Monday, February 4, 2008

जयपुर में प्रभाषजी और प्रभु चावला में टकराव

जयपुर में दो दिवसीय नेशनल ज्‍यूडिशियल कॉनक्‍लेव शनिवार को संपन्‍न हुई। इसका उद़घाटन शुक्रवार शाम को हुआ और शनिवार को पहले सत्र में विधि, न्‍याय एवं जनमत तथा मीडिया की भूमिका एवं दायित्‍व विषय पर विचार रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट जज गणपत सिंह सिंघवी के साथ साथ वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभाष जोशी और प्रभु चावला भी थे।
पहले प्रभाषजी का नंबर था बाद में प्रभुजी का। पर प्रभाषजी के कुछ मुददों को प्रभुजी ने दिल पर ले लिया और इसके जवाब में उनका नाम लेकर खूब गरजे। उनके भाषण के बाद प्रभाषजी दो मिनट बोलने आए और अपनी बात कही, प्रभुजी भी फिर से मंच पर आए लेकिन वकीलों ने विरोध करते हुए उन्‍हें बैठा दिया और बहस बंद करने को कहा। पूरे शहर ने देखी दो दिग्‍गज पत्रकारों की यह गरमा गर्मी। बस बाद में प्रभुजी ने किसी तरह मीडिया मैनेज किया और यह गरमागरमी का मामला छपने से बचवा लिया। पर कॉनक्‍लेव के सभी सत्रों में वक्‍ताओं ने इसकी चर्चा की। मतलब इस कार्यक्रम की आयोजक बार एसोसिएशन भी यही कहती रही कि सारी चर्चा को इन दो पत्रकारों की टसल हाइजेक कर गई।
हुआ ये कि प्रभाष जोशी ने अपने भाषण में वर्तमान में मीडिया की दुर्दशा पर कहा कि आज के दौर में जबकि सजायाफता संजय दत्‍त को गांधीगिरी का सच्‍चा वारिस बताया जाता है, शाहरुख खान को इंडियन ऑफ द ईयर घोषित किया जाता है। जहां शाहरुख की हैसियत मनमोहन सिंह से और अनिल अंबानी की चिदंबरम से ज्‍यादा हो ऐसे मीडिया की हालत का अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है।
मीडिया को मुनाफा कमाना का जरिया बताते हुए प्रभाषजी ने कहा कि पहले मीडिया मुनाफा कमाने के लिए काम नहीं करता था। आपातकाल के दौरान इंडियन एक्‍सप्रेस और स्‍टेट़समैन अखबारों का हवाला देते हुए उन्‍होंने रामनाथ गोयनका को याद किया। उन्‍होंने कहा कि यदि वो अखबार को मुनाफा कमाने का जरिया बनाते तो इंदिरा गांधी को चुनौती नहीं दे सकते थे।
करीब 35 मिनट में से 27 मिनट तो प्रभुजी खूब अच्‍छा अच्‍छा बोले वर्तमान पत्रकारिता, उसकी जल्‍दबाजी, आपाधापी पर प्रकाश डाला लेकिन लास्‍ट के आठ मिनट ने सारा मामला गरमा दिया।
बाद में प्रभु चावला ने प्रभाष जोशी के जवाब में कहा कि गोयनका का उददेश्‍य भी मुनाफा कमाना ही था। प्रभुजी ने कहा कि संपादक और वरिष्‍ठ पत्रकार, नौकरशाह रिटायरमेंट के बाद आदर्शों की बडी बडी बात करते हैं। चावला ने वर्तमान दौर की मीडिया का समर्थन करते हुए कहा कि यह समय के साथ चलने की मजबूरी है। चावला ने प्रभाषजी का नाम लेकर कहा कि गोयनका ने भी मुनाफा कमाने के लिए काम किया था। समय के साथ नहीं चलने पर इंडियन एक्‍सप्रेस समूह की आज क्‍या हालत है, किसी से छिपी नहीं है। उन्‍होंने कहा कि प्रभाषजी, गोयनकाजी ने कैसा जनसत्‍ता सौंपा, जिसकी आपने क्‍या हालत कर दी। आपने समाचार पत्र को विचार पत्र बनाकर रख दिया और विचार रखने से कौन रोक रहा था, लेकिन खबरों में न्‍यूज की जगह व्‍यूज लिखने के लिए किसने कहा। उन्‍होंने कहा कि संपादकों को राजनीति नहीं करनी चाहिए। अगर आपको राजनीति करनी है तो राजनीतिक दलों में जाना चाहिए।
इसके बाद प्रभाष जोशी फिर मंच पर आए और कहा कि मैं राज्‍यसभा का सदस्‍य या पदम भूषण के लिए काम नहीं करता, ( डायस ठोंककर बोले) पहले भी ऐसे ही बोलता था और आज भी।
इसके बाद प्रभु चावला ने बोलना चाहा, सीट से उठे भी लेकिन वे इस बात को प्रभाषजी से व्‍यक्तिगत रूप से लेने की बात ही कह पाए कि लोगों ने उन्‍हें इस चर्चा को बंद करने के लिए बैठ जाने को कहा।
पर इस मामले ने पत्रकारिता जगत के अंदर की दो विधाओं के इन दिग्‍गजों के मतभेद सार्वजनिक कर दिए। बाद के सत्रों में खूब चर्चा हुई और जज यह कहते रहे कि हमने पत्रकारिता की अंदर की कहानी अभी देखी। हमें खबरों में और गंभीरता दिखानी चाहिए वगैरह वगैरह।

7 comments:

PD said...

bas itta hi.. jyada maja nahi aaya.. jara khul kar batayen.. to ham bhi maje len in diggajon ka, jaise ye hamare lete hain.. :D

Harinath said...

हुआ तो कुछ ज्यादा ही था . आप ने कुछ कम ही लिखा. डिटेल मी लिखिए. और लोग भी जाने सीधी बात की असलियत.

शिशिर उइके said...

haan bhai,thoda khul ke bataao...dont be politically correct like prabhu chaawla. :)

दिनेशराय द्विवेदी said...

मीडिया के अन्तर्विरोध को सामने लाने के लिये बधाई। आज मीडिया वैसा नहीं जैसा पहले हुआ करता था। अब तो सब पर बाजारवाद हावी है। क्यों न हो इस के बिना उन का जीवन संभव नहीं है। सब से बड़ी बात तो यह कि मीडिया मैनेज भी होता है। प्रभाष जी अधिक सच्चे मालूम पड़ते हैं।

अजित वडनेरकर said...

राजीव इसे दो या तीन किस्तों में देते तो तुम्हारे रिपोर्टर की ताराफ होती । अभी तो सिर्फ विषय विमोचन हुआ है। मंचीय तकरार में जो विभिन्न संदर्भ आए होंगे ,उसे जानने नें में ज्यादा दिलचस्पी है पत्रकारों की ।

सिद्धार्थ जोशी said...

राजीव जी
जयपुर में होने का यही फायदा है कि बडे लोगों के छोटे नाटक देखे जा सकते हैं
इस घटनाक्रम के भाव के स्‍थान पर शब्‍द दर शब्‍द कैसे हुआ और क्‍या तेवर रहे यह खुलकर बताएंगे तो पढने का और आनन्‍द आएगा
ऐसा कम ही होता है कि कांच के घर में बैठा आदमी किसी दूसरे के घर की खिडकियां तोडने की कोशिश करे

surendra meena said...

चलो यह बी ठीक हुआ| लगता प्रभाष जोशी और प्रभु चावला को इस दिन का कई सालो से इंतजार था | चलो यह अवसर जयपुर को ही मिला....