
अखबार की नौकरी है। दिनभर सोना और देर रात तक आफिस में रुकना अपनी आदत में शुमार है। शायद इसी बात को ध्यान में रखकर अपने मित्र सुधाकर ने मेरे जन्मदिन पर आफिस के नोटिस बोर्ड पर ऐसा ही एक कार्टून लगाया जिसमें मैं ढाई बजे तक आफिस में हूं और गार्ड मुझे जाने के लिए संकेत दे रहा है।
पर कल रात तो सचमुच यही हो गया। मेरा छोटा भाई भी आजकल आफिस के किसी प्रोजेक्ट में फंसा हुआ है। इसलिए देर से घर जाता है। कल रात मैं निकलने की तैयारी में ही था कि उसने ऑनलाइन देखकर पूछ लिया कि घर चल रहे हो क्या। मैंने कहा हां। तो उसने कहा कि आप कितनी देर में बाहर निकल रहे हो। मैंने कहा कि दस मिनट में, और मैं अपने काम में लग गया।
इतना होते होते करीब पंद्रह मिनट लग गए और ढाई बज गए।
और सचमुच गार्ड आ गया। शायद उसे नींद आ रही थी। बोला कितनी देर में जाओगे ढाई बज गए।
मुझे लगा कि शायद आज वो कार्टून वाली बात हकीकत बन गई है। और मैं घर पहुंचते ही इसे लिखने में जुट गया। क्योंकि आज ही तो पूजाजी की लिखी बात पढी कि सच्चा ब्लॉगर वही है, जो जिंदगी में घटी हर बात में कुछ ऐसा ढूंढे कि एक ब्लॉग लिख सके।
4 comments:
राजीव, सुधाकर के बनाए ज्यादातर कार्टून सच ही से प्रेरित होते हैं , अब देखिए न आप भी आ गए न लपेटे में। अरे काम थोड़ा कम करिए भई, वरना गार्ड भगाएगा ही
क्या बात है अच्छी लगी
जन्मदिन की ढेरों बधाईयां जी आपको वैसे कब है ये नहीं बताया
ha..ha..ha..ha..ha...sacche blogar ke baare men bilkul sach kahaa aapne....!!
@ मोहनजी
जन्मदिन तो ११ अक्टूबर को था
ये कार्टून तब ही बनाया था पर कल ऐसा हादसा हुआ तो मैंने इसका इस्तमाल कर लिया
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