Monday, September 29, 2008

बिना पुलिसवाले के रेडलाइट की भी इज्जत नहीं

दिन में छोटे भाई को सिंधी कैंप बस स्टैंड (जयपुर का के ंद्रीय बस स्टैंड) छोड़ने गया। यूं तो मैं थोड़ी तेज ड्राइव करता हूं, लेकिन बेतरतीब नहीं। जाते समय एक कार वाले ने पीछे से हॉनü बजाया तो मैंने बाइक रोकी। उनकी समस्या थी कि मैं बाइक एक तरफ नहीं चला रहा। खैर मुझसे निपटने इससे पहले ही पीछे से आ रही एक बाइक उनकी कार से टकरा गई।
बस स्टैंड तक पहुंचने से पहले ही भीलवाड़ा जाने वाली बस दिखी। छोटे भाई को भीलवाड़ा तक ही जाना था इसलिए मैंने समय बचाने के लिए बाइक वहीं से मोड़कर बस के पीछे लगा दी। रविवार का दिन था चौराहों पर एक भी ट्रैफिक पुलिस वाला नहीं था। पहली लालबत्ती पर बस ने बिना रोके निकाल ली। गणपति प्लाजा के सामने लगी दूसरी लाल बत्ती ग्रीन थी बस निकल गई उसके पीछे पीछे मैं भी था। मेरे आगे निकलने से पहले ही सामने का ट्रैफिक बिना ग्रीन लाइट हुए ही आने लगा। इसबीच में सही दिशा में जा रहा था। मुझे देख एक बाइक सवार ने ब्रेक लगाए और क मबख्त टूटी सड़क की वजह से बाइक çस्लप हो गई। बाइक पर सवार दोनों लोग गिर पड़े। मुझे बस पकड़नी थी इसलिए मैंने एक बार बिना रुके आगे बढ़ने की सोची। गिरा पड़ा बाइक सवार मानों पीटने के लिए उठा और मेरी और दौड़ा, मैंने भी मौके की नजाकत को समझते हुए बाइक रोक ली। अगर भागता तो हो सकता है लोग मेरी गलती समझ सकते थे। मैं रुका और उनको दिखाया कि अभी तक उनकी वाली तरफ लालबत्ती थी और मेरी तरफ ग्रीन सिग्नल। मैंने उनसे कहा कि भाई साहब आप तो बुजुर्ग हो कम से कम लाइटों की इज्जत करा करो।
थोड़ी गर्मा गर्मी के बाद मैं उस बस का पीछा करने लगा और दो लाल बत्ती के बाद अजमेर पुलिया पर बस को पकड़ ही लिया।
कुल मिलाकर बात यह हिंदुस्तान में ट्रैफिक को कंट्रोल के लिए केवल रेडलाइट लगाने से ही काम नहीं चल सकता। जब तक वहां पुलिसवाला न खड़ा हो लोग उसकी इज्जत ही नहीं करते।
(वैसे कई बार मैं भी जंप कर चुका हूं, पर अमूमन पालना करता हूं)

8 comments:

chandrashekhar hada said...

GANIMAT ........Ajmer puliya par bus pakad main aa gai , varna aap peechha karte -karte lagta hai BHILWADA hi pahunch gaye hote.


ek nek salah : gadi SAVDHANI se chalayen kyonki hum kitne bhi sahi hon yadi samne vala galat hai aur hum ASAVDHAN to nuksan to hamen bhi hoga na.baharhaal bahut achchha likha,sans rok kar padna pada.

PREETI BARTHWAL said...

सावधानी बहुत जरुरी है। रेड लाइट से लोग आंख बचाते है और आगे निकले की होङ में सब भूल जाते है।

PD said...

चाहे कुछ भी कहिये, मगर मैं तो यही कहूंगा कि तमिलनाडु में अभी भी लोग उत्तर भारत से ज्यादा सभ्य और कानून को मानने वाले हैं.. वैसे आपको अपना एक पर्सनल अनुभव बताता हूं.. मैं भारत के कई हिस्सों में घूम चुका हूं.. लगभग हर बड़े शहर को छान चुका हूं.. और जयपुर मे मुझे सबसे ज्यादा बेतरतीब तरीके से बाईक चलाने वाले मिले हैं..
इसे अन्यथा ना लें.. मैंने जो महसूस किया उसे लिख रहा हूं.. :)

Udan Tashtari said...

करेंट का ज्यादा अहसास नहीं मगर लगता तो है कि सही कहा... :)

surendra kumar said...

सही कहा भाई....

Suresh Chiplunkar said...

ये तो आम हिन्दुस्तानियों की फ़ितरत है, जब तक इनके पिछवाड़े में डंडा नहीं पड़ता तब तक ये भदेस ही रहते हैं, मन्दिरों में थूकते हैं और अस्पतालों में मूतते हैं, घटिया लोगों को लातों पर ही रखना चाहिये… ये ऐसे नहीं सुधरने वाले…

neelima sukhija arora said...

इस मामले में मैं थोड़ी अलग हूं, लाइट की पालना करने में ही यकीन करती हूं और मुझे याद नहीं पड़ता कि कब मैंने रेड लाइट जंप की हो।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी said...

आप हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, इसके लिए साधुवाद। हिन्दुस्तानी एकेडेमी से जुड़कर हिन्दी के उन्नयन में अपना सक्रिय सहयोग करें।

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सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणी नमोस्तुते॥


शारदीय नवरात्र में माँ दुर्गा की कृपा से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हों। हार्दिक शुभकामना!
(हिन्दुस्तानी एकेडेमी)
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