल खिलाए)
फिल्‍म कनाडा में शूट की गई है। सीनरी बहुत प्‍यारी है। बस एक यही प्‍लस प्‍वाइंट है, दो गाने हैं एक फिल्‍म में और दूसरा फिल्‍म खत्‍म होने के बाद आता है। कुल मिलाकर नागेशजी संस्‍पेंस बनाने चले थे। और एकदम बिकाऊ सितारे अक्षय का साथ लिया उसके बावजूद फिल्‍म में चल पाने जैसे कोई लक्षण नहीं हैं।

हॉल में सिर्फ एक बार ठहाका गूंजता है
सीन कुछ इस तरह है कि एक बिस्‍तर में जय और शीला सो रहे हैं। आधी रात एक सपने के बाद जय की नींद टूटती है। शीला भी जागती है, हीरो को नार्मल करती है। एक बार आईलवयू बोलती है। तब तक लगता है कि शायद यह हीरो की पत्‍नी है, पर जब अगला डायलॉग बोलती है कि जय हम शादी कर लें। तो अचानक थिएटर में ठहाका लगता है, शायद इंडियन कल्‍चर का सत्‍यानाश हो गया है कि आधी रात बिस्‍तर से निकलकर नायिका हीरो को ये बोले। मेरे मुंह से भी यही निकला कि बस यही देखना बाकी रह गया था।

दिखते हैं अक्षय के सफेद बाल
पता नहीं ऐसा कैसे हो गया। अक्षय ने 30-35 साल के युवा की भूमिका निभाई है। फौजीकट छोटे बाल हैं पर पता नहीं किसकी गलती है। गर्दन के पास सफेद बाल साफ दिखाई देते हैं।

6 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

चलो कोई बात नहीं..एक आध फ्लॉप फिल्म देना भी ज़रूरी है.

सागर नाहर said...

आपने जिस तरह आयेशा टाकिया वाला सस्पेंस रखा है उस हिसाब से लगता है कि एक बार देख लेने में तकलीफ नहीं है।
अच्छी समीक्षा की आपने।
:)

संदीप शर्मा said...

क्या दद्दू,
इतनी बड़ी फिल्म और उससे भी बड़े परदे में सफ़ेद बाल खोज लिए... पतरकारिता घर छोड़कर नहीं जा सकते.... वैसे समीक्षा बहुत अच्छी...

sudhakar soni,cartoonist said...

bhaisaab aapne to tasveer ki fotu utar di

Harsh said...

rajeev bhai aapki yah sameekcha bahut achchi lagi ... poori parat dar parat film ki saly chikitsa kii hai aapne is post me ....

Harsh said...

rajeev bhai aapki yah sameekcha bahut achchi lagi ... poori parat dar parat film ki saly chikitsa kii hai aapne is post me ....