Monday, April 27, 2009

काश! ऑनलाइन मिलता खाना


ये साला ऑनलाइन रहने का चस्‍का भी अजीब है। बाहर निकलना हो और पारा 42 डिग्री पार हो तो घर से निकलने का मन ही नहीं करता। कम से कम जब नेट अच्‍छी स्‍पीड में चल रहा हो।
यूं रोज रात देर से खाने की आदत है। पर कल एक दोस्‍त की सगाई थी, इसलिए शाम का खाना जल्‍दी खा लिया। सुबह सुबह राजगढ (मेरा पैतृक घर) से मैं जयपुर आ गया। घर पहुंचा तो बाई नदारद। बस अब खाना बनने का कोई चांस नहीं था।
यूं तो खाना बनना भी आता है, पर अब इतने दिन हो गए कि खाना बनाने का मन नहीं करता। भूख लगी थी, इसलिए “काश ऐसा होता कि खाना भी ऑनलाइन मिलता का स्‍टेटस मैसेज” जीमेल पर लगाकर कुछ जुगाड करने लगा।
जब तक किचन से लौटकर आया, चार पांच भारी भरकम सुझाव मिल चुके थे। उनमें से एक लगभग ऐसा ही था, जैसा मैं खुद चाहता था कि काश खाने का ऑर्डर भी ऑनलाइन चलता। यूं तो पिज्‍जा हट और मैकडी वाले आर्डर लेते ही हैं। पर बात यूं मजाक मजाक में ही चल रही थी खाना भी ऑनलाइन मिलता तो मजा आ जाता। न तो किचन में मेहनत करनी पडती न कुछ और!

15 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

इंसान ऐसे ही सुख पाना चाहता है। पर बना कर खाने का आनंद कुछ और है।

परमजीत बाली said...

अभी तो आगे आगे देखीए.....इंसान और क्या कया पाना चाहता है......संभव है जल्द ही यह इच्छा भी पूरी हो जाए;)

Anil said...

खाना online खरीद तो सकते हैं, लेकिन खा तभी सकते हैं जब वह आपके पास deliver हो जाये। जिस दिन खाना online मिलने लगेगा उस दिन वाकई कंप्यूटर से चिपकने वालों की संख्या में अपार वृद्धि होगी। यदि आप चेन्नई में हैं तो मेरे दोस्त कृष्णन आपके लिये खाना ला सकते हैं! उनकी कंपनी की वेबसाइट यहाँ है।

Dileepraaj Nagpal said...

Abhi Kuch Din Baad Khana Aapko Bna Bnaya Milne Lagega...

कुश said...

जी मेरे पास तो ऐसा ही एक आईडिया भी है.. कभी मौका मिला तो शुरू करूँगा ऐसा ही कुछ..

Fakeer Mohammad Ghosee said...

Bhai Sahab kal Kamwali Bai kya nahi aai. Aaj to aapne blog par online thali hi saja di.

bahut badhiya, Bahut badhiya

Fakeer Mohammad Ghosee said...

कामवाली बाई नहीं आई तो आपने तो खाना ही ऑनलाइन सबके लिए मुहैय्या करवा दिया. बहुत अच्छा, वैसे भी - आवश्यकता ही आविस्कर की जननी है.

cartoonist ABHISHEK said...

mandi ne gadbad kar dee
varna...
relince fresh, spensher, subhiksha..... khana bhi ghar tak bhejne wale the..(aataa, aaloo,tamatar.pyaz...bhej hi rahe the.....

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

सुविधा की बात तो अपनी जगह है, लेकिन राजीव जी, मुझे तो लगता है कि कुछ चीज़ें पारम्परिक ही बनी रहे, इसी में ज़िन्दगी का सुख है. आपको खाना न मिले, आप उसके लिए व्याकुल हों, और फिर जैसा रूखा-सूखा मिले उसे खाकर तृप्त हो जाएं - इसमें जो मज़ा है, उसे खत्म करने की क्यों सोचते हो? ऑन लाइन खाना मिलेगा तो सारा मज़ा ही खत्म हो जाएगा.

neelima sukhija arora said...

वैसे आइडिया बुरा नहीं है, जब छोटे थे तो साइंस फिक्शन औऱ सीरियल्स में पढा औरदेखा भी तो करते थे , दो कैप्सूल खोले और उसमें से चावल दाल रोटी तैयार , आप भी कल्पनाएँ करें कभी तो पूरी होंगी

Anonymous said...

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Anonymous said...

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Anonymous said...

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