
बहुत दिनों बाद हॉल में
फिल्म देखी रामगोपाल वर्मा की फूंक। पांच लाख के ईनाम का सवाल था कि फिल्म शुरुआत से ही तगड़ी पçब्लसिटी पा चुकी थी। मुश्किल से सैटर डे के हाउसफुल मैटनी शो के टिकट जुगाड़े और पहुंच गए। एंट्री गेट पर भीड़ इस कदर थी कि अंदर पहुंचते पहुंचते फिल्म शुरू हो चुकी थी।
अब स्टोरी की बात मुझे जहां तक समझ आया फिल्म एक ऐसे बिल्डर परिवार के इर्द गिर्द है, जिसके मुखिया को भगवान में विश्वास नहीं है। हालांकि वह परिवार को इनमें शामिल होने से नहीं रोकता। सब कुछ अच्छा अच्छा चल रहा होता है कि एक घोटाले के बाद अचानक अपने एक साथी को नौकरी से निकालने के बाद घर में अनिष्ट शुरू हो जाता है। साइट पर एक की मौत हो जाती है, खुद को बुरे सपने आते हैं, बेटी घर से लापता हो जाती है। बाद में बेटी को आवाजें सुनाई देती हैं, उसके बाद काले जादू की तरह का ड्रामा होता है और फिर शुरू होता है साइंस वर्सेज सुपर नेचुरल पावर का संघर्ष।
पहले दादी चाहती है कि पोती को तांत्रिक को दिखाया जाए, मां भी कहती है, लेकिन पिता को मंजूर नहीं हुआ। बाद में वही बाकी फिल्मों की तरह बेटी की हालत को देखकर बाप पिघल जाता है और चला जाता है बेटी को बचाने के लिए तांत्रिक की शरण में। आखिर में बेटी बच जाती है, लेकिन अस्पताल में बैठी मां उसके बचने का श्रेय डॉक्टर को देती है और पिता को पता है कि वह किस तरह तांत्रिक के साथ उसे मौत के मुंह से बचा कर लाया है!
खास बात अब तक हॉरर टाइप की फिल्म में डराने के लिए काली बिल्ली ही आती थी, राम गोपाल वर्मा ने इस बार कौए का सहारा भी लिया है, फिल्म देखकर आए हों तो हो सकता है आप भी कौए को देखकर डर जाएं।
सबसे खास हीरो का नाम राजीव था और पूरी फिल्म में डरने के बाद बार बार राजीव बचाओ, राजीव जल्दी आओ का डायलॉग आता तो, डरने के बाद मुझे भी लग रहा था कि आवाज मुझे ही बुला रही है!
सलाहअगर हॉरर फिल्म में इंट्रेस्ट नहीं है तो प्लीज फिल्म देखने न जाएं। हॉरर सीन कहीं कहीं तो इतने अजीब हैं कि हास्य का पुट देते हैं। जैसे करीब 15 फुट तक दादी की ओर बढ़ता हाथ।
निराशाकरीब दो घंटे की फिल्म में मैं अंत तक यही सोचता रहा कि साइंस को मानने वाला हीरो शायद इस बात के लिए कभी तैयार नहीं होगा कि वह अपनी बेटी का इलाज तांत्रिक से कराए। और फिल्म यह साबित कर देगी कि भूत या सुपर नेचुरल पावर का अस्तित्व नहीं होता। पर ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि मैं राजीव हूं, रामू नहीं!